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📖 व्रत-कथा

🌸 शुक्रवार व्रत (संतोषी माता) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

संतोषी माता की कथा: एक बुढ़िया के सात बेटे थे — छह कमाते, सातवाँ निकम्मा। बुढ़िया छहों को स्वादिष्ट भोजन देती और सातवें को उनकी जूठन। सातवें की पत्नी ने यह देख पति से कहा; उसने माँ के प्रेम पर विश्वास न किया, फिर एक दिन आँखों से देखा — दुखी होकर परदेस कमाने चला गया। वहाँ सेठ के यहाँ बारह वर्ष में धन-धान्य कमा लिया, पर घर की सुध न ली। इधर पत्नी को सास-जेठानियों ने जंगल से लकड़ी लाने, भूसी की रोटी और नारियल के खोल में पानी देने का कष्ट दिया।

एक दिन लकड़ी लाते उसने स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा — विधि पूछी: «शुक्रवार को नहा-धोकर सवा आने का गुड़-चना लो, कथा सुनो, खट्टा मत खाओ-खिलाओ, 16 शुक्रवार करो।» उसने लकड़ी बेचकर गुड़-चना लिया, व्रत किया। माता प्रसन्न हुईं — दो शुक्रवार बाद पति को स्वप्न में घर की याद दिलाई, सेठ से हिसाब दिलाकर धन सहित लौटाया। पत्नी ने उद्यापन किया — पर जेठानियों ने बहकाकर बच्चों को उद्यापन के भोजन में खटाई खिला दी (इमली/खटाई माँगी और दी गई)। माता रुष्ट हुईं — पति को राजा के सिपाही पकड़ ले गए।

पत्नी ने भूल समझी, माता से क्षमा माँगी और फिर विधिपूर्वक 8 ब्राह्मण-बालकों को बिना खटाई भोजन कराया — पति छूटकर लौटा, पुत्र हुआ। माता स्वयं वृद्धा-रूप में घर आईं; सास-जेठानियों ने द्वार बंद किया तो माता ने अपना रूप दिखाया, सबने क्षमा माँगी और घर में सुख-संतोष लौटा। सीख — व्रत श्रद्धा से, खट्टे का पूरा परहेज़, और उद्यापन में बच्चों को खटाई न खिलाना — यही इस कथा की आत्मा है।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

संतोषी माता: गणेशजी और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री — नाम ही «संतोष» का; मान्यता है कि इनका व्रत घर में सुख-शांति, पति-पत्नी में मेल, रुका धन, विवाह और संतान का मार्ग खोलता है। यह व्रत 1975 की फ़िल्म «जय संतोषी माँ» के बाद घर-घर पहुँचा, पर इसकी रीत — गुड़-चना, खट्टे का त्याग, 16 शुक्रवार — पुरानी लोक-परंपरा की है।

शुक्र-ग्रह: सौंदर्य, विवाह, दांपत्य-सुख, वैभव, वाहन और कला का कारक; कुंडली में शुक्र कमज़ोर हो तो शुक्रवार व्रत, सफ़ेद वस्तु (चावल, दूध, चीनी, सफ़ेद वस्त्र) का दान, «ॐ शुं शुक्राय नमः» जप और लक्ष्मी-पूजा शांति-उपाय माने जाते हैं।

लक्ष्मी-वार: शुक्रवार को शाम की लक्ष्मी-आरती, घर की सफ़ाई, तुलसी-दीप और धन-धान्य की प्रार्थना — इसलिए घर की महिलाएँ शुक्रवार को नए काम, ख़रीद और मीठा बनाना शुभ मानती हैं।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 शुक्रवार व्रत (संतोषी माता) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगला शुक्रवार व्रत कब है और {Y} में शुक्रवार कब-कब पड़ेंगे?

ऊपर सूची में आने वाले 12 शुक्रवार माह-पक्ष सहित हैं; 16-शुक्रवार व्रत किसी भी शुक्रवार से शुरू कर सकते हैं — शुक्ल पक्ष का पहला शुक्रवार श्रेष्ठ; अधिक मास/पितृपक्ष में आरंभ न करें (चलता व्रत जारी रखें)।

संतोषी माता व्रत के दिन क्या-क्या नहीं खाना चाहिए?

कोई भी खट्टी चीज़ — नींबू, इमली, आँवला, अचार, दही-छाछ, टमाटर, कच्चा आम, चटनी, खट्टे फल (संतरा-मौसमी); और यह नियम व्रत-दिन पूरे घर (बच्चों-मेहमानों) पर लागू है। नमक चलता है (उद्यापन में कई घर सेंधा/कम)।

व्रत में कितनी बार भोजन और क्या?

एक समय सादा भोजन या फलाहार — सब्ज़ी-रोटी/पूरी, खीर, हलवा, फल, दूध; सुबह प्रसाद गुड़-चना। बाक़ी दिन जल-चाय-दूध ले सकते हैं।

16 शुक्रवार के बीच एक छूट जाए तो?

गिनती जहाँ छूटी वहीं से अगले शुक्रवार आगे बढ़ाएँ (दोबारा 1 से नहीं); मासिक-धर्म के शुक्रवार पूजा न करें, गिनती में जोड़ लें — यही लोक-रीत है, कुल-रीत अलग हो तो वही।

उद्यापन कैसे करें, कितने बच्चे?

16वें शुक्रवार को 8 बालक (न मिलें तो जितने हों, या कन्याएँ) — खीर-पूरी-काले चने की सब्ज़ी, केला, दक्षिणा; भोजन में खटाई बिल्कुल नहीं; माता की पूजा-कथा-आरती; कुछ घर उसी दिन ब्राह्मण-भोजन।

पुरुष या अविवाहित कन्या रख सकते हैं?

हाँ — व्रत सबके लिए है; कन्याएँ अच्छे वर, पुरुष धन-कार्य-संतोष के लिए रखते हैं; नियम वही 16 शुक्रवार व खट्टा-त्याग।

संतोषी माता और वैभव लक्ष्मी व्रत में क्या अंतर?

दोनों शुक्रवार के; संतोषी माता — गुड़-चना, खट्टा-त्याग, 16 शुक्रवार, 8 बालक; वैभव लक्ष्मी — श्रीयंत्र व सोने/चाँदी की वस्तु की पूजा, खीर-भोग, 11/21 शुक्रवार, 7 सुहागिनों को कुंकुम-प्रसाद (अलग पन्ना)। दोनों साथ नहीं रखने चाहिए — एक चुनें।

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