🌑 अमावस्या (पितृ-तर्पण, स्नान-दान) व्रत कथा
कथा
सोमवती अमावस्या (पीपल-परिक्रमा) की कथा: एक साहूकार की सात बहुओं में सबसे छोटी बहू को धोबिन ने आशीर्वाद दिया «सदा सुहागिन रहो»; बहू ने पूछा — धोबिन बोली «सोमवती अमावस्या को पीपल की 108 परिक्रमा सूत लपेटकर कर, फिर भोजन कर — इसी से मेरा सुहाग अखंड»; बहू ने वही किया, उसका पति सर्प-दंश/मृत्यु से बच गया (कहीं: बेटी की कुंडली में वैधव्य-योग सोमवती-व्रत से कटा — सोना धोबिन की कथा)। सीख — सोमवती पर पीपल-परिक्रमा से सुहाग-संतान-रक्षा।
अमावस्या-पितृ: कर्ण को 16 दिन पितृ-तर्पण के मिले (पितृ-पक्ष), और महाभारत में भीष्म ने बताया कि अमावस्या पितरों की तिथि है — «इस दिन पितर वंशजों के द्वार आते हैं, जल-तिल से तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं, खाली लौटें तो शाप»; इसलिए हर अमावस्या (दर्श) का तर्पण। समुद्र-मंथन (मौनी) व राम-अयोध्या-आगमन (कार्तिक) भी अमावस्या को — इसलिए अमावस्या शुभ-अशुभ दोनों नहीं, पितृ-देव-दिन है।
शनिश्चरी अमावस्या: शनि का जन्म ज्येष्ठ अमावस्या को (शनि-जयंती) — पिता सूर्य से वैर, पर शिव-भक्ति व न्याय के देव; शनिवार + अमावस्या पर शनि-मंदिर (शिंगणापुर-तिरुनल्लार-कोकिलावन) में तेल-अभिषेक, पीपल-दीप, हनुमान-पूजा से साढ़ेसाती-ढैया की पीड़ा कम — लोक-मान्यता; शनि कर्म-फल-दाता, दान-सेवा से प्रसन्न।
कथा का महत्व — यह व्रत क्यों
पितृ-दिन: गरुड़-पुराण/मनुस्मृति — अमावस्या को पितर वायु-रूप में वंशजों के द्वार पर आकर तर्पण की प्रतीक्षा करते हैं; अमावस्या का तर्पण/श्राद्ध पितृ-दोष (कुंडली में सूर्य-राहु/शनि) की शांति का मासिक उपाय; दर्श-श्राद्ध (अमावस्या का श्राद्ध) पितृ-पक्ष के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण।
चंद्र-हीन दिन — मन (चंद्र) निर्बल, इसलिए शुभ-कार्य (विवाह-यात्रा-नया आरंभ) टालते हैं, पर जप-तप-दान-ध्यान (मौनी) व तांत्रिक/काली-साधना का श्रेष्ठ काल; सोमवती (चंद्र-वार + अमावस्या) पर पीपल-परिक्रमा से सुहाग-संतान; शनिश्चरी पर शनि-शांति (साढ़ेसाती-ढैया), शनि-मंदिर (शिंगणापुर-कोकिलावन-तिरुनल्लार) की भीड़।
तीर्थ-स्नान: अमावस्या का गंगा-नर्मदा-गोदावरी-संगम स्नान (माघ-कार्तिक-वैशाख विशेष), फिर दान — अन्न, वस्त्र, तिल, जल, गाय; पीपल (विष्णु-वास) व तुलसी को जल-दीप; कुछ इलाक़ों में अमावस्या को खेत-हल नहीं (कृषि-विश्राम, बैलों को छुट्टी — बैल-पोला भाद्रपद अमावस्या)।
कथा सुनने का नियम
- कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
- व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
- कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।
📿 अमावस्या (पितृ-तर्पण, स्नान-दान) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अगली अमावस्या कब है? {Y} की अमावस्या-तिथियाँ?
ऊपर अगली अमावस्या की तिथि, तिथि-खिड़की व श्राद्ध-मुहूर्त (कुतुप/अपराह्न — दिल्ली) और आने वाली 12 अमावस्याएँ माह-नाम व वार-विशेष (सोमवती/शनिश्चरी) सहित हैं — उदया-तिथि नियम से; तर्पण उस दिन जब अमावस्या दिन में (अपराह्न) हो — तिथि-खिड़की देखें।
सोमवती अमावस्या क्या है और स्त्रियाँ क्या करती हैं?
सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या — साल में 1-3; सुहागिनें व्रत रखकर पीपल की 108 परिक्रमा कच्चा सूत लपेटते हुए करती हैं, फल-मिठाई-सिक्के चढ़ाकर, सोना-धोबिन/साहूकार-बहू की कथा सुनकर, फिर भोजन — पति-संतान की दीर्घायु व अखंड सुहाग; तीर्थ-स्नान (हरिद्वार-प्रयाग) का विशेष फल; ऊपर सूची में «(सोमवती)» लिखा है।
शनिश्चरी (शनि) अमावस्या पर क्या करें?
शनिवार की अमावस्या — शनि-शांति का श्रेष्ठ दिन: शनि-मंदिर/पीपल पर सरसों-तेल का दीप, काले तिल-उड़द-तेल-लोहा-काला वस्त्र दान (ग़रीब/सफ़ाई-कर्मी को), «ॐ शं शनैश्चराय नमः» 108, हनुमान-चालीसा, शनि-स्तोत्र (दशरथ-कृत), पितृ-तर्पण साथ; साढ़ेसाती-ढैया वाले विशेष; कुंडली-जाँच (साढ़ेसाती-रिपोर्ट) से पहले पुष्टि।
तर्पण कैसे करें, पंडित न हो तो?
स्नान कर दक्षिण मुख बैठें, तांबे के लोटे में जल-काले तिल-(कुशा); अँगूठे की ओर से जल छोड़ते हुए «(गोत्र) (पिता/दादा का नाम) तृप्यताम्» 3-3 बार, फिर «सर्वे पितरः तृप्यन्ताम्»; अंत में गाय-कौए को खीर-रोटी, ग़रीब को अन्न — यही सरल दर्श-तर्पण; स्त्री भी कर सकती है (पुत्र न हो तो); पूर्ण विधि के लिए पितृ-पक्ष पन्ना।
अमावस्या को क्या नहीं करना चाहिए और क्यों?
शास्त्र में केवल शुभ-संस्कार (विवाह-मुंडन-गृह-प्रवेश) वर्जित — चंद्र-हीन तिथि, मन निर्बल; लोक-रीत में नया कार्य-यात्रा-ख़रीद टालना, तुलसी न तोड़ना, माँस-मद्य नहीं, शाम के बाद सुनसान से बचना; पर जप-दान-तर्पण-ध्यान के लिए यह श्रेष्ठ दिन — अमावस्या «अशुभ» नहीं।
कौन-सी अमावस्याएँ बड़ी हैं?
माघ — मौनी (मौन-स्नान), आश्विन — सर्व पितृ (महालय), कार्तिक — दीपावली (लक्ष्मी-पूजा), श्रावण — हरियाली (पौधे-झूले), ज्येष्ठ — वट सावित्री/शनि-जयंती, भाद्रपद — कुशग्रहणी/पिठोरी/पोळा, चैत्र — भूतड़ी, फाल्गुन — फाल्गुनी; सोमवती-शनिश्चरी वार से; सबके पन्ने hub पर।
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