🌾 कजरी तीज (बड़ी तीज / सातूड़ी तीज) पूजा-विधि — कैसे करें (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — सुबह संकल्प, शाम नीमड़ी माता व सत्तू-पिंडे की पूजा, चंद्र-अर्घ्य, पारण।
कजरी तीज (बड़ी तीज / सातूड़ी तीज) कैसे करें — पूजा के चरण
- सुबह स्नान, लहरिया/हरी-लाल साड़ी, सोलह-शृंगार, मेहँदी (एक दिन पहले सिंजारा); संकल्प — «पति की दीर्घायु/अखंड सौभाग्य हेतु कजरी तीज का निर्जला (या फलाहार) व्रत, चंद्र-अर्घ्य के बाद पारण»।
- सत्तू-पिंडा: जौ/चना/गेहूँ के सत्तू में घी-पिसी शक्कर (या गुड़) मिलाकर गोल पिंडे (लड्डू) — पूजा के लिए 1 बड़ा + घर के लोगों के लिए; कुछ घर सत्तू की «कचौड़ी/परांठा» भी।
- शाम (प्रदोष): तालाब/घर के आँगन में मिट्टी की छोटी बावड़ी/तालाब बनाना, उसके किनारे नीम की डाली (नीमड़ी माता) रोपना, कच्चा दूध-जल, चुनरी; नीमड़ी माता को रोली-मेहँदी-काजल-मौली-चूड़ी, मालपुआ/सत्तू-पिंडा, कुमकुम; दीपक जलाकर उसकी लौ में (या दूध-जल के तालाब में) नीमड़ी माता, चंद्रमा और सत्तू का प्रतिबिंब देखना — यही मुख्य रीत।
- कथा (नीचे — साहूकार-पुत्रवधू/ब्राह्मणी) सुनना, कजरी-गीत गाना, झूला; सास/जेठानी को बायना (सत्तू-पिंडा, फल, रुपये, सुहाग-सामग्री) देकर पैर छूना।
- चंद्रोदय (ऊपर समय) पर अर्घ्य: चाँद को जल-दूध, रोली-अक्षत, सत्तू-पिंडे का भोग; चलनी से चाँद व पति को देखना (कुछ घर); अर्घ्य के बाद पति के हाथ से जल-सत्तू ग्रहण कर पारण — पहले सत्तू, फिर भोजन (पूड़ी-हलवा-सब्ज़ी)।
- कुँवारी कन्याएँ: नीमड़ी-चंद्र-पूजा वही, मनचाहे वर की कामना; व्रत फलाहार।
- अगले दिन: नीम की डाली-चुनरी सम्मान से जल/पेड़ की जड़ में; सत्तू-पिंडा प्रसाद बाँटना; बहू के मायके से आए सिंजारे का आदान।
- बादल की वजह से चाँद न दिखे तो: चंद्रोदय-समय (ऊपर) के बाद चाँद की दिशा में अर्घ्य/पूजा-थाली में दर्पण/जल में प्रतिबिंब — पारण।
पूजा-सामग्री की सूची (checklist)
सत्तू, घी-शक्कर, नीम की डाली, चुनरी, दीपक, अर्घ्य-लोटा — कजरी तीज की सूची।
- सत्तू (जौ/चना/गेहूँ — 250-500 ग्राम), घी, पिसी शक्कर/बूरा/गुड़, इलायची — पिंडे के लिए
- नीम की हरी डाली (नीमड़ी माता), मिट्टी/थाली की बावड़ी-तालाब, कच्चा दूध, जल, कच्चे चावल
- चुनरी (लाल/हरी), रोली, मेहँदी, काजल, मौली, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, सुहाग-सामग्री (बायने के लिए)
- दीपक (घी), घी, अगरबत्ती, कपूर, फूल, कुमकुम, हल्दी, अक्षत
- मालपुआ/खीर, केला-सेब-अमरूद, मिठाई (घेवर — राजस्थान), गुड़-चना
- अर्घ्य-लोटा (तांबा), चलनी, तीज-कथा पुस्तक, कजरी-गीत
- लहरिया/हरी साड़ी, सोलह-शृंगार; सास/जेठानी के लिए बायना (सत्तू-पिंडा, रुपये, फल)
सत्तू के पिंडे, मालपुआ, घेवर, कजरी-भोजन
सत्तू-पिंडा कजरी तीज की पहचान — पूजा व पारण दोनों में; साथ मालपुआ (नीमड़ी माता को), घेवर-फीनी (राजस्थान का सिंजारा), पारण में पूड़ी-हलवा-खीर।
- सत्तू-पिंडा: 2 कप जौ/चना-सत्तू + ½ कप पिघला घी + ¾ कप पिसी शक्कर/गुड़ + इलायची — गूँधकर गोल पिंडे; पूजा का बड़ा पिंडा पति के हाथ से खाकर पारण
- मालपुआ (नीमड़ी माता का भोग), खीर, गुड़-चना, फल (केला-अमरूद-सेब)
- राजस्थान: घेवर-फीनी (सिंजारे में), सातूड़ी के लड्डू, मावा-कचौड़ी (बूंदी); पारण में दाल-बाटी-चूरमा
- उत्तर प्रदेश-बिहार: सत्तू-पराठा/कचौड़ी (अगले दिन), खीर-पूड़ी, गुझिया (कजरी के गीत के साथ)
- मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ (कजलियाँ/भुजरिया): जौ-जवारे का आदान, गुड़-चना, खीर
- व्रत-दिन निर्जला (सामर्थ्य से) या फलाहार — दूध-फल-मखाना; गर्भवती/रोगी फलाहार
नियम — क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- चंद्रोदय (ऊपर समय) के बाद अर्घ्य देकर ही पारण; पहले सत्तू-पिंडा पति/बड़ों के हाथ से
- नीमड़ी माता की पूजा — दीपक की लौ/दूध-जल में प्रतिबिंब देखें; कथा सुनें
- सास/जेठानी को बायना व पैर-स्पर्श; मायके का सिंजारा (मेहँदी-लहरिया) सम्मान से
- सत्तू शुद्ध घी-शक्कर से घर पर; गर्भवती/रोगी फलाहार व्रत
- कजरी-गीत, झूला, परिवार-मिलन — त्योहार का आनंद
❌ क्या न करें
- चाँद देखे बिना व्रत नहीं खोलना (बादल हों तो चंद्रोदय-समय के बाद दिशा में अर्घ्य)
- निर्जला जबरन नहीं — कमज़ोरी/चक्कर हो तो जल-फल लें, व्रत का फल कम नहीं होता
- नीम की डाली काटकर पेड़ को नुक़सान नहीं — छोटी डाली, पूजा के बाद जल/जड़ में
- व्रत-दिन कलह, काले वस्त्र, दिन में सोना; सिंजारे में दिखावा-प्रतिस्पर्धा
- सत्तू-पिंडे में बहुत घी-शक्कर — मधुमेही पति/बड़े हों तो गुड़/कम शक्कर
व्रत-कथा
एक ग़रीब ब्राह्मण की पत्नी ने कजरी तीज का व्रत लिया और पति से सत्तू माँगा; ब्राह्मण के पास कुछ न था, वह रात साहूकार की दुकान से सत्तू के लिए चना-जौ-घी-शक्कर लेकर सत्तू पीसने लगा — शोर से साहूकार जागा, चोर समझकर पकड़ा। ब्… पूरी कथा पढ़ें →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कजरी तीज {Y} में कब है और चाँद कब निकलेगा?
ऊपर इस साल की भाद्रपद कृष्ण तृतीया की तिथि व चंद्रोदय-समय (दिल्ली) है — कृष्ण-पक्ष की तृतीया का चाँद रात लगभग 8-9 बजे निकलता है; अपने शहर में ±15-20 मिनट, पंचांग पर मिला लें।
कजरी तीज और हरियाली तीज में अंतर?
हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया (छोटी तीज — झूले, हरे वस्त्र, पार्वती-शिव मिलन); कजरी/बड़ी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया (15 दिन बाद — सत्तू, नीमड़ी माता, चंद्र-अर्घ्य); हरतालिका भाद्रपद शुक्ल तृतीया (निर्जला, रात-जागरण, सबसे कठोर)। तीनों सुहाग-व्रत।
सत्तू का पिंडा ही क्यों?
कथा में ब्राह्मण ने पत्नी के व्रत के लिए सवा सेर सत्तू लिया था — तभी से सत्तू (जौ-चना) कजरी तीज का प्रसाद; नई फ़सल के जौ-चने की स्मृति; घी-शक्कर के पिंडे पूजा में चढ़ाकर चंद्र-अर्घ्य के बाद पति के हाथ से खाकर पारण — «सातूड़ी तीज»।
नीमड़ी माता कौन हैं?
नीम की डाली को «नीमड़ी माता» (तीज माता/पार्वती का रूप) मानकर मिट्टी के तालाब के किनारे रोपकर पूजा — राजस्थान-मालवा की रीत; उसकी छाया/दीपक की लौ में चंद्रमा-सत्तू-नीम का प्रतिबिंब देखना शुभ; नीम रोग-नाशक — सुहाग व स्वास्थ्य दोनों की कामना।
कुँवारी कन्या यह व्रत रख सकती है?
हाँ — मनचाहे वर के लिए; नीमड़ी-चंद्र-पूजा वही, फलाहार व्रत; राजस्थान में कन्याएँ बड़ी तीज व गणगौर दोनों रखती हैं; विवाह के बाद पहला व्रत ससुराल में सिंजारे के साथ।
बादल हों, चाँद न दिखे तो?
चंद्रोदय-समय (ऊपर) के बाद चाँद की दिशा (पूर्व) में अर्घ्य दें या थाली में दर्पण/जल में प्रतिबिंब मानकर पूजा — फिर सत्तू से पारण; व्रत पूर्ण माना जाता है; रात बहुत देर न करें।
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