📖 व्रत-कथा

🖤 शनिवार व्रत (शनि देव) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

राजा विक्रमादित्य और शनि की कथा: उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की सभा में एक बार नवग्रहों में «सबसे बड़ा कौन» पर बहस हुई; पंडितों ने शनि को छोड़ सबकी प्रशंसा की — राजा ने भी शनि को क्रूर व छोटा कहा। शनि देव रुष्ट हुए — «विक्रम, तुम मेरा प्रभाव नहीं जानते; जब मैं तुम्हारी राशि पर आऊँगा (साढ़ेसाती) तब देखना।» समय आया — शनि घोड़े-व्यापारी बनकर आए; राजा ने एक सुंदर घोड़ा ख़रीदा, उस पर बैठते ही घोड़ा उसे घने वन में उड़ा ले गया और ग़ायब हो गया। भूखा-प्यासा राजा भटका, एक व्यापारी ने सहारा दिया — पर उसी के घर सोने का हार खूँटी (चित्र में बनी) निगलती दिखी और राजा चोर ठहरा; राजा के हाथ-पैर कटवा दिए गए।

एक तेली ने दया कर उसे कोल्हू पर बैठाया — अपंग राजा बैलों को हाँकता, रात में मेघ-मल्हार गाता; उस नगर की राजकुमारी उस गीत पर मोहित हुई और हठ कर अपंग तेली-सेवक से विवाह किया। साढ़े सात वर्ष पूरे हुए — शनि देव स्वप्न में प्रकट हुए: «विक्रम, यह मेरे अपमान का फल था; अब तेरी परीक्षा पूरी।» राजा ने क्षमा माँगी और प्रार्थना की — «जैसा कष्ट मुझे दिया, वैसा किसी और को न देना।» शनि बोले — «जो शनिवार को मेरा व्रत रखे, तेल-तिल-उड़द दान करे, पीपल पर दीप जलाए, मेरी कथा सुने — उसे मैं पीड़ा नहीं दूँगा।» राजा के हाथ-पैर लौट आए, खूँटी ने हार उगल दिया, सत्य प्रकट हुआ, राजकुमारी सहित विक्रमादित्य उज्जैन लौटे और सबने शनिवार-व्रत अपनाया। सीख — शनि किसी को नहीं छोड़ते, पर श्रद्धा-दान-सेवा से कष्ट सह्य हो जाता है; किसी ग्रह/व्यक्ति का उपहास न करें।

दूसरी कथा (पिप्पलाद/हनुमान-वचन): ऋषि पिप्पलाद ने शनि से पिता की मृत्यु का बदला लेने को ब्रह्मदंड उठाया — शनि लँगड़ाए; ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने वचन दिया कि वे 16 वर्ष से कम आयु व पिप्पलाद (पीपल) के भक्तों को नहीं सताएँगे — इसलिए पीपल-पूजा; और हनुमानजी से लंका में हारकर शनि ने वचन दिया कि हनुमान-भक्तों को नहीं सताएँगे — इसलिए शनिवार को हनुमान-चालीसा।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

शनि: सूर्य व छाया के पुत्र, कर्म-फल के दाता, धैर्य-श्रम-सेवा-न्याय-आयु-दुःख के कारक; काला/नीला रंग, लोहा, तेल, तिल, उड़द, कंबल, नीलम इनके; शनि की दृष्टि व गोचर (साढ़ेसाती/ढैया) जीवन में परीक्षा लाते हैं — पर शास्त्र कहता है शनि निष्पक्ष हैं, सत्कर्मी को उठाते हैं।

साढ़ेसाती: चंद्र-राशि से 12वें, 1ले, 2रे भाव में शनि का गोचर (लगभग साढ़े सात वर्ष) — तीन चरण; ढैया: चंद्र से 4थे/8वें में (ढाई वर्ष)। इनमें शनिवार व्रत, तेल-दान, शनि-स्तोत्र, हनुमान-सेवा, ग़रीब-सेवक-मज़दूर की सहायता — शांति-उपाय; अपनी राशि की साढ़ेसाती-स्थिति कुंडली से जाँचें।

हनुमान व पीपल: शनि ने हनुमानजी को वचन दिया कि उनके भक्तों को नहीं सताएँगे — इसलिए शनिवार को हनुमान-चालीसा/सुंदरकांड; पीपल में विष्णु-वास व शनि की प्रियता — शनिवार शाम पीपल पर सरसों-तेल का दीप और जल-परिक्रमा शनि-शांति का सबसे प्रचलित उपाय।

शनि-मंदिर व शनिश्चरी अमावस्या: शिंगणापुर (महाराष्ट्र), कोकिलावन (मथुरा), तिरुनल्लार (तमिलनाडु), शनि-धाम दिल्ली; शनिवार की अमावस्या «शनिश्चरी अमावस्या» विशेष — तेल-अभिषेक, तिल-दान।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 शनिवार व्रत (शनि देव) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगला शनिवार व्रत कब और {Y} में शनिवार/शनिश्चरी अमावस्या कब?

ऊपर सूची में आने वाले 12 शनिवार माह-पक्ष सहित; अमावस्या-पन्ने पर शनिवार वाली अमावस्या «(शनिश्चरी)» लिखी मिलेगी। आरंभ शुक्ल पक्ष के शनिवार, श्रावण-शनिवार या शनिश्चरी अमावस्या से श्रेष्ठ।

साढ़ेसाती में शनिवार व्रत कैसे करें?

पहले कुंडली से चंद्र-राशि और साढ़ेसाती का चरण देखें; फिर 7/11/19 शनिवार — सुबह शनि-हनुमान पूजा, शनि-मंत्र/स्तोत्र, हनुमान-चालीसा, एक समय भोजन, शाम पीपल-दीप, तेल-तिल-उड़द-कंबल दान, ग़रीब-सेवा; साढ़ेसाती-भर हर शनिवार पीपल-दीप व दान चलता रहे।

पीपल पर दीप कब और कैसे?

शनिवार शाम सूर्यास्त के आसपास (प्रदोष — ऊपर समय) पीपल की जड़ में सरसों-तेल का दीप (काले तिल डालकर), जल चढ़ाकर 7 परिक्रमा, शनि-शांति प्रार्थना; रात में पीपल छूने की लोक-मनाही है, इसलिए सूर्यास्त के साथ।

शनि-मूर्ति के सामने क्यों नहीं खड़े होते?

लोक-परंपरा — शनि की दृष्टि (क्रूर-दृष्टि की ज्योतिष-मान्यता) से बचने को भक्त तिरछे खड़े होकर चरण देखते हैं; शिंगणापुर में चबूतरे पर भक्त पीठ नहीं करते पर सीधा नहीं देखते; भाव श्रद्धा का है, भय का नहीं।

व्रत में क्या खाएँ?

एक समय — उड़द-खिचड़ी/दाल, तिल-गुड़, सरसों-तेल की सब्ज़ी (कुछ घर), दही चल सकता है; या फलाहार; लहसुन-प्याज़-माँस-मद्य नहीं; कई घर शाम पीपल-दीप के बाद भोजन।

शनिवार को तेल-लोहा क्यों नहीं ख़रीदते?

लोक-मान्यता — शनिवार शनि की वस्तुएँ (तेल, लोहा, काला वस्त्र, नमक, कंबल, जूते) ख़रीदने से शनि-कोप, दान से कृपा; शास्त्रीय विधान नहीं, पर घर-घर मानी जाती है — दान करें, ख़रीद टालें।

कितने शनिवार, उद्यापन कैसे, नीलम पहनें?

7, 11 या 19 (साढ़ेसाती में लगातार); उद्यापन — शनि-हनुमान पूजा, तेल-तिल-उड़द-कंबल-लोहे का दान, श्रमिकों का भोजन, स्तोत्र-पाठ, दक्षिणा; नीलम केवल कुंडली-जाँच व पंडित/ज्योतिषी की सलाह से — ग़लत नीलम हानि की मान्यता।

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