चंद्र-राहु युति: फल, योग व उपाय
चंद्र-राहु युति का मुख्य फल
चंद्र जल-तत्व का सौम्य ग्रह है (मन, माता, भावना, जल, मानसिक शांति, जनता का कारक), राहु वायु-तत्व का छाया-ग्रह (क्रूर) ग्रह (माया, विदेश, तकनीक, अचानक घटनाएँ, भ्रम, महत्वाकांक्षा का कारक) — युति में दोनों के कारकत्व घुल-मिलकर एक ही भाव के विषयों पर लगते हैं।
यह युति ग्रहण-दोष (चंद्र) कहलाती है। संक्षेप-सूत्र: मन पर राहु की धुंध — कल्पना असीम पर भय-भ्रम भी; मन को अनुशासन (जप-ध्यान) मिले तो असाधारण रचनात्मकता।
मैत्री और युति का भीतरी रसायन
नैसर्गिक मैत्री-विचार: चंद्र राहु को सम मानता है और राहु चंद्र को शत्रु। परस्पर वैर होने से युति में भीतरी खिंचाव रहता है — फल पाने में शेष कुंडली का सहयोग अधिक चाहिए।
किस भाव में हो — यही निर्णायक
युति का असली रंग भाव तय करता है — यही चंद्र-राहु केंद्र-त्रिकोण में वरदान-रूप, त्रिक (6, 8, 12) में परीक्षा-रूप हो जाती है। अंश-निकटता जितनी अधिक, फल उतना गुँथा हुआ; और दोनों में जो ग्रह अंशों में आगे (बली) है, युति का नेतृत्व उसी के पास रहता है।
फल का समय: चंद्र या राहु — किसी की भी महादशा-अंतर्दशा में युति सक्रिय होती है; दोनों की दशाएँ परस्पर अंतर्दशा में मिलें, तब इसका फल शिखर पर होता है।
सामान्य उपाय
चंद्र: चंद्र को बल देने हेतु सोमवार व्रत, 'ॐ चंद्राय नमः' या शिव-पूजन (चंद्र शिव के मस्तक पर), माता की सेवा तथा जल व दूध का दान श्रेष्ठ है। रत्न मोती (Pearl) चाँदी में, कनिष्ठा में, सोमवार धारण किया जाता है। सफ़ेद वस्तुएँ (चावल, दूध, चाँदी) का दान और मन को शांत रखने वाले ध्यान-अभ्यास विशेष लाभकारी हैं।
राहु: राहु को शांत करने हेतु 'ॐ रां राहवे नमः' जप, दुर्गा/भैरव-पूजन, सरस्वती-आराधना तथा शनिवार सेवा श्रेष्ठ है। रत्न गोमेद (Hessonite) चाँदी/पंचधातु में — तीव्र-प्रभावी, अतः बिना परामर्श न धारण करें। नीले-भूरे वस्त्र, तिल, नारियल व उड़द का दान, कोढ़ी/निर्धनों की सेवा तथा व्यसन-त्याग विशेष लाभकारी है।
रत्न-निर्णय युति में विशेष सावधानी माँगता है — दोनों ग्रहों के रत्न एक साथ प्रायः नहीं पहने जाते; कुंडली-परामर्श अनिवार्य।
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