| शहर | तारीख | पूर्वाह्न पूजा-समय | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| टोरंटो Eastern Time (EST/EDT) | शुक्रवार, 4 जून 2027 | 5:38 AM – 11:44 AM EDT | 3 जून, 6:36 PM → 4 जून, 3:48 PM EDT |
| ब्रैम्पटन Eastern Time (EST/EDT) | शुक्रवार, 4 जून 2027 | 5:39 AM – 11:46 AM EDT | 3 जून, 6:36 PM → 4 जून, 3:49 PM EDT |
| वैंकूवर Pacific Time (PST/PDT) | शुक्रवार, 4 जून 2027 | 5:10 AM – 11:35 AM MST | 3 जून, 3:36 PM → 4 जून, 12:50 PM MST |
| कैलगरी Mountain Time (MST/MDT) | शुक्रवार, 4 जून 2027 | 5:25 AM – 11:57 AM MDT | 3 जून, 4:36 PM → 4 जून, 1:45 PM MDT |
| एडमंटन Mountain Time (MST/MDT) | शुक्रवार, 4 जून 2027 | 5:09 AM – 11:52 AM MDT | 3 जून, 4:36 PM → 4 जून, 1:49 PM MDT |
| मॉन्ट्रियल Eastern Time (EST/EDT) | शुक्रवार, 4 जून 2027 | 5:08 AM – 11:20 AM EDT | 3 जून, 6:36 PM → 4 जून, 3:48 PM EDT |
समय स्थानीय (DST-सहित)। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
स्थानीय सूर्योदय पर तिथि (उदया तिथि)।
वट (बरगद) में ब्रह्मा (जड़), विष्णु (तना), महेश (शाखाएँ) का वास माना गया — अक्षय-वट अमर है; सावित्री ने वट के नीचे ही मरणासन्न सत्यवान का सिर गोद में लिया और यम से पति के प्राण माँगे — इसलिए वट की परिक्रमा और सूत से «बाँधना» (पति-जीवन का रक्षा-सूत्र)।
व्रत तीन दिन (त्रयोदशी से अमावस्या) का भी रखा जाता है — त्रयोदशी को संकल्प, चतुर्दशी-अमावस्या को उपवास; सामान्यतः अमावस्या का एक दिन — निर्जला या फलाहार, पूजा-कथा के बाद पति के हाथ से जल/फल।
ज्येष्ठ अमावस्या = शनि जयंती (शनि का जन्म) — इसलिए काले तिल-तेल का शनि-दान और शनि-मंदिर में तेल भी इसी दिन; ज्येष्ठ की गर्मी में वट की छाया, जल और पंखे का दान।
हाँ — शुक्रवार, 4 जून 2027।
पूर्वाह्न पूजा-समय: 5:38 AM से 11:44 AM (EDT)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में, DST-सहित (टोरंटो के लिए Eastern Time (EST/EDT))।
दोनों शास्त्र-सम्मत — स्कंद-भविष्य पुराण में अमावस्या (उत्तर भारत), निर्णयामृत आदि में पूर्णिमा (महाराष्ट्र-दक्षिण); कथा-विधि एक; अपने कुल-प्रदेश की रीत मानें।
घर में गमले का बरगद/बोनसाई, या बरगद की एक डाल (गिरी हुई/मंदिर से) लाकर, या चित्र/मिट्टी का वट — वही विधि; सूत लपेटकर परिक्रमा उसी के चारों ओर।
सावित्री ने पति के प्राण यम से लौटाए — सूत का बंधन पति-जीवन की रक्षा का प्रतीक है («रक्षा-सूत्र»), वट अमर है; परिक्रमा 7 फेरे विवाह के सात फेरों की स्मृति।
लोक-रीत में पहला वट सावित्री ससुराल में सास के साथ (सास को बाया), कुछ इलाक़ों (मिथिला) में मायके से बाया आता है; जहाँ रहें वहीं व्रत मान्य — कथा और वट-पूजा मुख्य।