🚩 हनुमान जयंती (चैत्र पूर्णिमा) व्रत कथा
कथा
पवन-देव के वरदान और अंजनी माता के तप से, चैत्र पूर्णिमा को सूर्योदय के समय, कपि-राज केसरी के घर हनुमान का जन्म हुआ — शिव के ग्यारहवें रुद्र-अंश, वायु-पुत्र। जन्म लेते ही भूख लगी; उगते सूर्य को लाल फल समझकर आकाश में उड़े और निगलने लगे; इंद्र ने वज्र मारा — हनु (ठोड़ी) टूटी, इसीलिए «हनुमान»; पवन-देव रुष्ट हुए, वायु रुक गई; देवताओं ने अनेक वरदान दिए — अजर-अमर, अजेय, इच्छानुसार रूप। ऋषियों के शाप से उन्हें अपनी शक्ति का स्मरण तब तक न रहा जब तक कोई याद न दिलाए — जांबवंत ने समुद्र-तट पर दिलाया।
सुंदरकांड — सीता की खोज में समुद्र लाँघना, लंका-दहन, अशोक-वाटिका में सीता को राम की मुद्रिका; युद्ध में लक्ष्मण के लिए संजीवनी-पर्वत उठाना — «राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम»; राम की भक्ति में सीना चीरकर राम-सीता दिखाना। हनुमान चिरंजीवी हैं — जहाँ राम-कथा, वहाँ हनुमान उपस्थित।
सिंदूर-कथा — एक दिन हनुमान ने सीता को माँग में सिंदूर भरते देखा; पूछा «क्यों?» — «स्वामी की दीर्घायु के लिए»। हनुमान ने सोचा — चुटकी-भर से इतना, तो पूरे शरीर पर लगाने से प्रभु अजर-अमर होंगे — और सिंदूर से रँग गए। राम मुस्काए और वर दिया — जो हनुमान को सिंदूर-तेल चढ़ाएगा, उस पर राम-हनुमान दोनों की कृपा। तभी से सिंदूर-चोला।
कथा का महत्व — यह व्रत क्यों
हनुमान संकटमोचन हैं — «भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै»; उनकी पूजा भय, रोग, शनि-मंगल की पीड़ा और बुरी नज़र से रक्षा के लिए; जो स्त्रियाँ बच्चों/पति की सुरक्षा चाहती हैं, वे इस दिन का व्रत रखती हैं (स्त्रियाँ हनुमान की पूजा करती हैं, बस चोला-सिंदूर स्पर्श कई परंपराओं में पुरुष चढ़ाते हैं)।
जन्म-समय सूर्योदय — इसलिए पूजा ब्रह्म-मुहूर्त/सूर्योदय (ऊपर समय) में; पूर्णिमा होने से चंद्र-अर्घ्य और सत्यनारायण-कथा भी। मंगलवार या शनिवार पड़े तो और विशेष।
सिंदूर की कथा — सीता जी को सिंदूर लगाते देख हनुमान ने राम की दीर्घायु के लिए पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया; तभी से सिंदूर-चोला; चमेली का तेल हनुमान को प्रिय; बूंदी-लड्डू, पान-बीड़ा भोग।
कथा सुनने का नियम
- कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
- व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
- कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।
📿 हनुमान जयंती (चैत्र पूर्णिमा) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
हनुमान जयंती {Y} में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की चैत्र पूर्णिमा है (उत्तर-भारतीय परंपरा) — पंचांग-गणना से; सूर्योदय (जन्म-काल) व चंद्रोदय का दिल्ली-समय भी वहीं। दक्षिण-कर्नाटक-आंध्र में तिथि अलग (मार्गशीर्ष/वैशाख)।
क्या स्त्रियाँ हनुमान जी की पूजा कर सकती हैं?
हाँ — फूल, भोग, दीप, चालीसा-सुंदरकांड, व्रत सब कर सकती हैं; लोक-परंपरा में कई जगह मूर्ति को सिंदूर-चोला चढ़ाना और चरण-स्पर्श पुरुष करते हैं (हनुमान बाल-ब्रह्मचारी) — यह घर-मंदिर की रीत पर निर्भर है; शास्त्र में स्त्री-पूजा वर्जित नहीं।
हनुमान जी को सिंदूर क्यों?
सीता जी की माँग के सिंदूर से राम की दीर्घायु की बात सुनकर हनुमान ने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया — राम प्रसन्न हुए और वर दिया कि सिंदूर-तेल चढ़ाने वाले पर कृपा होगी; इसीलिए सिंदूर-चमेली का चोला।
हनुमान जयंती और हनुमान जन्मोत्सव?
कई विद्वान «जयंती» की जगह «जन्मोत्सव» कहते हैं — क्योंकि हनुमान चिरंजीवी हैं (जयंती दिवंगत के लिए); दोनों नाम प्रचलित, पर्व वही।
मंगल-दोष/शनि-पीड़ा में हनुमान-पूजा?
हनुमान मंगल व शनि दोनों को शांत करने वाले माने गए — मांगलिक/साढ़ेसाती में मंगलवार-शनिवार हनुमान चालीसा, सिंदूर-तेल, गुड़-चना का दान; जयंती से संकल्प लेना उत्तम। कुंडली-पन्ने पर अपना दोष देखें।
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