📖 व्रत-कथा

🥣 शीतला सातम व रांधण छठ (गुजरात) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

एक गाँव में सब स्त्रियाँ रांधण छठ को पकवान बनाकर चूल्हा ठंडा करतीं, सातम को शीतला माता को बासी भोग चढ़ातीं। एक साहूकार की बहू थकान में चूल्हा ठंडा करना भूल गई — अंगारे सुलगते रह गए। रात शीतला माता गाँव में घूमने निकलीं, हर घर के ठंडे चूल्हे पर विश्राम करतीं; बहू के चूल्हे पर लेटते ही जल गईं — क्रोध में देवी ने बहू के सोए बालक को अपने साथ ले लिया (कहीं: बालक को ज्वर-चेचक)।

सुबह बहू ने बच्चा न पाया, रोती हुई शीतला माता की खोज में निकली; रास्ते में मिलीं दो स्त्रियाँ (जिन्होंने माता को ठंडी छाछ पिलाई थी — उनका दुःख दूर हुआ), एक कुम्हार (जिसके आँवा की आग माता ने शांत की); अंत में गाँव-बाहर बरगद के नीचे शीतला माता जली पीठ सेंकती मिलीं; बहू ने पहचानकर ठंडा दही-जल से माता की पीठ शीतल की, क्षमा माँगी — «अब कभी सातम को चूल्हा नहीं जलाऊँगी»; माता ने प्रसन्न होकर बालक जीवित लौटाया और वर दिया — «जो सातम को चूल्हा ठंडा रख मुझे बासी-ठंडा भोग देगा, उसके बालक रोग-मुक्त रहेंगे»।

स्कंद-पुराण की शीतला-कथा: राजा इंद्रद्युम्न की पुत्री शुभकारी ने शीतला-व्रत कर एक सर्प-दंश से मरे ब्राह्मण-परिवार को जिलाया; शीतला — जल-देवी, गधे पर, झाड़ू (रोग बुहारना), सूप (छानना), कलश (ठंडा जल), नीम (औषधि) — चेचक-खसरा की लोक-देवी जिनकी पूजा ठंडक से; गुजरात के सातम-आठम मेले (द्वारका, तरणेतर के आसपास, भावनगर) इसी की स्मृति।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

स्कंद-पुराण: शीतला देवी — गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू-कलश-सूप-नीम, दुर्गा का रूप — रोग-नाशिनी; «शीतले त्वं जगन्माता…» स्तोत्र; उनकी पूजा ठंडे भोजन से — «आज चूल्हा न जले, देवी को शीतलता मिले»; मानसून-अंत के संक्रामक रोग-काल में एक दिन रसोई-विश्राम, बासी-ठंडे भोजन का लोक-स्वास्थ्य-विज्ञान (रांधण छठ का भोजन प्रायः लंबे रहने वाला — थेपला-सूखी सब्ज़ी-अचार)।

तिथि-नियम: गुजरात-सौराष्ट्र-कच्छ में अमांत श्रावण कृष्ण षष्ठी-सप्तमी (जन्माष्टमी से पहले) — ऊपर सूची इसी से; राजस्थान (मारवाड़-जोधपुर) में भी «शीतला सातम» इसी दिन कुछ समाज, अन्य चैत्र की बसौड़ा; मध्य प्रदेश-मालवा में «शीतला सप्तमी» श्रावण में; बंगाल-ओडिशा में शीतला-पूजा चैत्र/फाल्गुन।

स्त्री-व्रत: माताएँ संतान-रक्षा (चेचक-खसरा-ज्वर) हेतु; सातम को उपवास/बासी भोजन, शीतला-दर्शन; नवविवाहिता पहली सातम ससुराल में; रांधण छठ गुजराती रसोई का उत्सव — हर घर 10-15 व्यंजन; «सातम-आठम» (शीतला सातम + जन्माष्टमी) सौराष्ट्र का बड़ा मेला-अवकाश (द्वारका-जूनागढ़-भावनगर के लोक-मेले)।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 शीतला सातम व रांधण छठ (गुजरात) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शीतला सातम और रांधण छठ {Y} में कब हैं?

ऊपर इस साल की दोनों तिथियाँ हैं — रांधण छठ (श्रावण कृष्ण षष्ठी, अमांत) और शीतला सातम (सप्तमी), जन्माष्टमी (आठम) से ठीक पहले; उत्तर-भारतीय पूर्णिमांत पंचांग में यह भाद्रपद कृष्ण षष्ठी-सप्तमी है — तिथि वही; गुजराती पंचांग से मिला लें।

शीतला सातम और शीतला अष्टमी (बसौड़ा) में अंतर?

दोनों शीतला माता के बासी-भोजन पर्व — शीतला सातम गुजरात-सौराष्ट्र-कच्छ की, श्रावण (अमांत) कृष्ण सप्तमी को, जन्माष्टमी से पहले (मानसून-अंत); शीतला अष्टमी/बसौड़ा उत्तर-भारत-राजस्थान-मप्र की, चैत्र कृष्ण अष्टमी को, होली के आठ दिन बाद (वसंत-अंत); विधि एक — पहले दिन पकाना, अगले दिन चूल्हा ठंडा व बासी।

सातम को चाय-दूध भी नहीं?

कठोर रीत में आग बिल्कुल नहीं — चाय भी नहीं; व्यावहारिक घर छठ की रात थर्मस में चाय/दूध रख लेते हैं या ठंडा दूध-छाछ लेते हैं; शिशु-बीमार-बुज़ुर्ग के लिए गर्म चीज़ बनाना दोष नहीं (स्वास्थ्य सर्वोपरि — देवी माँ हैं); माइक्रोवेव को भी «आग» मानते हैं।

बासी भोजन सुरक्षित कैसे रखें?

रांधण छठ को कम नमी वाले, तेल-मसाले वाले व्यंजन (थेपला-ढेबरा-सूखी सब्ज़ी-अचार-लाडू-फरसाण) बनाएँ; दूध-पनीर-खिचड़ी-भात-कढ़ी (जल्दी बिगड़ते) न रखें; ढककर हवादार-ठंडी जगह/फ्रिज (रीत-अनुसार); दही छठ की रात जमाएँ; सुबह सूँघकर देखें — खट्टा-बदबू हो तो न खाएँ, फल-दूध लें।

शीतला माता को कुलेर क्यों?

कुलेर = बाजरे के आटे में घी-गुड़ का सूखा मिश्रण — बिना आग के बनने वाला, ठंडा, टिकाऊ — गुजरात-राजस्थान का शीतला-भोग (नाग पंचमी पर भी); बासी रोटी-दही-गुड़-मीठे चावल-ठंडा जल-नीम भी; देवी को «शीतलता» प्रिय, गर्म-ताज़ा-मसालेदार वर्जित।

सातम-आठम मेला क्या है?

सौराष्ट्र-कच्छ में शीतला सातम + जन्माष्टमी (आठम) के दो-तीन दिन का लोक-मेला व अवकाश — जामनगर, राजकोट, भावनगर, पोरबंदर, द्वारका, भुज में झूले-दुकानें-लोक-नृत्य-रास; किसान-व्यापारी-कारीगर सब छुट्टी; रांधण छठ के पकवान लेकर मेले में; गुजरात के सबसे बड़े ग्रामीण मेलों में।

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