| शहर | तारीख | कुतुप मुहूर्त (श्राद्ध) | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| दुबई Gulf Standard Time (GST) | शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 | 11:43 AM – 12:29 PM GST | 9 अक्टूबर, 8:06 PM → 10 अक्टूबर, 7:55 PM GST |
| अबू धाबी Gulf Standard Time (GST) | शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 | 11:46 AM – 12:33 PM GST | 9 अक्टूबर, 8:06 PM → 10 अक्टूबर, 7:58 PM GST |
| शारजाह Gulf Standard Time (GST) | शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 | 11:42 AM – 12:28 PM GST | 9 अक्टूबर, 8:06 PM → 10 अक्टूबर, 7:54 PM GST |
समय स्थानीय। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
| आरंभ | रविवार, 27 सितंबर 2026 |
अन्य शहरों में एक दिन का अंतर हो सकता है; शहर-वार तारीखें उस पर्व के पन्ने पर।
पितृ पक्ष आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या तक। सर्व पितृ अमावस्या = जिस दिन अपराह्न (श्राद्ध-काल) में अमावस्या अधिक हो; श्राद्ध कुतुप मुहूर्त में।
ऋण-सिद्धांत: मनुष्य पर देव-ऋषि-पितृ तीन ऋण; पितृ-ऋण संतान-परंपरा व श्राद्ध से चुकता; गरुड़/मार्कंडेय-पुराण, मनुस्मृति में श्राद्ध का विधान — «पितरों की तृप्ति से आयु, संतान, धन, विद्या, स्वर्ग»; श्राद्ध न करने से पितृ-दोष (कुंडली में सूर्य-राहु/केतु/शनि के योग) — संतान-बाधा, रोग, कलह — माना जाता है; पितृ-पक्ष उसकी शांति का श्रेष्ठ काल।
श्राद्ध का समय: अपराह्न (दोपहर 12-1:30 — कुतुप-रौहिण मुहूर्त, ऊपर अपराह्न) श्रेष्ठ; दिशा दक्षिण (पितर-दिशा), जनेऊ दाहिने कंधे पर (अपसव्य), तिल-कुशा-जल, चावल-जौ-तिल के पिंड; कौआ यम का दूत, गाय-कुत्ता-चींटी-देवता — पंच-बलि (पंचग्रास) श्राद्ध का हिस्सा; ब्राह्मण/बेटी-दामाद/भांजा को भोजन = पितरों का भोजन।
गया (बिहार) — विष्णुपद पर पिंडदान पितृ-पक्ष का सबसे बड़ा तीर्थ (पितृपक्ष मेला, 17 दिन), फिर हरिद्वार (नारायणी-शिला), प्रयाग, काशी (पिशाच-मोचन), सिद्धपुर (गुजरात — मातृ-गया), बद्रीनाथ (ब्रह्म-कपाल), रामेश्वरम्, नासिक-त्र्यंबक (पंचवटी), पुष्कर, लोहार्गल; बंगाल में महालय-अमावस्या को «महालया» — दुर्गा का आगमन (आकाशवाणी का «महिषासुरमर्दिनी»), तर्पण गंगा-घाटों पर।
हाँ — शनिवार, 10 अक्टूबर 2026।
कुतुप मुहूर्त (श्राद्ध): 11:43 AM से 12:29 PM (GST)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में (दुबई के लिए Gulf Standard Time (GST))।
हाँ — पुत्र न हो तो पत्नी, बेटी, पोती, बहू, भाई-भतीजा कर सकते हैं (धर्म-सिंधु/गरुड़-पुराण में पुत्र-हीन के लिए); सीता ने दशरथ का पिंडदान गया में किया; आधुनिक पंडित बेटियों को गया में पिंडदान कराते हैं; श्रद्धा मुख्य, लिंग नहीं।
शास्त्र में केवल शुभ-संस्कार (विवाह-मुंडन-यज्ञोपवीत-गृह-प्रवेश) वर्जित — क्योंकि यह पितरों का काल है, उत्सव का नहीं; नई ख़रीद (गहने-वाहन-घर) की मनाही लोक-रीत है — कुछ पंडित कहते हैं पितर आशीर्वाद देते हैं, ख़रीद शुभ; अपने घर की रीत मानें; नवरात्रि से सब खुल जाता है।
कौआ यम का दूत, ग्रास लेने से पितर तृप्त — लोक-भाव; न आए तो ग्रास छत/खुले में रखकर प्रतीक्षा, «काकाय नमः» — फिर गाय/कुत्ते को दे दें; शास्त्र में पंचबलि का भाव «सब जीवों को भोजन» है — कौआ न मिले तो चिड़िया/कोई पक्षी; पितर नाराज़ नहीं होते, श्रद्धा देखी जाती है।
कुंडली में सूर्य-राहु/केतु/शनि के कुछ योग (9वें भाव/सूर्य पीड़ित) को पितृ-दोष कहते हैं — संतान-विलंब, रोग, कलह का लोक-कारण; उपाय — पितृ-पक्ष में तिथि-श्राद्ध व अमावस्या-श्राद्ध, पीपल-सेवा, गीता-7/पितृ-सूक्त, गाय-कौए-कुत्ते को रोज़ ग्रास, ग़रीब-भोजन, गया/त्र्यंबक में नारायण-बलि (पंडित से); कुंडली-जाँच (दोष-रिपोर्ट) से पहले पुष्टि; श्रद्धा से श्राद्ध सबसे बड़ा उपाय।