🌗 एकादशी व्रत व्रत कथा
कथा
एकादशी-देवी की उत्पत्ति (उत्पन्ना एकादशी — मार्गशीर्ष कृष्ण): मुर नामक दैत्य ने देवताओं को हराकर स्वर्ग जीत लिया; विष्णु ने उससे युद्ध कर थककर बद्रिकाश्रम की गुफ़ा में योग-निद्रा ली; मुर ने सोए विष्णु पर वार करना चाहा तो विष्णु के शरीर से एक तेजस्वी कन्या प्रकट हुई जिसने मुर का वध किया — विष्णु ने उसे «एकादशी» नाम व वर दिया: «जो तुम्हारी तिथि पर व्रत करेगा, उसके पाप नष्ट, मुझे प्रिय होगा»। इसी से एकादशी विष्णु-प्रिया, अन्न-त्याग (मुर का वास अन्न में — लोक-मान्यता)।
अंबरीष-दुर्वासा: राजा अंबरीष द्वादशी के पारण-समय दुर्वासा ऋषि के लौटने की प्रतीक्षा में जल पीकर (पारण-मर्यादा रखने) पारण करने लगे; क्रोधित दुर्वासा ने कृत्या भेजी, विष्णु के सुदर्शन ने ऋषि का पीछा किया — अंत में अंबरीष की क्षमा से बचे; सीख — पारण द्वादशी में ही, जल से भी पारण मान्य, भक्त की रक्षा विष्णु करते हैं।
रुक्मांगद-मोहिनी (नारद-पुराण): राजा रुक्मांगद ने राज्य-भर में एकादशी-व्रत अनिवार्य किया — यमलोक खाली; ब्रह्मा ने मोहिनी भेजी, उसने राजा से एकादशी तोड़ने या पुत्र धर्मांगद का सिर माँगा — राजा ने व्रत नहीं तोड़ा, विष्णु प्रकट हुए, पुत्र-राजा सबको वैकुंठ। हर एकादशी की अपनी कथा (पद्म/भविष्य/स्कंद-पुराण) व्रत-दिन पढ़ी जाती है — नामी एकादशियों के पन्नों पर।
कथा का महत्व — यह व्रत क्यों
पद्म-पुराण: एकादशी के दिन अन्न (विशेषतः चावल) में पाप का वास; व्रत से पाप-नाश, विष्णु-लोक, मनोकामना-पूर्ति; निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल) अकेली 24 का फल देती है; देवशयनी से देवउठनी तक चातुर्मास की एकादशियाँ विशेष; मोक्षदा (गीता-जयंती), पुत्रदा (संतान), जया-विजया (सफलता), आमलकी (आँवला), पापमोचनी।
व्रत का समय-नियम: उदया-तिथि (सूर्योदय के समय एकादशी) वाला दिन व्रत का; एकादशी दो सूर्योदय छुए (तिथि-वृद्धि) तो स्मार्त पहले दिन, वैष्णव दूसरे दिन; दशमी-विद्धा (सूर्योदय से पहले दशमी का अंश) होने पर वैष्णव अगला दिन लेते हैं — इसीलिए कभी पंचांगों में «स्मार्त/वैष्णव एकादशी» अलग लिखी होती है; ऊपर की तिथियाँ स्मार्त (गृहस्थ) नियम से।
पारण द्वादशी में सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीत जाने पर, द्वादशी समाप्त होने से पहले — द्वादशी छोड़कर त्रयोदशी में पारण दोष माना गया; पारण में चावल शुभ। आयुर्वेद-दृष्टि: पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार — पाचन-विश्राम, चंद्र-प्रभाव (एकादशी को चंद्र-बल मन पर तीव्र — संयम का दिन)।
कथा सुनने का नियम
- कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
- व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
- कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।
📿 एकादशी व्रत की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अगली एकादशी कब है? {Y} की एकादशी-तिथियाँ?
ऊपर हीरो में अगली एकादशी की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) और नीचे आने वाली 12 एकादशियाँ नाम-सहित दी हैं — स्मार्त (गृहस्थ) उदया-तिथि नियम से; अपने शहर व वैष्णव-संप्रदाय के अनुसार कभी एक दिन का अंतर हो सकता है — पंचांग/मंदिर से मिला लें।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी में अंतर क्या है?
जब एकादशी दशमी-विद्धा हो (सूर्योदय से ठीक पहले दशमी का अंश) या दो सूर्योदय छुए, वैष्णव (इस्कॉन, श्रीवैष्णव, माध्व) अगला दिन (शुद्ध एकादशी) व्रत रखते हैं, स्मार्त-गृहस्थ पहला दिन; पंचांग में दोनों लिखी होती हैं; अपने संप्रदाय की मानें — ऊपर की सूची स्मार्त है।
पारण का सही समय?
द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीतने पर, और द्वादशी समाप्त होने से पहले — प्रायः सुबह 6:30-9 के बीच; द्वादशी दोपहर से पहले ख़त्म हो तो सूर्योदय के तुरंत बाद; ऊपर तिथि-खिड़की से द्वादशी-समाप्ति देखें, पंचांग पर सटीक पारण-समय।
क्या स्त्रियाँ हर एकादशी रख सकती हैं? मासिक-धर्म में?
हाँ — बहुत-सी स्त्रियाँ दोनों एकादशी रखती हैं; मासिक-धर्म में पूजा-स्पर्श नहीं पर फलाहार-नियम रखा जा सकता है (परंपरा-भेद); गर्भावस्था-स्तनपान में फलाहार-दूध-फल; निर्जला केवल स्वस्थ व्यक्ति के लिए; व्रत का सार संयम व स्मरण है, कष्ट नहीं।
24 एकादशियों के नाम?
चैत्र: पापमोचनी (कृ), कामदा (शु); वैशाख: वरूथिनी, मोहिनी; ज्येष्ठ: अपरा, निर्जला; आषाढ़: योगिनी, देवशयनी; श्रावण: कामिका, पुत्रदा; भाद्रपद: अजा, परिवर्तिनी; आश्विन: इंदिरा, पापांकुशा; कार्तिक: रमा, देवउठनी; मार्गशीर्ष: उत्पन्ना, मोक्षदा; पौष: सफला, पुत्रदा; माघ: षट्तिला, जया; फाल्गुन: विजया, आमलकी; अधिक मास: परमा (कृ), पद्मिनी (शु) — पूर्णिमांत माह-गणना (अमांत गणना में हर कृष्ण-पक्ष की एकादशी पिछले माह में गिनी जाती है); ऊपर सूची में हर तिथि का नाम है।
एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते?
पद्म-पुराण में एकादशी को अन्न (चावल) में पाप-वास; लोक-कथा में महर्षि मेधा का अंश/मुर दैत्य का वास चावल में; आयुर्वेद में पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार से पाचन-विश्राम व चंद्र-प्रभाव में संयम; द्वादशी को चावल से पारण शुभ — इसलिए वर्जन एक दिन का ही।
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