अस्त ग्रह (Combust): जब सूर्य के तेज में ग्रह छिप जाता है
सूर्य के बहुत निकट आ जाने पर ग्रह उसके प्रकाश में डूबकर आकाश से 'ग़ायब' हो जाता है — न भोर में दिखता है, न साँझ को। इसी स्थिति को अस्त या combust होना कहते हैं।
फलित में अस्त ग्रह का अर्थ है — उस ग्रह के कारकत्व और उसके भावों का फल क्षीण, ढका हुआ या विलंबित। यह कुंडली-विश्लेषण की उन बारीक़ियों में है जिन्हें अनदेखा करने से फलादेश बार-बार चूकता है।
कब अस्त माना जाता है — अंश-सीमाएँ
हर ग्रह की सूर्य से अपनी अस्त-सीमा है (सूर्य से अंश-दूरी इससे कम हो तो अस्त):
- चंद्र — 12°
- मंगल — 17°
- बुध — 14° (वक्री हो तो 12°)
- गुरु — 11°
- शुक्र — 10° (वक्री हो तो 8°)
- शनि — 15°
- राहु-केतु — छाया-ग्रह हैं, अस्त नहीं होते
अस्त ग्रह का फल कैसे बदलता है
अस्त ग्रह राजा (सूर्य) के अति-निकट खड़े सेवक जैसा है — उपस्थित है, पर अपनी स्वतंत्र आवाज़ खो बैठा है। उसके कारकत्व दबते हैं: अस्त गुरु में गुरु-जनों का सुख व धार्मिक निर्णय-बल घटता है, अस्त शुक्र में दांपत्य-सुख व कला-रस फीका पड़ता है, अस्त बुध में वाणी-व्यापार की धार कम होती है।
जिन भावों का वह स्वामी है, उनके फल भी विलंब से या घटकर मिलते हैं। पर ध्यान रखिए — अस्त होना ग्रह का नाश नहीं है। राशि-बल, वर्ग-बल और शुभ-दृष्टि अच्छी हो तो अस्तता का प्रभाव बहुत घट जाता है; बुध तो सूर्य के साथ इतना रहता है कि उसकी अस्तता का भार परखकर ही कहा जाता है (बुधादित्य-योग इसी युति का शुभ पक्ष है)।
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व्यवहार में अस्त ग्रह की जाँच इन प्रश्नों में निर्णायक होती है:
- विवाह-विचार में अस्त शुक्र/गुरु — दांपत्य-कारक क्षीण, समय और मिलान अधिक सावधानी से
- मुहूर्त-शास्त्र में अस्त गुरु-शुक्र के काल (तारा/शुक्रास्त) — विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित
- दशा-विचार में अस्त ग्रह की दशा — फल देर से, परिश्रम अधिक
- रत्न-निर्णय में — अस्त ग्रह प्रायः रत्न से बल पाने का प्रथम उम्मीदवार
अस्त + वक्री, अस्त + नीच: मिश्रित स्थितियाँ
ग्रह एक साथ अस्त और वक्री भी हो सकता है — तब वक्रता का चेष्टा-बल अस्तता की क्षीणता को कुछ सँभाल लेता है; फल अटपटा पर शून्य नहीं। अस्त और नीच दोनों हो तो ग्रह वास्तव में पीड़ित है — उसके विषयों में सचेत परिश्रम और उपाय दोनों चाहिए।
यहीं नीचभंग के नियम भी देखे जाते हैं: नीचता भंग करने वाले योग हों तो वही ग्रह समय पाकर विशेष उठान देता है। सार यह कि अस्तता को अकेले पढ़ना अधूरा है — पूरी स्थिति का जोड़ ही सच बोलता है।
अस्त ग्रह का उपाय-विचार
अस्त ग्रह के विषयों को सहारा देने के पारम्परिक मार्ग: उस ग्रह के मंत्र-जप व दान उसके वार को, और योग्य परामर्श से उस ग्रह का रत्न — क्योंकि रत्न का काम ही क्षीण ग्रह की किरण-ऊर्जा बढ़ाना माना जाता है।
पर क्रम याद रखिए: पहले कुंडली में देखिए कि वह ग्रह आपके लिए शुभ-कारक है या नहीं — मारक या दुःस्थान-स्वामी को बल देना उल्टा पड़ता है। इसीलिए रत्न सदा कुंडली दिखाकर ही धारण करने की परम्परा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या अस्त ग्रह का फल शून्य हो जाता है? — नहीं; क्षीण होता है। बलवान राशि-वर्ग स्थिति उसे काफ़ी सँभाल लेती है।
सूर्य स्वयं अस्त क्यों नहीं होता? — अस्तता की परिभाषा ही सूर्य-सान्निध्य से है; सूर्य और छाया-ग्रह राहु-केतु इससे बाहर हैं।
मेरा कौन-सा ग्रह अस्त है? — निःशुल्क कुंडली की ग्रह-तालिका में अस्त-चिह्न देखिए; विवाह-मुहूर्त निकालते समय गुरु-शुक्र की अस्तता पंचांग में अलग से जाँची जाती है।
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