📖 व्रत-कथा

🛌 देवशयनी एकादशी (हरिशयनी / आषाढ़ी एकादशी) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

राजा मांधाता के राज्य में तीन वर्ष अकाल पड़ा; ऋषि अंगिरा ने बताया — «आषाढ़ शुक्ल पद्मा (देवशयनी) एकादशी का व्रत करो, विष्णु प्रसन्न होंगे»; राजा-प्रजा ने व्रत किया, वर्षा हुई, राज्य हरा-भरा — व्रत का फल राज्य-सुख, वर्षा, पाप-नाश। (भविष्योत्तर-पुराण — युधिष्ठिर को कृष्ण ने सुनाई)।

वामन-कथा: वामन ने बलि से तीन पग भूमि माँगी, दो पग में त्रिलोक; बलि ने सिर दिया — विष्णु ने उसे पाताल दिया और वचन के अनुसार उसके द्वार पर चार मास रहे (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी) — इसी को «विष्णु का शयन» कहते हैं; लक्ष्मी ने रक्षाबंधन पर बलि को राखी बाँधकर विष्णु को छुड़ाया (राखी-कथा में)।

शंखासुर-कथा: शंखासुर से युद्ध कर थके विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को क्षीरसागर में शेष-शय्या पर सोए, कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागे — इसीलिए चातुर्मास; सृष्टि इस अवधि में शिव-शक्ति (सावन-नवरात्र) के हाथ; देवउठनी पर विष्णु जागकर तुलसी-विवाह करते हैं।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

पद्म-पुराण: आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विष्णु ने बलि के द्वार पर (या क्षीरसागर में) शयन किया, कार्तिक में जागे — बीच के चार मास शिव सृष्टि-संचालन करते हैं (सावन शिव का); भागवत-लोक में «देव सोए, मंगल रुके» — इसलिए विवाह-मुंडन-गृह-प्रवेश आदि देवउठनी के बाद; पर व्रत-जप-दान-कथा-तीर्थ का फल इन चार महीनों में कई गुना।

एकादशी-व्रत: दशमी की रात से द्वादशी के पारण तक — चावल-अनाज वर्जित, फलाहार/निर्जला; देवशयनी से चातुर्मास-नियम — एक वस्तु का त्याग (श्रावण में साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल), भूमि-शयन, ब्रह्मचर्य, रोज़ कथा — पूरे चार मास; देवउठनी पर समापन।

महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी = पंढरपुर की वारी — आळंदी (ज्ञानेश्वर) व देहू (तुकाराम) से पालखी पैदल 21 दिन, लाखों वारकरी «विठ्ठल-विठ्ठल» — भारत की सबसे बड़ी पैदल-यात्राओं में; गुजरात में «देवपोढ़ी अग्यारस», ओडिशा में रथयात्रा के बाद «हरिशयन», बंगाल में «शयन एकादशी» — जगन्नाथ का शयन।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 देवशयनी एकादशी (हरिशयनी / आषाढ़ी एकादशी) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

देवशयनी एकादशी {Y} में कब है और पारण कब?

ऊपर इस साल की आषाढ़ शुक्ल एकादशी की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) है; पारण अगले दिन द्वादशी में सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) टालकर — पंचांग पर सटीक पारण-समय मिला लें; द्वादशी दोपहर से पहले समाप्त हो तो सुबह जल्दी पारण।

चातुर्मास में क्या-क्या नहीं होता?

विवाह, सगाई (कुछ), मुंडन, यज्ञोपवीत, गृह-प्रवेश, नया व्यापार-आरंभ (कुछ) — देवउठनी एकादशी तक; पर नामकरण-अन्नप्राशन-वाहन-खरीद कुछ पंडित करने देते हैं; व्रत-जप-दान-तीर्थ-कथा-सत्संग के लिए चातुर्मास सबसे शुभ।

चातुर्मास का कौन-सा नियम लूँ?

जो निभ सके — श्रावण में पत्तेदार साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल का त्याग (परंपरा); या प्याज़-लहसुन-त्याग, रोज़ गीता का एक अध्याय, तुलसी-दीप, एक घंटा मौन, रोज़ कुछ दान, भूमि-शयन — एक भी सच्चे मन से पूरा करें; देवउठनी पर समापन-दान।

एकादशी को चावल क्यों नहीं?

पद्म-पुराण में एकादशी को अन्न (विशेषतः चावल) में पाप का वास; लोक-मान्यता — महर्षि मेधा का अंश चावल में (एकादशी के दिन); आयुर्वेद — पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार से पाचन-विश्राम; द्वादशी को चावल से पारण शुभ।

पंढरपुर की वारी क्या है?

महाराष्ट्र के वारकरी आळंदी (संत ज्ञानेश्वर) व देहू (संत तुकाराम) से पालखी लेकर 21 दिन पैदल (250 किमी) पंढरपुर पहुँचते हैं — आषाढ़ी एकादशी को विठ्ठल-दर्शन, चंद्रभागा-स्नान; लाखों लोग, दिंडियाँ, अभंग-कीर्तन — 700 साल पुरानी परंपरा; कार्तिकी एकादशी पर दूसरी वारी।

क्या स्त्रियाँ निर्जला रखें?

फलाहार पर्याप्त — शास्त्र में एकादशी फलाहार-व्रत; निर्जला केवल ज्येष्ठ की निर्जला एकादशी पर विशेष; गर्भवती, रोगी, बुज़ुर्ग फल-दूध लें; व्रत का सार चावल-त्याग, विष्णु-स्मरण व संयम है — भूख से कष्ट नहीं।

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