| शहर | तारीख | होलिका दहन मुहूर्त (प्रदोष काल, भद्रा-रहित) | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| सिडनी AEST/AEDT | मंगलवार, 3 मार्च 2026 | 7:29 PM – 9:44 PM AEDT | 2 मार्च, 11:26 PM → 3 मार्च, 10:38 PM AEDT |
| मेलबर्न AEST/AEDT | मंगलवार, 3 मार्च 2026 | 7:57 PM – 10:11 PM AEDT | 2 मार्च, 11:26 PM → 3 मार्च, 10:38 PM AEDT |
| ब्रिस्बेन AEST | मंगलवार, 3 मार्च 2026 | 6:18 PM – 8:35 PM AEST | 2 मार्च, 10:26 PM → 3 मार्च, 9:38 PM AEST |
| पर्थ AWST | मंगलवार, 3 मार्च 2026 | 6:49 PM – 7:38 PM AWST | 2 मार्च, 8:26 PM → 3 मार्च, 7:38 PM AWST |
| एडिलेड ACST/ACDT | मंगलवार, 3 मार्च 2026 | 7:51 PM – 10:06 PM ACDT | 2 मार्च, 10:56 PM → 3 मार्च, 10:08 PM ACDT |
समय स्थानीय (DST-सहित)। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
| रंगवाली होली (धुलंडी) | बुधवार, 4 मार्च 2026 |
अन्य शहरों में एक दिन का अंतर हो सकता है; शहर-वार तारीखें उस पर्व के पन्ने पर।
फाल्गुन पूर्णिमा प्रदोष (स्थानीय सूर्यास्त के बाद) में; भद्रा पृथ्वी-लोक में हो (चंद्र कर्क/सिंह/कुंभ/मीन) तो टालकर; भद्रा अर्धरात्रि पार करे तो भद्रा-पुच्छ में। दूसरे दिन पूर्णिमा सूर्योदय के बाद साढ़े-तीन प्रहर रहे और प्रतिपदा पूर्णिमा से लंबी हो तो दहन दूसरी शाम।
होलिका दहन का नियम: प्रदोष-काल में, पूर्णिमा तिथि में और **भद्रा-रहित** समय में — भद्रा (विष्टि करण) में दहन वर्जित; भद्रा हो तो उसके बाद (या भद्रा-पुच्छ में)। इसीलिए हर साल का मुहूर्त अलग — ऊपर प्रदोष का समय दिया है; भद्रा का समय अपने शहर के पंचांग-पन्ने पर देखें।
होलाष्टक: होली से आठ दिन पहले (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा) मांगलिक कार्य वर्जित — विवाह, गृह-प्रवेश नहीं; होली के बाद चैत्र-नवरात्रि तक फिर मुहूर्त खुलते हैं।
नई फ़सल: दहन की आग में गेहूँ-जौ-चने की हरी बालियाँ भूनकर (होला) प्रसाद खाना और घर लाना — यही «होली» नाम का एक मूल; दहन की राख/अग्नि घर लाकर चूल्हा जलाना शुभ। बुराई (होलिका) जली, भक्ति (प्रह्लाद) बची — यह भाव।
हाँ — मंगलवार, 3 मार्च 2026।
होलिका दहन मुहूर्त (प्रदोष काल, भद्रा-रहित): 7:29 PM से 9:44 PM (AEDT)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में, DST-सहित (सिडनी के लिए AEST/AEDT)।
होली से पहले के आठ दिन (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा) — इनमें विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते; होली के बाद फिर शुरू।
गोबर की छेद वाली छोटी टिकियाँ (सूखी) जिन्हें सूत में पिरोकर मालाएँ बनाई जाती हैं — पितरों, हनुमान जी, शीतला माता, घर के नाम से — और होलिका दहन में चढ़ाई जाती हैं; उत्तर भारत की स्त्रियों की रीत।
होली के पाँचवें दिन (चैत्र कृष्ण पंचमी) महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश में रंगों का मुख्य दिन — इंदौर-उज्जैन की «गेर», मुंबई-पुणे की रंगपंचमी; ब्रज में इस दिन तक फाग चलता है।
होली के 7-8 दिन बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी (या सप्तमी) — शीतला माता को एक दिन पहले बना ठंडा भोजन चढ़ाना, उस दिन चूल्हा न जलाना; बच्चों की चेचक-रक्षा का व्रत (पन्ना अलग है)।