🙏 हरतालिका तीज (बड़ी तीज) पूजा-विधि — कैसे करें (चरण-दर-चरण)
यह उत्तर-भारतीय घरेलू विधि है — द्वितीया की रात भोजन (सरगी-सी), तृतीया को निर्जला, प्रदोष-पूजा व चार प्रहर, चतुर्थी की सुबह पारण।
हरतालिका तीज (बड़ी तीज) कैसे करें — पूजा के चरण
- द्वितीया (एक दिन पहले): शाम/रात को भरपेट सात्विक भोजन — «सरगी/दर/करू भात» की तरह (छत्तीसगढ़ में करेला-भात, बिहार में दही-चूड़ा-फल, नेपाल में «दर» की दावत); मेहंदी; आधी रात के बाद कुछ नहीं।
- तृतीया: सूर्योदय से पहले स्नान, संकल्प — «मैं अखंड सौभाग्य/मनचाहे वर हेतु हरतालिका तीज का निर्जला व्रत करती हूँ, कल सूर्योदय के बाद पारण करूँगी»; सोलह श्रृंगार, लाल/हरी साड़ी, नई चूड़ियाँ, सिंदूर; दिन में जल नहीं, आराम-भजन, कम बोलना।
- दिन में तैयारी: फुलेरा — बाँस/लकड़ी की चौकी के ऊपर केले के खंभे व फूलों-पत्तियों की छत; हाथ से मिट्टी/काली मिट्टी/रेत के शिव, पार्वती (गौरी), गणेश और (कई घर) रिद्धि-सिद्धि की छोटी प्रतिमाएँ (या बाज़ार की मिट्टी की); केले के पत्ते पर स्थापना; कलश।
- प्रदोष-पूजा (सूर्यास्त के बाद — ऊपर समय — पहला प्रहर): गणेश-पूजन; शिव को जल-दूध-बेलपत्र-धतूरा-भस्म-सफ़ेद फूल; पार्वती को सुहाग की 16 वस्तुएँ (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, कंघी, शीशा, चुनरी, बिछिया, आलता, इत्र, फूल-माला…); «ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः»; हरतालिका व्रत-कथा (नीचे) — 3 बार/हर प्रहर; आरती «जय पार्वती माता»।
- चार प्रहर की पूजा (रात ~9, ~12, ~3 बजे): हर प्रहर में प्रतिमाओं पर फूल-अक्षत, नया दीप, मंत्र, आरती; बीच में भजन-गीत (तीज के लोकगीत), सहेलियों-सुहागिनों का सामूहिक जागरण; सोना नहीं।
- बाया: पूजा के बाद सास/जेठानी को सुहाग-सामग्री, मिठाई, फल, दक्षिणा — पैर छूकर; कन्याएँ बड़ी सुहागिनों से आशीर्वाद।
- चतुर्थी की सुबह (सूर्योदय के बाद): अंतिम पूजा-आरती, पार्वती को चढ़ा सिंदूर अपनी माँग में, प्रतिमाओं व पूजा-सामग्री का विसर्जन (नदी-तालाब या घर के गमले/जल-पात्र में), फुलेरा उतारना; फिर पारण — पहले पूजा का जल/तुलसी-जल, दही-चूड़ा/फल, फिर भोजन (कई घर पारण पति के हाथ से)।
- नई बहू का पहला तीज मायके में (बिहार-यूपी-छत्तीसगढ़) या ससुराल में सास के साथ — रीत से; एक बार शुरू किया व्रत हर साल; बीमार/गर्भवती हों तो फल-जल से या घर की दूसरी स्त्री द्वारा पूजा — भाव अखंड रहे।
पूजा-सामग्री की सूची (checklist)
फुलेरा, मिट्टी की शिव-पार्वती-गणेश प्रतिमाएँ और सुहाग की 16 वस्तुएँ — हरतालिका की पहचान।
- मिट्टी/काली मिट्टी/रेत (शिव-पार्वती-गणेश की हाथ की प्रतिमाएँ) या बाज़ार की मिट्टी की प्रतिमाएँ; केले के पत्ते, चौकी, लाल कपड़ा
- फुलेरा: केले के खंभे/बाँस, फूल-माला (गेंदा-मोगरा-गुलाब), आम-बेल-अशोक के पत्ते, पत्तों की छत
- पार्वती की 16 सुहाग-वस्तुएँ: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, कंघी, शीशा, चुनरी, बिछिया, पायल (प्रतीक), आलता/महावर, इत्र, नथ, कर्णफूल, गजरा, फूल-माला
- शिव को: बेलपत्र, धतूरा, आक, शमी-पत्र, भस्म, जनेऊ, सफ़ेद फूल, जल-दूध-पंचामृत; गणेश को दूर्वा-मोदक
- कलश, नारियल, आम के पत्ते, रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, चंदन, मौली
- दीपक (चार प्रहर के लिए 4+), घी, धूप, कपूर, अगरबत्ती, आरती-थाली, घंटी
- भोग: फल (केला-सेब-अनार-नारियल), मिठाई (लड्डू-पेड़ा), खीर, पंचामृत, पान-सुपारी-लौंग-इलायची
- बाया: सुहाग-सामग्री, मिठाई, फल, वस्त्र, दक्षिणा (सास/जेठानी)
- हरतालिका व्रत-कथा पुस्तक, तीज-गीत
- पारण: दही-चूड़ा/फल, तुलसी-जल; एक दिन पहले «करू भात/दर» का भोजन
एक दिन पहले की दावत, व्रत में कुछ नहीं, पारण का दही-चूड़ा
हरतालिका में तृतीया को कुछ नहीं — भोग सिर्फ़ पार्वती-शिव को (फल-मिठाई-खीर); द्वितीया की रात भरपेट (छत्तीसगढ़ का करू भात, नेपाल का दर, बिहार का दही-चूड़ा); पारण चतुर्थी की सुबह हल्का-मीठा।
- द्वितीया की दावत: छत्तीसगढ़ «करू भात» — करेले की सब्ज़ी-भात (कड़वे से शुरू, ताकि व्रत आसान); बिहार-यूपी — दही-चूड़ा-गुड़, पूड़ी-खीर, फल; नेपाल «दर» — खीर-सेल रोटी-मांस (कुल-रीत); महाराष्ट्र — साबूदाना/फलाहार
- तृतीया: निर्जला — कुछ नहीं (आचमन कुल-रीत से); भोग शिव-पार्वती को — केला, नारियल, सेब, खीर, लड्डू, पंचामृत
- पारण (चतुर्थी सुबह): पहले तुलसी/पूजा-जल, फिर दही-चूड़ा या फल-दूध, फिर हल्का भोजन — खीर-पूड़ी/खिचड़ी; भारी-तला नहीं (24 घंटे बाद पेट)
- छत्तीसगढ़ पारण: ठेठरी-खुरमी-अरसा (तीजा के पकवान), मायके का भोज; महाराष्ट्र: पंचखाद्य/नारियल-खोबरे; बिहार: ठेकुआ-खीर
- गणेश चतुर्थी (अगले दिन) का मोदक-प्रसाद पारण के साथ
नियम — क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- द्वितीया को भरपेट सात्विक भोजन, आधी रात के बाद कुछ नहीं — व्रत सूर्योदय से
- पूजा प्रदोष में, फिर चारों प्रहर — प्रतिमाएँ मिट्टी की, हाथ से; फुलेरा
- कथा हर प्रहर/तीन बार; सुहाग की 16 वस्तुएँ पार्वती को; बाया सास को
- पारण चतुर्थी को सूर्योदय के बाद, प्रतिमा-विसर्जन के बाद — धीरे-धीरे भोजन
- एक बार व्रत लिया तो हर साल — न हो सके तो फलाहार/किसी और से पूजा, भाव न टूटे
❌ क्या न करें
- निर्जला में गर्भवती/रोगी/दूध पिलाने वाली/किशोरियाँ नहीं — फल-जल से; चक्कर-उल्टी पर जल लें (प्राण-रक्षा धर्म)
- रात में सोना नहीं (जागरण) — पर बीमार हों तो विश्राम; व्रत में क्रोध-कलह-चुगली नहीं
- प्रतिमाएँ प्लास्टर-रंग वाली नहीं — मिट्टी की; विसर्जन घर के गमले/जल-कुंड में, नाली में नहीं
- बिना पारण अगला दिन (गणेश चतुर्थी) व्रत बढ़ाना नहीं — 24 घंटे पर पारण
- व्रत को छोड़ने का डर नहीं — बीमारी में छूटे तो उद्यापन/क्षमा-प्रार्थना, अशुभ कुछ नहीं
व्रत-कथा
हिमालय-पुत्री पार्वती ने बाल्यकाल से शिव को पति चाहा और घोर तप किया — बारह वर्ष, पत्ते तक छोड़ दिए (अपर्णा)। नारद ने हिमवान से कहा — कन्या विष्णु के योग्य है; हिमवान ने विष्णु से विवाह तय कर दिया। पार्वती व्याकुल हुईं; उ… पूरी कथा पढ़ें →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
हरतालिका तीज {Y} में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की भाद्रपद शुक्ल तृतीया है — पंचांग-गणना से; प्रदोष (मुख्य पूजा) व सूर्योदय (व्रत-आरंभ/पारण) का दिल्ली-समय भी वहीं; अगला दिन गणेश चतुर्थी।
हरतालिका और हरियाली तीज में क्या अंतर?
हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया (सावन — हरी चूड़ी, झूले, उत्सव, फलाहार); हरतालिका भाद्रपद शुक्ल तृतीया (एक महीने बाद — 24 घंटे निर्जला, रात-जागरण, मिट्टी की प्रतिमाएँ, सबसे कठोर); कजरी तीज बीच में (भाद्रपद कृष्ण तृतीया)।
क्या सचमुच पानी भी नहीं पी सकते?
शास्त्रीय विधान निर्जला (आचमन कुल-रीत से मान्य); सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक। यह कठोर है — स्वस्थ स्त्रियाँ ही; गर्भवती, रोगी, दूध पिलाने वाली फल-जल से रखें; तबीयत बिगड़े तो जल-भोजन लें — व्रत पार्वती का तप है, प्राण-संकट नहीं।
एक बार शुरू किया तो हर साल ज़रूरी?
लोक-परंपरा में हाँ — इसलिए पहला व्रत सोचकर; पर बीमारी/गर्भावस्था/शोक में छूट जाए तो फलाहार से रखें या घर की दूसरी स्त्री पूजा करे, बाद में उद्यापन — अशुभ कुछ नहीं होता, भाव मुख्य है।
चार प्रहर की पूजा कैसे?
सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक रात के चार बराबर भाग (~3 घंटे) — पहला प्रहर प्रदोष (मुख्य पूजा-कथा), फिर ~9, ~12, ~3 बजे — हर बार फूल-अक्षत-दीप-मंत्र-आरती-कथा; सहेलियों के साथ गीत-भजन से जागरण आसान; एक प्रहर भी न हो सके तो प्रदोष-पूजा और सुबह की पूजा पर्याप्त।
मिट्टी की प्रतिमा न बना सकें तो?
बाज़ार की मिट्टी की शिव-पार्वती-गणेश या शालिग्राम/शिवलिंग व गौरी-चित्र भी मान्य; रेत/हल्दी की छोटी पिंडी सबसे सरल; प्लास्टर-रंग वाली मूर्ति नहीं (विसर्जन)।
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