📖 व्रत-कथा

🌾 बैसाखी / विषु / बिहू / पुथांडु (मेष संक्रांति — सौर नववर्ष) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

बैसाखी 1699: गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में सभा बुलाई और तलवार लेकर «एक सिर चाहिए» कहा — पाँच ने बारी-बारी सिर दिया (दया राम, धरम दास, हिम्मत राय, मोहकम चंद, साहिब चंद) — तंबू से जीवित लौटे, गुरु ने अमृत (खंडे-बाटे का पाहुल) छकाकर «पंज प्यारे» व खालसा-पंथ की स्थापना की, «सिंह» नाम, पाँच ककार; फिर स्वयं उनसे अमृत लिया — «आपे गुर चेला»; इसलिए बैसाखी खालसा-सिरजना दिवस। 1919 में इसी दिन जलियाँवाला बाग़ (अमृतसर) का नरसंहार — स्मृति-दिवस भी।

विषु: कृष्ण ने नरकासुर का वध किया/राम ने रावण-वध कर सूर्य को पूर्व से उगने दिया (लोक-मान्यताएँ) — विषु के दिन सूर्य ठीक पूर्व में (विषुव); विषुक्कणि की परंपरा — साल का पहला दर्शन शुभ हो तो पूरा साल शुभ; कोन्ना (कणिक्कोन्ना) श्रीकृष्ण को प्रिय — अप्रैल में खिलता पीला अमलतास «केरल का स्वर्ण»; कैनीट्टम = बड़ों का आशीर्वाद-धन।

बिहू व सूर्य/कृषि: बोहाग बिहू असम की कृषि-ऋतु का आरंभ — गाय की पूजा (गोरु बिहू) क्योंकि वही खेत-जीवन का आधार; मेष-संक्रांति को महाविषुव — सूर्य विषुवत् रेखा पर, दिन-रात बराबर (प्राचीन गणना); ओडिशा का पणा संक्रांति = हनुमान-जयंती (ओडिया परंपरा) व बसुंधरा-थेकी — धरती-माँ (बसुंधरा) को गर्मी में जल-अर्पण; सतुआनी का सत्तू — नई फ़सल का पहला अन्न सूर्य-पितरों को, फिर स्वयं (ठंडक); जुड़-शीतल — बड़े जल-छिड़ककर «शीतल रहो» का आशीर्वाद।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

खगोल: सूर्य निरयण मेष में — वैदिक सौर-वर्ष का आरंभ (महाविषुव — कभी दिन-रात बराबर का बिंदु, अयनांश से अब 14 अप्रैल के आसपास); सौर पंचांग (तमिल, मलयालम, बंगाली, असमिया, ओडिया, पंजाबी-नानकशाही, नेपाली विक्रम-सौर) सब यहीं से गिनते हैं; संक्रांति सूर्यास्त के बाद हो तो पर्व अगले दिन (14) — ऊपर तिथि इसी नियम से।

बैसाखी 1699: गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा-पंथ की स्थापना की (पंज-प्यारे) — सिखों के लिए धार्मिक नववर्ष-सा; 1919 जलियाँवाला बाग़ भी बैसाखी को; किसानों की रबी-कटाई का उत्सव — «जट्टा आई बैसाखी»; हरिद्वार-ऋषिकेश में मेष-संक्रांति का गंगा-स्नान (सतयुग-आरंभ की मान्यता), गंगा-अवतरण से जुड़ा गंगा-सप्तमी अलग।

विषु: सुबह सबसे पहले «कणि» (कृष्ण-प्रतिमा, कोन्ना (अमलतास) के पीले फूल, चावल, फल, सोना-सिक्के, दर्पण, दीप — उरुली में) देखना = साल-भर समृद्धि; बड़ों से कैनीट्टम (सिक्के); बिहू: गाय की पूजा (गोरु बिहू — कटाई के बाद), नया साल (मानुह बिहू — बड़ों को गमोसा), बिहू-गीत-नृत्य (ढोल-पेपा), पीठा; पुथांडु: कणि (तमिल), मांगा-पचड़ी (छह रस), पंचांग-श्रवण; पोहेला बोइशाख: हालखाता (नया बही-खाता), प्रभात-फेरी (कोलकाता), पंता-भात (बांग्लादेश)।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 बैसाखी / विषु / बिहू / पुथांडु (मेष संक्रांति — सौर नववर्ष) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बैसाखी/विषु/बिहू {Y} में कब है — 13 या 14 अप्रैल?

ऊपर इस साल की मेष संक्रांति की तिथि है — सूर्य के मेष-प्रवेश का क्षण यदि सूर्यास्त के बाद हो तो पर्व अगले दिन (प्रायः 14 अप्रैल; कभी 13); बैसाखी-विषु-पुथांडु-पोहेला बोइशाख-पणा संक्रांति एक ही दिन; बोहाग बिहू का गोरु बिहू एक दिन पहले (चैत्र-संक्रांति) और मानुह बिहू मेष-संक्रांति को; जुड़-शीतल सतुआनी के अगले दिन; अपने प्रदेश का पंचांग मिला लें।

बैसाखी और खालसा का क्या संबंध?

1699 की बैसाखी को गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में पंज-प्यारों को अमृत छकाकर खालसा-पंथ की स्थापना की — इसलिए सिखों के लिए बैसाखी खालसा-सिरजना दिवस (नानकशाही कैलेंडर में वैसाख-1); गुरुद्वारों में नगर-कीर्तन, अखंड-पाठ, लंगर; साथ ही रबी-कटाई का किसान-पर्व — दोनों एक दिन।

विषुक्कणि क्या है और कैसे सजाएँ?

«कणि» = साल का पहला दर्शन — विषु की भोर में आँख खोलते ही शुभ-वस्तुएँ देखना ताकि साल शुभ हो; रात को उरुली (पीतल-थाल) में कच्चा चावल, कोन्ना (अमलतास) के पीले फूल, खीरा-कटहल-आम-केला-नारियल, सोने का गहना, सिक्के, दर्पण (जिसमें कणि व अपना चेहरा), नया कपड़ा, ग्रंथ, जलता निलविलक्कु — कृष्ण/गुरुवायूरप्पन की मूर्ति के सामने; भोर में घर की बड़ी स्त्री पहले देखती है, फिर सबको आँख बंद कराकर लाती है; फिर कैनीट्टम (सिक्के)।

बिहू के सात दिन कौन-से हैं?

बोहाग/रोंगाली बिहू: 1 गोरु बिहू (चैत्र-संक्रांति — गाय-बैल को नहलाना-पूजना), 2 मानुह बिहू (मेष-संक्रांति — नववर्ष, स्नान, नए कपड़े, गमोसा-प्रणाम, पीठा), 3 गोसाईं बिहू (घर-देवता/नामघर), 4 तातोर बिहू (करघा-वस्त्र), 5 नांगोलोर बिहू (हल-औज़ार), 6 घरोसिया-जीबोर बिहू (पालतू पशु), 7 चेरा बिहू (समापन) — क्रम-नाम इलाक़े से बदलते; पूरे सात दिन बिहू-नृत्य-हुसोरी।

मांगा-पचड़ी में छह रस क्यों?

तमिल पुथांडु व केरल-विषु की पचड़ी में कच्चा आम (खट्टा), नीम-फूल (कड़वा), गुड़ (मीठा), मिर्च (तीखा), नमक (नमकीन), इमली/कच्चा केला (कसैला) — छह स्वाद = जीवन के सुख-दुःख-सब का स्वीकार; नए साल के पहले कौर में — उगादी-पचड़ी (तेलुगु-कन्नड़) भी यही भाव (नीम-गुड़)।

हालखाता क्या है?

बंगाल के व्यापारियों का पोहेला बोइशाख पर नया बही-खाता (लाल कपड़े में बँधा «हालखाता») — लक्ष्मी-गणेश पूजा के साथ पहला पन्ना स्वस्तिक-सिंदूर से, पुराने उधार का हिसाब बंद, ग्राहकों को दुकान पर बुलाकर मिठाई-कैलेंडर; कालीघाट-दक्षिणेश्वर में खाता-पूजा; उत्तर-भारत की दीवाली-चोपड़ा-पूजा का बंगाली रूप।

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