📖 व्रत-कथा

🌾 कजरी तीज (बड़ी तीज / सातूड़ी तीज) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

एक ग़रीब ब्राह्मण की पत्नी ने कजरी तीज का व्रत लिया और पति से सत्तू माँगा; ब्राह्मण के पास कुछ न था, वह रात साहूकार की दुकान से सत्तू के लिए चना-जौ-घी-शक्कर लेकर सत्तू पीसने लगा — शोर से साहूकार जागा, चोर समझकर पकड़ा। ब्राह्मण बोला «मैं चोर नहीं, पत्नी के व्रत के लिए केवल सवा सेर सत्तू लिया है, बाकी कुछ नहीं»; तलाशी में सच निकला; उसी समय चाँद निकला — साहूकार ने कहा «आज से तुम्हारी पत्नी मेरी धर्म-बहन», और उन्हें सत्तू, गहने, रुपये, लहरिया देकर घर भेजा। ब्राह्मणी ने चंद्र-अर्घ्य देकर व्रत खोला — घर धन-धान्य से भर गया।

इसी से रीत: सत्तू का पिंडा ही मुख्य प्रसाद, चंद्र-दर्शन के बाद ही पारण, साहूकार का दान — «जो सच्चे मन से कजरी माता (तीज माता/पार्वती) व चंद्रमा को पूजे, नीमड़ी माता उसका सुहाग व घर भरा रखती है»। कहीं यह कथा «सत्तू-चोरी की कथा» नाम से, कहीं पार्वती-तप की — 108 जन्म बाद शिव-वरदान।

कजरी-गीतों की कथा: मिर्ज़ापुर की कजली देवी (विंध्यवासिनी) की स्मृति में सावन-भादों के गीत — विरह, बादल, झूला, पीहर की याद; बनारस-मिर्ज़ापुर की «कजरी दंगल» लोक-संगीत की धरोहर — यही गीत तीज की रात गाए जाते हैं।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

शिव-पार्वती-व्रत: तीनों तीज पार्वती की तपस्या और शिव-प्राप्ति की — हरियाली तीज मिलन, कजरी तीज (भाद्रपद कृष्ण) में पार्वती के 108 जन्मों की तपस्या पूरी होकर शिव ने वरदान दिया (लोक-मान्यता); इसलिए सुहाग-रक्षा व मनचाहे वर का व्रत; व्रत चंद्र-दर्शन-अर्घ्य से खुलता है — करवा चौथ की तरह, इसलिए चंद्रोदय-समय ऊपर।

सत्तू (जौ-चना-गेहूँ का) का पिंडा — घी-शक्कर से बनाकर पूजा में चढ़ाना, फिर पति/बड़ों के हाथ से पारण; राजस्थान में «सातूड़ी»; कृषि-चक्र से जुड़ा — नई फ़सल के जौ-चने की स्मृति, बादलों (कजरा) की कामना — सावन-भादों की खेती के लिए वर्षा-गीत।

पुराने समय में तीज पर मायके से ससुराल «सिंजारा» (कजरी-सिंजारा) — मेहँदी, लहरिया, घेवर, चूड़ियाँ; बूंदी (राजस्थान) का कजली तीज मेला (तीज-माता की सवारी) प्रसिद्ध; उत्तर प्रदेश-बिहार में कजरी-मेले, झूले, कजरी-गायन की प्रतियोगिता; मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में «कजलियाँ/भुजरिया» — रक्षाबंधन-कजरी पर जौ-जवारे का आदान-प्रदान।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 कजरी तीज (बड़ी तीज / सातूड़ी तीज) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कजरी तीज {Y} में कब है और चाँद कब निकलेगा?

ऊपर इस साल की भाद्रपद कृष्ण तृतीया की तिथि व चंद्रोदय-समय (दिल्ली) है — कृष्ण-पक्ष की तृतीया का चाँद रात लगभग 8-9 बजे निकलता है; अपने शहर में ±15-20 मिनट, पंचांग पर मिला लें।

कजरी तीज और हरियाली तीज में अंतर?

हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया (छोटी तीज — झूले, हरे वस्त्र, पार्वती-शिव मिलन); कजरी/बड़ी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया (15 दिन बाद — सत्तू, नीमड़ी माता, चंद्र-अर्घ्य); हरतालिका भाद्रपद शुक्ल तृतीया (निर्जला, रात-जागरण, सबसे कठोर)। तीनों सुहाग-व्रत।

सत्तू का पिंडा ही क्यों?

कथा में ब्राह्मण ने पत्नी के व्रत के लिए सवा सेर सत्तू लिया था — तभी से सत्तू (जौ-चना) कजरी तीज का प्रसाद; नई फ़सल के जौ-चने की स्मृति; घी-शक्कर के पिंडे पूजा में चढ़ाकर चंद्र-अर्घ्य के बाद पति के हाथ से खाकर पारण — «सातूड़ी तीज»।

नीमड़ी माता कौन हैं?

नीम की डाली को «नीमड़ी माता» (तीज माता/पार्वती का रूप) मानकर मिट्टी के तालाब के किनारे रोपकर पूजा — राजस्थान-मालवा की रीत; उसकी छाया/दीपक की लौ में चंद्रमा-सत्तू-नीम का प्रतिबिंब देखना शुभ; नीम रोग-नाशक — सुहाग व स्वास्थ्य दोनों की कामना।

कुँवारी कन्या यह व्रत रख सकती है?

हाँ — मनचाहे वर के लिए; नीमड़ी-चंद्र-पूजा वही, फलाहार व्रत; राजस्थान में कन्याएँ बड़ी तीज व गणगौर दोनों रखती हैं; विवाह के बाद पहला व्रत ससुराल में सिंजारे के साथ।

बादल हों, चाँद न दिखे तो?

चंद्रोदय-समय (ऊपर) के बाद चाँद की दिशा (पूर्व) में अर्घ्य दें या थाली में दर्पण/जल में प्रतिबिंब मानकर पूजा — फिर सत्तू से पारण; व्रत पूर्ण माना जाता है; रात बहुत देर न करें।

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