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📖 व्रत-कथा

🪢 रक्षाबंधन (राखी) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

इंद्राणी-इंद्र: देवासुर-संग्राम में देवराज इंद्र हारने लगे; गुरु बृहस्पति की सलाह पर इंद्राणी (शची) ने श्रावण पूर्णिमा को रक्षा-सूत्र सिद्ध करके इंद्र की कलाई पर बाँधा — इंद्र विजयी हुए। यह रक्षा-सूत्र की पहली कथा — रक्षा का बंधन।

लक्ष्मी-बलि: राजा बलि को वामन ने पाताल दिया, विष्णु उनके द्वारपाल बने। लक्ष्मी ब्राह्मणी बनकर बलि के पास गईं, श्रावण पूर्णिमा को राखी बाँधकर बहन बनीं और उपहार में «मेरे पति को लौटा दो» माँगा — बलि ने विष्णु को मुक्त किया। रक्षा-मंत्र «येन बद्धो बली राजा…» इसी का है।

द्रौपदी-कृष्ण: शिशुपाल-वध में सुदर्शन से कृष्ण की उँगली कटी; द्रौपदी ने साड़ी का पल्लू फाड़कर बाँधा — कृष्ण ने वचन दिया «हर धागे का ऋण चुकाऊँगा» — चीर-हरण में साड़ी अनंत हुई। लोक-इतिहास में रानी कर्णावती (चित्तौड़) ने हुमायूँ को राखी भेजी थी; यम-यमुना (भाई-दूज से जुड़ी) की कथा भी कही जाती है।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

रक्षा-सूत्र: «येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः, तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल» — जिस सूत्र से लक्ष्मी ने राजा बलि को बाँधा, वही रक्षा-बंधन; बहन के साथ पुरोहित यजमान को, माँ पुत्र को, पत्नी पति को भी बाँध सकती है — मूल में यह «रक्षा» का सूत्र है, भाई-बहन का रूप लोक में सबसे प्रिय हुआ।

भद्रा (विष्टि-करण) श्रावण पूर्णिमा को प्रायः दिन के पहले भाग में होती है; भद्रा में राखी और होलिका-दहन दोनों वर्जित — शूर्पणखा ने भद्रा में रावण को राखी बाँधी थी, कुल का नाश हुआ (लोक-कथा)। भद्रा-मुख/पुच्छ का भेद पंडित बताते हैं; सरल नियम — भद्रा समाप्त होने के बाद, पूर्णिमा रहते।

यही दिन श्रावणी-उपाकर्म (यजुर्वेदियों का नया यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन का आरंभ), हयग्रीव-जयंती, संस्कृत-दिवस (भारत), गायत्री-जयंती (कुछ परंपरा); अमरनाथ-यात्रा का समापन (छड़ी-मुबारक); उत्तराखंड में «जन्योपुन्यू», ओडिशा में गम्हा पूर्णिमा (बलराम-जन्म), बंगाल-गुजरात में झूलन-पूर्णिमा (राधा-कृष्ण के झूले का समापन)।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 रक्षाबंधन (राखी) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रक्षाबंधन {Y} में कब है और भद्रा कब तक?

ऊपर इस साल की श्रावण पूर्णिमा की तिथि, भद्रा-काल (शुरू-समाप्त) और राखी बाँधने की शुभ-खिड़की दिल्ली के अनुसार है — भद्रा के बाद अपराह्न/प्रदोष में बाँधें; अपने शहर का पंचांग पर मिला लें।

भद्रा में राखी क्यों नहीं?

भद्रा (विष्टि-करण) शनि की बहन मानी गईं — अशुभ-काल; लोक-कथा में शूर्पणखा ने भद्रा में रावण को राखी बाँधी और लंका का नाश हुआ। भद्रा में राखी व होलिका-दहन वर्जित; भद्रा-पुच्छ में आपद्-धर्म से कुछ पंडित अनुमति देते हैं।

भाई न हो तो राखी किसे?

भगवान (कृष्ण/गणेश/हनुमान) को, पिता/चचेरे-ममेरे भाई, मुँहबोले भाई, या रक्षा-सूत्र किसी भी रक्षक को — पुरोहित यजमान को, पत्नी पति को, बहन बहन को भी; मूल भाव «रक्षा का बंधन» है।

राखी कब और कैसे उतारें?

कम-से-कम जन्माष्टमी तक या पितृ-पक्ष से पहले; उतारकर बहते जल/पेड़ की जड़ में, या साल-भर तिजोरी में रखकर अगले साल नई राखी के साथ बदलें — कूड़े में नहीं।

श्रावणी-उपाकर्म क्या है?

यजुर्वेदी ब्राह्मणों का वर्ष का नया यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण, ऋषि-तर्पण और वेदाध्ययन का आरंभ — श्रावण पूर्णिमा को (दक्षिण में अवनि अवित्तम, ऋग्वेदी श्रवण-नक्षत्र के दिन); अगले दिन गायत्री-जप (1008)। भद्रा/ग्रहण हो तो तिथि बदलती है — पंचांग/पंडित।

नारियल पूर्णिमा क्या है?

महाराष्ट्र-गोवा-कोंकण में इसी श्रावण पूर्णिमा को मछुआरे समुद्र-देव वरुण को नारियल अर्पित करते हैं — मानसून के बाद समुद्र शांत, नौकाएँ फिर उतरतीं; नारळी-भात बनता है; राखी भी बाँधते हैं।

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