📖 व्रत-कथा

📖 मोक्षदा एकादशी (गीता जयंती) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

गोकुल नगर के राजा वैखानस धर्मात्मा थे। एक रात स्वप्न में उन्होंने अपने पिता को नरक में यातना सहते देखा। व्याकुल राजा ने ब्राह्मणों से पूछा; उन्होंने पर्वत मुनि के आश्रम भेजा। मुनि ने ध्यान से देखा — राजा के पिता ने पूर्वजन्म में पत्नी के प्रति अपराध किया था, उसी का फल भोग रहे थे।

मुनि ने कहा — «मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (मोक्षदा) का व्रत विधि से करो और उसका पुण्य पिता को अर्पित कर दो।» राजा ने परिवार-सहित व्रत किया, रात जागरण किया और पुण्य पिता को दिया; पिता नरक से मुक्त होकर स्वर्ग गए और आकाश से आशीर्वाद दिया। तभी से यह एकादशी «मोक्षदा» कहलाई — जो व्रती के पितरों को मुक्ति देती है।

गीता जयंती — इसी तिथि को कुरुक्षेत्र में, युद्ध से ठीक पहले, मोह में डूबे अर्जुन को श्रीकृष्ण ने 700 श्लोकों में कर्म-भक्ति-ज्ञान का वह उपदेश दिया जो गीता है — «कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन»।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

पद्म-पुराण में इसे सब एकादशियों में «मोक्ष-प्रदायिनी» कहा गया — व्रती के साथ उसके पितरों तक को गति। जिनके पितर अशांत लगें, या श्राद्ध छूट गया हो, वे इस दिन का व्रत विशेष रूप से रखते हैं।

गीता जयंती — कुरुक्षेत्र में विशाल उत्सव, गीता-पाठ, «श्रीमद्भगवद्गीता की जय»; घर में गीता के 18 अध्यायों में से एक (प्रायः 12वाँ भक्ति-योग या 15वाँ पुरुषोत्तम-योग) पढ़ना पर्याप्त माना गया।

मार्गशीर्ष को कृष्ण ने «मासानां मार्गशीर्षोऽहम्» कहा है — यह उनका अपना महीना है; इसकी शुक्ल एकादशी विशेष फलदायी। एकादशी-व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी में — ऊपर तिथि दी है।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 मोक्षदा एकादशी (गीता जयंती) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मोक्षदा एकादशी {Y} में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी है — पंचांग-गणना से; पारण की द्वादशी भी वहीं है।

मोक्षदा एकादशी और वैकुंठ एकादशी एक ही हैं?

दक्षिण भारत की वैकुंठ एकादशी धनुर्मास (सौर-मार्गशीर्ष) की शुक्ल एकादशी है — कई वर्षों में यही तिथि होती है, कुछ वर्षों में पौष की। उत्तर भारत में मोक्षदा नाम चलता है।

पितरों को व्रत का पुण्य कैसे अर्पित करें?

पूजा के अंत में हाथ में जल-तिल लेकर बोलें — «मेरे इस व्रत का पुण्य मेरे पितरों (नाम) को प्राप्त हो, उन्हें मोक्ष मिले» — और जल दक्षिण दिशा में छोड़ दें; साथ में उनके नाम से अन्न-वस्त्र दान।

गीता का कौन-सा अध्याय पढ़ें?

पूरी न हो सके तो 12वाँ (भक्ति-योग, 20 श्लोक) या 15वाँ (पुरुषोत्तम-योग, 20 श्लोक) — छोटे और सार-रूप; या 2रा अध्याय (सांख्य-योग)। बच्चों से 47वाँ श्लोक (कर्मण्येवाधिकारस्ते) कंठस्थ कराना अच्छी रीत है।

एकादशी का पारण कब करें?

द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीत जाने पर और द्वादशी समाप्त होने से पहले; प्रायः सुबह 7-9 के बीच।

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