📖 व्रत-कथा

❄️ पौष पूर्णिमा (शाकंभरी जयंती) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

पुराणों में — सौ वर्ष तक वर्षा न हुई, अकाल पड़ा; ऋषियों-प्राणियों ने देवी की स्तुति की। देवी ने अपने शरीर से हज़ार नेत्र निकालकर करुणा के आँसुओं से पृथ्वी सींची और अपने शरीर से शाक-फल-कंद उगाकर सबको भोजन दिया — इसी से «शाकंभरी» (शाक धारण करने वाली) कहलाईं; दुर्गा-सप्तशती (मूर्ति-रहस्य/11वाँ अध्याय) में देवी स्वयं कहती हैं — «शाकैः… शाकंभरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि»। पौष शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक शाकंभरी नवरात्रि, पूर्णिमा को जयंती।

कल्पवास — पद्म-पुराण के अनुसार पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक प्रयाग-संगम पर संयम से रहना (एक समय भोजन, ज़मीन पर सोना, तीन बार स्नान, सत्संग) — «कल्पवास» — का फल सौ वर्ष के तप के बराबर; भरद्वाज-मुनि के आश्रम की परंपरा।

बंगाल की कथा — पौष पूर्णिमा को लक्ष्मी (पौष-लक्ष्मी) की पूजा और नए धान से पीठा; ओडिशा में इसी दिन जगन्नाथ का पुष्याभिषेक (पुष्य नक्षत्र पर राज्याभिषेक-उत्सव)।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

माघ-स्नान का संकल्प इसी पूर्णिमा को लिया जाता है — «पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक रोज़ भोर में स्नान, दान, संयम»; प्रयाग के कल्पवासी इसी दिन संगम-तट पर कुटिया बसाते हैं।

शाकंभरी जयंती — दुर्गा का वह रूप जिसने अकाल में अपने शरीर से शाक (सब्ज़ियाँ-फल) उगाकर संसार को भोजन दिया; इसलिए इस दिन शाक-सब्ज़ी-फल-अन्न का दान और अन्न के प्रति कृतज्ञता — रसोई की देवी का दिन।

पूर्णिमा-व्रत और चंद्र-अर्घ्य; पौष का चंद्रमा सूर्य-तत्व से जुड़ा माना गया है (पौष = सूर्य का महीना) — कई परंपराओं में इस दिन सूर्य-चंद्र दोनों को अर्घ्य।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 पौष पूर्णिमा (शाकंभरी जयंती) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पौष पूर्णिमा {Y} में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की पौष पूर्णिमा है — पंचांग-गणना से; ब्रह्म-मुहूर्त (स्नान) व चंद्रोदय का दिल्ली-समय भी वहीं।

माघ-स्नान/कल्पवास क्या है?

पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक रोज़ भोर में नदी-स्नान, दान, संयम (एक समय भोजन, सत्संग) — घर पर गंगाजल से भी मान्य; प्रयाग-संगम पर कुटिया बनाकर रहना कल्पवास कहलाता है।

शाकंभरी देवी कौन हैं, उनकी पूजा कैसे?

दुर्गा का वह रूप जिसने अकाल में अपने शरीर से शाक-फल उगाकर संसार को खिलाया; पूजा में मौसमी सब्ज़ियाँ-फल चौकी पर सजाकर चढ़ाते हैं और अगले दिन प्रसाद-रूप में खाते-बाँटते हैं; सब्ज़ी-फल-अन्न का दान मुख्य।

पौष पूर्णिमा और मकर संक्रांति का क्या संबंध?

दोनों जनवरी में, कुछ दिनों के अंतर पर — संक्रांति सूर्य से (14 जनवरी के आस-पास), पूर्णिमा चंद्र-तिथि से; दोनों में तिल-गुड़-कंबल का दान और स्नान — सर्दी का पुण्य-पखवाड़ा।

क्या इस दिन सत्यनारायण कथा कर सकते हैं?

हाँ — हर पूर्णिमा की तरह, पौष पूर्णिमा पर भी; माघ-स्नान का संकल्प कथा के साथ लेने की रीत है।

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