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📖 व्रत-कथा

🌅 छठ पूजा (सूर्य षष्ठी) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी निःसंतान थे। महर्षि कश्यप के यज्ञ से रानी को पुत्र हुआ, पर वह मृत जन्मा। शोक में राजा प्राण त्यागने चले तो आकाश से एक देवी प्रकट हुईं — «मैं षष्ठी देवी हूँ, ब्रह्मा की मानस-पुत्री, संतान की रक्षक; मेरी पूजा करो।» राजा-रानी ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उनकी पूजा की और पुत्र जीवित हो उठा — तभी से छठी मैया की पूजा है।

रामायण की कथा — अयोध्या लौटने के बाद राम-सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव का व्रत रखा और सरयू-तट पर डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य दिया; सीता ने मुनि मुद्गल के आश्रम में छह दिन सूर्य की उपासना की। इसी से छठ को «सूर्य षष्ठी» कहते हैं।

महाभारत की कथा — सूर्य-पुत्र कर्ण रोज़ कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे और याचकों को दान करते थे; अंग-प्रदेश (आज का भागलपुर-मुंगेर) के राजा कर्ण से ही बिहार में सूर्य-अर्घ्य की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। द्रौपदी ने भी पांडवों का राज्य लौटाने के लिए छठ का व्रत किया था।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

छठ में सूर्य देव और छठी मैया (षष्ठी देवी — ब्रह्मा की मानस-पुत्री, संतान की रक्षक) की पूजा होती है। मान्यता है कि छठ का व्रत संतान-सुख, परिवार के आरोग्य और सौभाग्य के लिए सबसे फलदायी है — और यह उन गिने-चुने पर्वों में है जहाँ डूबते सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है, यानी उतार में भी कृतज्ञता।

इसमें कोई पंडित, मूर्ति, मंदिर नहीं — सिर्फ़ जल, सूर्य, बाँस का सूप-दउरा, मिट्टी का चूल्हा, गेहूँ-गुड़-घी का ठेकुआ और लोकगीत। शुद्धता का नियम कड़ा है: चार दिन लहसुन-प्याज़ नहीं, नया चूल्हा, ज़मीन पर सोना, हाथ से बना प्रसाद।

ऊपर दी तिथियाँ इंजन-गणना से हैं — षष्ठी (संध्या अर्घ्य) पंचांग से और बाक़ी तीन दिन उसी के सापेक्ष; सप्तमी का उषा-अर्घ्य उसी शहर के सूर्योदय पर होता है, इसलिए अपने शहर का सूर्योदय पंचांग-पन्ने से ज़रूर मिला लें (दिल्ली से पटना में सूर्योदय क़रीब 35-40 मिनट पहले होता है)।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 छठ पूजा (सूर्य षष्ठी) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

छठ पूजा {Y} में कब है?

ऊपर चारों दिन की तालिका है — नहाय-खाय (चतुर्थी), खरना (पंचमी), संध्या अर्घ्य (षष्ठी) और उषा अर्घ्य-पारण (सप्तमी); षष्ठी पंचांग-गणना से, बाक़ी तीन उसी के सापेक्ष।

छठ के अर्घ्य का समय क्या है?

संध्या अर्घ्य षष्ठी के सूर्यास्त पर और उषा अर्घ्य सप्तमी के सूर्योदय पर — ऊपर दिल्ली का समय है। पटना में सूर्योदय-सूर्यास्त दिल्ली से लगभग 35-40 मिनट पहले, लखनऊ में 15-20 मिनट पहले, मुंबई में 25-30 मिनट बाद — अपने शहर का समय पंचांग-पन्ने पर देखें।

छठी मैया कौन हैं?

षष्ठी देवी — ब्रह्मा की मानस-पुत्री और सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं; बालकों की रक्षक देवी। छठ में सूर्य और छठी मैया दोनों की पूजा है।

क्या पुरुष छठ का व्रत रख सकते हैं?

हाँ — छठ में स्त्री-पुरुष दोनों व्रती होते हैं; बिहार में बहुत-से पुरुष परवैत हैं। मन्नत और शुद्धता का नियम सबके लिए एक है।

डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों?

छठ उन इने-गिने पर्वों में है जहाँ अस्त होते सूर्य की भी पूजा है — सिखाता है कि उतार में भी कृतज्ञ रहो; शाम का अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा और सुबह का उषा को समर्पित माना जाता है।

ठेकुआ कैसे बनता है?

गेहूँ का आटा, पिघला गुड़, घी का मोयन, सौंफ-नारियल कड़ा गूँथकर लकड़ी के साँचे में दबाएँ और धीमी आँच पर घी में सुनहरा तलें — ऊपर भोग-खंड में मात्रा दी है। बाज़ार का आटा नहीं, घर में धोकर-सुखाकर पिसवाया आटा।

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