चंद्र-गुरु युति: फल, योग व उपाय
चंद्र-गुरु युति का मुख्य फल
चंद्र जल-तत्व का सौम्य ग्रह है (मन, माता, भावना, जल, मानसिक शांति, जनता का कारक), गुरु आकाश-तत्व का परम शुभ ग्रह (ज्ञान, धर्म, गुरु, संतान, धन, भाग्य, विवेक का कारक) — युति में दोनों के कारकत्व घुल-मिलकर एक ही भाव के विषयों पर लगते हैं।
यह युति गजकेसरी-वर्ग युति कहलाती है। संक्षेप-सूत्र: मन पर गुरु का अमृत-हाथ — सज्जनता, विद्या, जन-सम्मान; शुभतम युतियों में गिनी जाती है।
मैत्री और युति का भीतरी रसायन
नैसर्गिक मैत्री-विचार: चंद्र गुरु को सम मानता है और गुरु चंद्र को मित्र। सम्बन्ध मिश्रित है — युति का फल राशि, भाव और अंश-निकटता से तय होता है।
किस भाव में हो — यही निर्णायक
युति का असली रंग भाव तय करता है — यही चंद्र-गुरु केंद्र-त्रिकोण में वरदान-रूप, त्रिक (6, 8, 12) में परीक्षा-रूप हो जाती है। अंश-निकटता जितनी अधिक, फल उतना गुँथा हुआ; और दोनों में जो ग्रह अंशों में आगे (बली) है, युति का नेतृत्व उसी के पास रहता है।
फल का समय: चंद्र या गुरु — किसी की भी महादशा-अंतर्दशा में युति सक्रिय होती है; दोनों की दशाएँ परस्पर अंतर्दशा में मिलें, तब इसका फल शिखर पर होता है।
सामान्य उपाय
चंद्र: चंद्र को बल देने हेतु सोमवार व्रत, 'ॐ चंद्राय नमः' या शिव-पूजन (चंद्र शिव के मस्तक पर), माता की सेवा तथा जल व दूध का दान श्रेष्ठ है। रत्न मोती (Pearl) चाँदी में, कनिष्ठा में, सोमवार धारण किया जाता है। सफ़ेद वस्तुएँ (चावल, दूध, चाँदी) का दान और मन को शांत रखने वाले ध्यान-अभ्यास विशेष लाभकारी हैं।
गुरु: गुरु को बल देने हेतु गुरुवार व्रत, 'ॐ गुरवे नमः' या बृहस्पति-स्तोत्र, विष्णु-पूजन तथा गुरुजनों-ब्राह्मणों का सम्मान श्रेष्ठ है। रत्न पुखराज (Yellow Sapphire) सोने में, तर्जनी में, गुरुवार धारण किया जाता है। पीली वस्तुएँ (चना-दाल, हल्दी, केसर) का दान, ज्ञान-दान तथा धर्म-ग्रंथों का अध्ययन विशेष लाभकारी है।
रत्न-निर्णय युति में विशेष सावधानी माँगता है — दोनों ग्रहों के रत्न एक साथ प्रायः नहीं पहने जाते; कुंडली-परामर्श अनिवार्य।
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