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🪔 पूजा-विधि

👩‍👧‍👦 जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया / जितिया) पूजा-विधि — कैसे करें (चरण-दर-चरण)

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

यह घरेलू विधि है — तीन दिन: सप्तमी नहाय-खाय व ओठगन, अष्टमी निर्जला व जीमूतवाहन-पूजा, नवमी पारण।

जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया / जितिया) कैसे करें — पूजा के चरण

  1. सप्तमी — नहाय-खाय: सुबह नदी/घर पर स्नान, घर की सफ़ाई, सात्विक भोजन एक बार (मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी-तरकारी, अरवा चावल, दही-चूड़ा — प्याज़-लहसुन नहीं); पितरों-दादी को भोजन का अंश (पितृ-पक्ष)।
  2. सप्तमी रात/भोर — ओठगन (सरगही): अष्टमी लगने से पहले (ऊपर तिथि-खिड़की — प्रायः रात 2-4 बजे) अंतिम भोजन-जल — दही-चूड़ा, फल, मिठाई, जल; कई घर सोने से पहले ही; इसके बाद कुछ नहीं — यहाँ से 24 घंटे निर्जला।
  3. अष्टमी — निर्जला व्रत: दिन-भर न अन्न, न जल; दिन में सोना नहीं (कठोर), कथा-भजन; शाम (प्रदोष) को पूजा — कुश/मिट्टी से जीमूतवाहन की मूर्ति (या चित्र), मिट्टी/गोबर से चील (चिल्ही) व सियारिन (सियारो), जल-भरा कलश/मिट्टी का घड़ा, जिउतिया-धागा (लाल-पीला, सोने-चाँदी की जिउतिया पिरोई)।
  4. पूजा: जीमूतवाहन को धूप-दीप-अक्षत-फूल, चील-सियारिन को खीर-पूड़ी/धान-गुड़ (सूखा), जिउतिया-धागे को हल्दी-सिंदूर; कथा (जीमूतवाहन + चील-सियारिन — नीचे) सुनना; «सूर्य-चील-सियारिन» की लोक-प्रार्थना; अंत में धागा गले में (माँ, और बच्चों को भी — कुछ घर)।
  5. व्रत-रात: जागरण/भजन (हो सके तो), जल नहीं; अत्यंत कमज़ोरी/चक्कर हो तो घूँट जल लें — प्राण से बड़ा व्रत नहीं (नीचे FAQ)।
  6. नवमी — पारण: सूर्योदय के बाद, अष्टमी समाप्त होने पर (ऊपर) — पहले जिउतिया-प्रसाद/जल, फिर भोजन — झोर-भात (चावल + मड़ुआ/झिंगनी/नोनी-साग की रसदार सब्ज़ी), दही-चूड़ा, केराव, खीर-पूड़ी; कई घर पारण में 5-7 प्रकार की सब्ज़ी; बच्चों को पहले खिलाना।
  7. जिउतिया-धागा: कम-से-कम अगले व्रत तक गले में; टूटे तो जल में; हर वर्ष नया धागा पूजा में; बेटी की शादी के बाद पहला जिउतिया मायके से (धागा-चूड़ी-कपड़े — «जिउतिया का सिंजारा»)।
  8. दान: नवमी को व्रत-प्रसाद व अन्न-वस्त्र ब्राह्मणी/ग़रीब स्त्री को; पितृ-पक्ष का तर्पण साथ (घर के पुरुष)।

पूजा-सामग्री की सूची (checklist)

जिउतिया-धागा, कुश की जीमूतवाहन-मूर्ति, चील-सियारिन, मड़ुआ-नोनी-झिंगनी — जिउतिया की सूची।

  • जिउतिया-धागा (लाल-पीला सूत), सोने/चाँदी की जिउतिया (लॉकेट — हो सके तो), पुराने धागे (जल में डालने को)
  • कुश/मिट्टी (जीमूतवाहन-मूर्ति), मिट्टी/गोबर (चील-सियारिन), मिट्टी का घड़ा/कलश, जल, आम के पत्ते
  • धूप, दीपक, घी, अक्षत, हल्दी, सिंदूर, फूल, दूब, पान-सुपारी, मौली
  • नैवेद्य: खीर-पूड़ी, धान-गुड़/लावा (चील-सियारिन को सूखा), फल (केला-सेब-अमरूद), मिठाई
  • नहाय-खाय/पारण: मड़ुआ (रागी) आटा, नोनी-साग, झिंगनी (तोरई), केराव (सूखी मटर), अरवा चावल, दही-चूड़ा, गुड़, सरसों-तेल
  • ओठगन/सरगही: दही-चूड़ा, फल, मिठाई, जल (पर्याप्त), दूध
  • जिउतिया-कथा पुस्तक (जीमूतवाहन + चील-सियारिन), भजन
  • बेटी को सिंजारा: धागा, चूड़ी, साड़ी, मिठाई, फल

🛍 पूजा-सामग्री देखें

मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी, दही-चूड़ा, झोर-भात — नहाय-खाय व पारण की रसोई

जिउतिया का भोजन बिहार-झारखंड की पारंपरिक पौष्टिक रसोई — नहाय-खाय व पारण में मड़ुआ (रागी — लौह-कैल्शियम), नोनी-साग (गैया-साग), झिंगनी (तोरई), केराव, अरवा चावल, दही-चूड़ा; ओठगन में दही-चूड़ा-मिठाई-फल; व्रत में कुछ नहीं। नीचे विधि-सहित।

  • मड़ुआ-रोटी (रागी-आटा गुनगुने पानी से गूँधकर तवे पर, घी), नोनी-साग की भुजिया (सरसों-तेल में, लहसुन-रहित — व्रत-भोजन में प्याज़-लहसुन नहीं)
  • झिंगनी (तोरई) की सब्ज़ी/झोर, केराव (सूखी मटर) की घुघनी, अरवा चावल का भात, अरहर की दाल
  • दही-चूड़ा (ओठगन व पारण), गुड़, केला, खीर-पूड़ी (पूजा-नैवेद्य), ठेकुआ (कुछ घर)
  • पारण का झोर-भात: भात + तोरई/नोनी/कद्दू की रसदार सब्ज़ी + दही; 5-7 सब्ज़ी की परंपरा (कुछ घर)
  • यूपी (पूर्वांचल): जिउतिया पर पूड़ी-खीर-खीरा, ओठगन में दही-लाई; झारखंड: मड़ुआ-मार्चा, नोनी-साग; नेपाल-तराई: मड़ुआ-रोटी, माछ नहीं (व्रत-घर)
  • व्रत-दिन: कुछ नहीं (निर्जला); अत्यंत कमज़ोरी में घूँट जल; गर्भवती/रोगी माताएँ फलाहार-रूप

नियम — क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • सप्तमी नहाय-खाय, अष्टमी लगने से पहले ओठगन (पर्याप्त जल-दही-चूड़ा-फल), अष्टमी निर्जला, नवमी सूर्योदय-बाद पारण (ऊपर तिथि-खिड़की)
  • जीमूतवाहन (कुश) + चील-सियारिन की पूजा, दोनों कथाएँ; जिउतिया-धागा गले में
  • पारण में पहले बच्चों को खिलाएँ; झोर-भात/मड़ुआ — पौष्टिक; प्रसाद बाँटें
  • पितृ-पक्ष का ध्यान — नहाय-खाय का अंश पितरों-दादी को; व्रत-दिन दान
  • बेटी को पहला जिउतिया-सिंजारा (धागा-चूड़ी-साड़ी) मायके से

❌ क्या न करें

  • अष्टमी लगने के बाद ओठगन/जल — व्रत खंडित माना जाता (सियारिन की कथा); पर प्राण-संकट में जल लें
  • गर्भवती, मधुमेही, हृदय-रोगी, स्तनपान कराने वाली माताएँ निर्जला न रखें — फलाहार-रूप, संकल्प वही
  • व्रत-भोजन (नहाय-खाय/पारण) में प्याज़-लहसुन-माँस-मछली; तामसिक
  • जिउतिया-धागा टूटने पर फेंकना — जल में डालें, नया पूजा करके पहनें
  • व्रत-दिन दिन में सोना (कठोर रूप), कलह, बच्चों को डाँटना — जिसके लिए व्रत, उसी से प्रेम

व्रत-कथा

गंधर्व-राज जीमूतकेतु के पुत्र जीमूतवाहन धर्मात्मा थे; राज्य त्यागकर ससुराल (मलयवान) में रहते थे। एक दिन वन में एक वृद्धा को रोते देखा — «नागवंश ने गरुड़ से संधि की है कि रोज़ एक नाग उसे भोजन में देंगे; आज मेरे इकलौते बेट… पूरी कथा पढ़ें →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जिउतिया {Y} में कब है — नहाय-खाय, निर्जला, पारण?

ऊपर इस साल की आश्विन कृष्ण अष्टमी (निर्जला-दिन) की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) है — नहाय-खाय एक दिन पहले (सप्तमी), ओठगन अष्टमी लगने से पहले (तिथि-आरंभ ऊपर), पारण अगले दिन (नवमी) सूर्योदय के बाद अष्टमी समाप्त होने पर; बिहार में उदया-तिथि नियम — दो दिन की उलझन हो तो पंचांग/पंडित से मिलाएँ।

व्रत निर्जला 24 घंटे ही क्यों? पानी पी सकते हैं?

परंपरा में अष्टमी पूरी निर्जला (ओठगन से पारण तक); चील-सियारिन की कथा निष्ठा सिखाती है; पर प्राण से बड़ा कोई व्रत नहीं — गर्भवती, रोगी, स्तनपान कराने वाली, बुज़ुर्ग माताएँ जल/फल लें, संकल्प व पूजा वही — शास्त्र में «यथाशक्ति» व्रत; चक्कर/उल्टी हो तो तुरंत जल।

ओठगन (सरगही) कब करें?

अष्टमी-तिथि लगने से पहले — सप्तमी की रात सोने से पहले या भोर (प्रायः 2-4 बजे) उठकर दही-चूड़ा-फल-मिठाई-भरपूर जल; ऊपर तिथि-आरंभ देखें — उसके बाद कुछ नहीं; कई घर सूर्योदय से पहले तक मानते हैं (घर-रीत)।

जिउतिया-धागा क्या है, कब तक पहनें?

लाल-पीले सूत का धागा जिसमें सोने/चाँदी की छोटी «जिउतिया» (जीमूतवाहन-प्रतीक लॉकेट) पिरोई होती है — पूजा में चढ़ाकर माँ गले में पहनती है (बच्चों को भी — कुछ घर); अगले वर्ष के व्रत तक या कम-से-कम कुछ दिन; हर वर्ष नया, पुराना जल में; बेटी को पहला धागा मायके से।

बेटी के लिए भी यह व्रत है?

हाँ — नाम «पुत्रिका» पर व्रत सब संतान के लिए (पुत्र-पुत्री); आधुनिक घरों में माताएँ बेटी-बेटे दोनों के लिए, कहीं गोद-ली संतान/भतीजे-भाँजे के लिए भी; चील-सियारिन की कथा में «सात पुत्र» लोक-रूप है, भाव सब संतान।

अहोई अष्टमी और जिउतिया में अंतर?

दोनों माताओं के संतान-व्रत, दोनों कृष्ण अष्टमी — जिउतिया आश्विन (पितृ-पक्ष में, बिहार-यूपी-झारखंड-नेपाल, 24 घंटे निर्जला, जीमूतवाहन-पूजा), अहोई कार्तिक (करवा चौथ के 4 दिन बाद, उत्तर-पश्चिम भारत, तारा-दर्शन तक निर्जला, अहोई-माता-स्याहु की पूजा); कई पूर्वांचली-दिल्ली परिवार दोनों रखते हैं।

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