🌳 वट सावित्री व्रत व्रत कथा
कथा
मद्र-देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने वन में राज्य-हीन, अंधे राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति चुना। नारद ने बताया — सत्यवान की आयु एक वर्ष है। सावित्री अडिग रही, विवाह हुआ, वह वन में सास-ससुर की सेवा करती रही। वर्ष पूरा होने से तीन दिन पहले उसने निर्जला व्रत (त्रयोदशी से) लिया।
अंतिम दिन (ज्येष्ठ अमावस्या) सत्यवान लकड़ी काटने वन गया, सावित्री साथ; वट के नीचे सत्यवान का सिर चकराया, सावित्री ने गोद में लिया — यमराज आए, प्राण ले चले। सावित्री पीछे-पीछे चली; यम ने लौटने को कहा, उसने धर्म-ज्ञान से यम को प्रसन्न किया; यम ने वर दिए — ससुर की आँखें, राज्य, पिता को सौ पुत्र; अंत में सावित्री ने माँगा «सत्यवान से सौ पुत्र» — यम ने «तथास्तु» कहा और तब समझे — पति के बिना असंभव; यम ने सत्यवान के प्राण लौटाए।
वट के नीचे सत्यवान जागा; लौटे तो ससुर की आँखें व राज्य लौट आया था। तभी से सुहागिनें ज्येष्ठ अमावस्या को वट-पूजा और सावित्री का स्मरण करती हैं — पतिव्रता की बुद्धि और धैर्य से मृत्यु भी लौटती है। (महाभारत, वन-पर्व — मार्कंडेय ने युधिष्ठिर को सुनाई।)
कथा का महत्व — यह व्रत क्यों
वट (बरगद) में ब्रह्मा (जड़), विष्णु (तना), महेश (शाखाएँ) का वास माना गया — अक्षय-वट अमर है; सावित्री ने वट के नीचे ही मरणासन्न सत्यवान का सिर गोद में लिया और यम से पति के प्राण माँगे — इसलिए वट की परिक्रमा और सूत से «बाँधना» (पति-जीवन का रक्षा-सूत्र)।
व्रत तीन दिन (त्रयोदशी से अमावस्या) का भी रखा जाता है — त्रयोदशी को संकल्प, चतुर्दशी-अमावस्या को उपवास; सामान्यतः अमावस्या का एक दिन — निर्जला या फलाहार, पूजा-कथा के बाद पति के हाथ से जल/फल।
ज्येष्ठ अमावस्या = शनि जयंती (शनि का जन्म) — इसलिए काले तिल-तेल का शनि-दान और शनि-मंदिर में तेल भी इसी दिन; ज्येष्ठ की गर्मी में वट की छाया, जल और पंखे का दान।
कथा सुनने का नियम
- कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
- व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
- कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।
📿 वट सावित्री व्रत की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
वट सावित्री व्रत {Y} में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की ज्येष्ठ अमावस्या है (उत्तर-भारतीय परंपरा) — पंचांग-गणना से; अमावस्या तिथि की अवधि व पूजा-मुहूर्त (दिल्ली) भी वहीं। महाराष्ट्र-गुजरात-दक्षिण में ज्येष्ठ पूर्णिमा (15 दिन बाद) को वट पूर्णिमा।
अमावस्या को या पूर्णिमा को — कौन सही?
दोनों शास्त्र-सम्मत — स्कंद-भविष्य पुराण में अमावस्या (उत्तर भारत), निर्णयामृत आदि में पूर्णिमा (महाराष्ट्र-दक्षिण); कथा-विधि एक; अपने कुल-प्रदेश की रीत मानें।
बरगद न मिले तो?
घर में गमले का बरगद/बोनसाई, या बरगद की एक डाल (गिरी हुई/मंदिर से) लाकर, या चित्र/मिट्टी का वट — वही विधि; सूत लपेटकर परिक्रमा उसी के चारों ओर।
कच्चा सूत क्यों लपेटते हैं?
सावित्री ने पति के प्राण यम से लौटाए — सूत का बंधन पति-जीवन की रक्षा का प्रतीक है («रक्षा-सूत्र»), वट अमर है; परिक्रमा 7 फेरे विवाह के सात फेरों की स्मृति।
नई बहू पहला व्रत कहाँ रखे?
लोक-रीत में पहला वट सावित्री ससुराल में सास के साथ (सास को बाया), कुछ इलाक़ों (मिथिला) में मायके से बाया आता है; जहाँ रहें वहीं व्रत मान्य — कथा और वट-पूजा मुख्य।
वट सावित्री पर शनि जयंती का क्या करें?
ज्येष्ठ अमावस्या शनि का जन्मदिन — काले तिल, सरसों तेल, काला वस्त्र, लोहा, उड़द का दान; शाम को पीपल पर तेल-दीप; साढ़ेसाती/ढैया वालों के लिए विशेष। कुंडली-पन्ने पर अपनी शनि-स्थिति देखें।
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