| शहर | तारीख | पूर्वाह्न पूजा-समय | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| टोरंटो Eastern Time (EST/EDT) | शनिवार, 16 मई 2026 | 5:51 AM – 11:45 AM EDT | 15 मई, 7:42 PM → 16 मई, 4:11 PM EDT |
| ब्रैम्पटन Eastern Time (EST/EDT) | शनिवार, 16 मई 2026 | 5:53 AM – 11:47 AM EDT | 15 मई, 7:42 PM → 16 मई, 4:03 PM EDT |
| वैंकूवर Pacific Time (PST/PDT) | शनिवार, 16 मई 2026 | 5:28 AM – 11:37 AM PDT | 15 मई, 4:42 PM → 16 मई, 1:08 PM PDT |
| कैलगरी Mountain Time (MST/MDT) | शनिवार, 16 मई 2026 | 5:45 AM – 12:00 PM MDT | 15 मई, 5:42 PM → 16 मई, 2:05 PM MDT |
| एडमंटन Mountain Time (MST/MDT) | शनिवार, 16 मई 2026 | 5:31 AM – 11:55 AM MDT | 15 मई, 5:42 PM → 16 मई, 2:11 PM MDT |
| मॉन्ट्रियल Eastern Time (EST/EDT) | शनिवार, 16 मई 2026 | 5:23 AM – 11:21 AM EDT | 15 मई, 7:42 PM → 16 मई, 4:03 PM EDT |
समय स्थानीय (DST-सहित)। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
स्थानीय सूर्योदय पर तिथि (उदया तिथि)।
वट (बरगद) में ब्रह्मा (जड़), विष्णु (तना), महेश (शाखाएँ) का वास माना गया — अक्षय-वट अमर है; सावित्री ने वट के नीचे ही मरणासन्न सत्यवान का सिर गोद में लिया और यम से पति के प्राण माँगे — इसलिए वट की परिक्रमा और सूत से «बाँधना» (पति-जीवन का रक्षा-सूत्र)।
व्रत तीन दिन (त्रयोदशी से अमावस्या) का भी रखा जाता है — त्रयोदशी को संकल्प, चतुर्दशी-अमावस्या को उपवास; सामान्यतः अमावस्या का एक दिन — निर्जला या फलाहार, पूजा-कथा के बाद पति के हाथ से जल/फल।
ज्येष्ठ अमावस्या = शनि जयंती (शनि का जन्म) — इसलिए काले तिल-तेल का शनि-दान और शनि-मंदिर में तेल भी इसी दिन; ज्येष्ठ की गर्मी में वट की छाया, जल और पंखे का दान।
हाँ — शनिवार, 16 मई 2026।
पूर्वाह्न पूजा-समय: 5:51 AM से 11:45 AM (EDT)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में, DST-सहित (टोरंटो के लिए Eastern Time (EST/EDT))।
दोनों शास्त्र-सम्मत — स्कंद-भविष्य पुराण में अमावस्या (उत्तर भारत), निर्णयामृत आदि में पूर्णिमा (महाराष्ट्र-दक्षिण); कथा-विधि एक; अपने कुल-प्रदेश की रीत मानें।
घर में गमले का बरगद/बोनसाई, या बरगद की एक डाल (गिरी हुई/मंदिर से) लाकर, या चित्र/मिट्टी का वट — वही विधि; सूत लपेटकर परिक्रमा उसी के चारों ओर।
सावित्री ने पति के प्राण यम से लौटाए — सूत का बंधन पति-जीवन की रक्षा का प्रतीक है («रक्षा-सूत्र»), वट अमर है; परिक्रमा 7 फेरे विवाह के सात फेरों की स्मृति।
लोक-रीत में पहला वट सावित्री ससुराल में सास के साथ (सास को बाया), कुछ इलाक़ों (मिथिला) में मायके से बाया आता है; जहाँ रहें वहीं व्रत मान्य — कथा और वट-पूजा मुख्य।