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📖 व्रत-कथा

🌕 शरद पूर्णिमा (कोजागरी) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

एक साहूकार की दो बेटियाँ थीं। दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, पर बड़ी बेटी पूरी विधि से और छोटी अधूरे मन से — भोजन करके। विवाह के बाद छोटी बेटी की संतानें जन्म लेते ही मर जाती थीं। पंडितों ने बताया कि अधूरे व्रत का यह फल है।

छोटी बहन ने पूर्णिमा का व्रत विधि से किया, पर उस बार भी उसका पुत्र जन्म के बाद निष्प्राण हो गया। उसने बालक को पटरे पर लिटाकर कपड़ा ढक दिया और बड़ी बहन को बुलाकर उसी पटरे पर बैठने को कहा। बड़ी बहन के बैठते ही उसके पुण्य-व्रत के स्पर्श से बालक रो पड़ा।

बड़ी बहन बोली — «तू मुझ पर हत्या का दोष लगाना चाहती थी?» छोटी ने कहा — «नहीं दीदी, यह तो पहले से मरा था, तुम्हारे व्रत के पुण्य से जीवित हुआ है।» तभी से नगर में शरद पूर्णिमा का व्रत विधि-पूर्वक करने की परंपरा चली — यह कथा सिखाती है कि व्रत मन से और पूरी विधि से हो।

दूसरी कथा कोजागरी की है — इस रात माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर उतरकर पूछती हैं «को जागर्ति?» — जो जागकर उनका स्मरण करता है, उसके घर वे स्थिर रहती हैं। इसीलिए बंगाल में कोजागरी लक्ष्मी पूजा और मिथिला में कोजागरा (नवविवाहित वर के घर) की रीत है।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

आयुर्वेद के अनुसार शरद ऋतु पित्त-प्रधान है और इस रात की चाँदनी शीतल-औषधीय मानी गई — दूध-चावल की खीर चाँदनी में रखने से उसके गुण बढ़ते हैं। इसी से अस्थमा-रोगियों को इस रात खीर खिलाने की लोक-परंपरा है।

यह लक्ष्मी-प्राप्ति का व्रत है — पूर्णिमा को स्त्रियाँ व्रत रखती हैं, शाम को चंद्रोदय पर चंद्र-अर्घ्य, रात में लक्ष्मी-पूजन और जागरण; अगले दिन सुबह खीर का प्रसाद बाँटकर व्रत खोलती हैं।

ब्रज में यह श्रीकृष्ण के महारास की रात है — इसी पूर्णिमा को कृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था; इसलिए रास-पूर्णिमा भी।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 शरद पूर्णिमा (कोजागरी) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शरद पूर्णिमा {Y} में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की आश्विन पूर्णिमा है — पंचांग-गणना से; चंद्रोदय का दिल्ली-समय और पूर्णिमा तिथि की अवधि भी ऊपर है। पूर्णिमा तिथि यदि अगले दिन तक चले तो चाँदनी-खीर उसी रात रखें जिस रात पूर्णिमा तिथि चंद्रोदय के समय हो।

खीर चाँदनी में कितनी देर रखें?

चंद्रोदय के बाद से कम-से-कम आधी रात (12 बजे) तक; परंपरा में पूरी रात और सुबह प्रसाद। जाली से ढककर रखें।

क्या खीर सचमुच औषधि बन जाती है?

यह लोक और आयुर्वेदिक मान्यता है — शरद की शीतल चाँदनी और दूध-चावल का संयोग पित्त-शामक माना गया। इसे श्रद्धा और परंपरा के रूप में लें; किसी रोग का इलाज चिकित्सक से ही कराएँ।

शरद पूर्णिमा और कोजागरी में क्या अंतर है?

दोनों एक ही तिथि हैं — आश्विन पूर्णिमा। उत्तर भारत में खीर-चंद्रमा पर ज़ोर है, बंगाल-ओडिशा-मिथिला-महाराष्ट्र में «कोजागरी» नाम से लक्ष्मी-पूजन व जागरण पर।

शरद पूर्णिमा का व्रत कैसे खोलें?

अगली सुबह चाँदनी में रखी खीर लक्ष्मी-चंद्रमा को भोग लगाकर, उसी के प्रसाद से व्रत खोलें; रात में जागरण किया हो तो आधी रात के बाद भी प्रसाद ले सकते हैं।

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