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🪔 पूजा-विधि

🌗 एकादशी व्रत पूजा-विधि — कैसे करें (चरण-दर-चरण)

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

यह गृहस्थ की सरल एकादशी-विधि है — दशमी की शाम से द्वादशी के पारण तक; किसी भी एकादशी पर वही, नामी एकादशियों की अपनी विशेष रीत उनके पन्नों पर।

एकादशी व्रत कैसे करें — पूजा के चरण

  1. दशमी की शाम: सात्विक भोजन (चावल-मसूर-लहसुन-प्याज़ नहीं — कई घर), सूर्यास्त के बाद कुछ नहीं; ब्रह्मचर्य; तुलसी-पत्ते आज ही तोड़ लें (एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित)।
  2. एकादशी सुबह: ब्रह्म-मुहूर्त/सूर्योदय पर स्नान, पीले वस्त्र; संकल्प — «(नाम) एकादशी का व्रत, निर्जला/फलाहार, द्वादशी में पारण»; विष्णु/लक्ष्मी-नारायण/शालिग्राम की पूजा — पंचामृत, पीला चंदन, तुलसी-दल (अनिवार्य), पीले फूल, धूप-दीप, नैवेद्य (फल-पंजीरी-मखाना-खीर), «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» 108, विष्णु-सहस्रनाम/उस एकादशी की कथा।
  3. दिन में: निर्जला (सामर्थ्य) या फलाहार — फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू-सिंघाड़ा, आलू, सेंधा नमक; चावल-गेहूँ-दाल-बैंगन-मसूर-तेल-मसाला नहीं; दिन में सोना नहीं, झूठ-कलह-क्रोध नहीं; गीता/भागवत-पाठ, विष्णु-नाम जप।
  4. शाम (प्रदोष): विष्णु-आरती, तुलसी-दीप, «ॐ जय जगदीश हरे»; रात्रि-जागरण — भजन-कीर्तन/विष्णु-सहस्रनाम (हो सके तो; न हो तो जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठें)।
  5. दान: एकादशी को अन्न-वस्त्र-जल-छाता (ऋतु से), पीली वस्तु, गाय-चारा; ब्राह्मण/ग़रीब को द्वादशी को भोजन कराकर तब स्वयं पारण।
  6. द्वादशी — पारण (ऊपर तिथि-खिड़की देखें): सूर्योदय के बाद, हरि-वासर टालकर, द्वादशी रहते; पहले तुलसी-जल/चरणामृत, फिर चावल-युक्त सात्विक भोजन (चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर); द्वादशी दोपहर से पहले समाप्त हो तो सुबह-सवेरे पारण — पंचांग पर सटीक समय।
  7. स्त्रियों की रीत: मासिक-धर्म में पूजा नहीं, व्रत का फलाहार-रूप रख सकती हैं (कई परंपराएँ); गर्भवती/स्तनपान-काल में फलाहार-दूध; पति-पत्नी दोनों रखें तो पारण साथ।
  8. उद्यापन: लगातार वर्ष-भर/चातुर्मास की एकादशियाँ रखकर देवउठनी या उत्पन्ना एकादशी पर उद्यापन — विष्णु-पूजा, हवन, 12 ब्राह्मण-भोजन, दान; फिर व्रत चलता रहे।

पूजा-सामग्री की सूची (checklist)

विष्णु-पूजा की सामग्री + फलाहार का सामान — हर एकादशी की सूची।

  • विष्णु/लक्ष्मी-नारायण चित्र या शालिग्राम, पीला कपड़ा, चौकी, कलश, आम के पत्ते, नारियल
  • तुलसी-दल (दशमी को तोड़े), पंचामृत, गंगाजल, पीला चंदन, अक्षत (तिल/जौ — चावल नहीं), पीले फूल-माला
  • धूप, घी-दीपक, कपूर, आरती-थाली, मौली, पान-सुपारी, दक्षिणा
  • नैवेद्य: फल (केला-सेब-अनार), पंजीरी, मखाना-खीर, पेड़ा, मिश्री, केसर-दूध
  • फलाहार: साबूदाना, कुट्टू/सिंघाड़े का आटा, आलू-शकरकंद, समा (वरई) चावल, मूँगफली, सेंधा नमक, दही, फल, मेवे
  • पाठ: विष्णु-सहस्रनाम, गीता, उस एकादशी की कथा (एकादशी-महात्म्य पुस्तक)
  • दान: अन्न, वस्त्र, जल-पात्र, छाता/कंबल (ऋतु), पीले वस्त्र-चना
  • पारण: चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर, तुलसी-जल

🛍 पूजा-सामग्री देखें

फलाहार — साबूदाना, कुट्टू, समा, फल, दूध; पारण चावल से

एकादशी को अन्न वर्जित — विशेषतः चावल, गेहूँ, दाल, बैंगन, मसूर, प्याज़-लहसुन; फलाहार में साबूदाना-कुट्टू-सिंघाड़ा-समा-आलू-फल-दूध-मेवे, सेंधा नमक; विष्णु का भोग तुलसी-सहित; द्वादशी का पारण चावल-दाल से; क्षेत्र-अनुसार फराळ (महाराष्ट्र-गुजरात), उपवास-सद्य (दक्षिण), निर्जला (बिहार-यूपी कठोर रीत)।

  • साबूदाना खिचड़ी/वड़ा/खीर (मूँगफली-आलू-सेंधा नमक), समा (वरई/भगर) का भात-खीर, राजगिरा-लड्डू/पराठा
  • कुट्टू/सिंघाड़े की पूड़ी-पकौड़ी-चीला, आलू-जीरा, शकरकंद, अरबी, लौकी-कद्दू की सब्ज़ी, दही-रायता (सेंधा नमक)
  • फल (केला-सेब-पपीता-अनार-अंगूर), नारियल-पानी, दूध, छाछ, मखाना, मेवे, खजूर; निर्जला वाले — कुछ नहीं
  • विष्णु-भोग: पंजीरी, मखाना-खीर, केसर-दूध, फल, पेड़ा — तुलसी-दल के बिना भोग अधूरा
  • महाराष्ट्र/गुजरात फराळ: साबूदाणा-वड़ा, मोरैयो-खिचड़ी, रताळे-कीस, फराळी चेवड़ा; दक्षिण: वरगु-अरिसी (समा) पोंगल, फल; बंगाल-ओडिशा: फल-दूध-लुची (कुछ घर), ओडिशा के घरों में उपवास चावल-रहित, पर पुरी श्रीमंदिर में एकादशी पर भी महाप्रसाद («अभड़ा») ग्रहण होता है
  • पारण (द्वादशी): चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर, तुलसी-जल पहले; कई रीत में कद्दू/तोरई; ब्राह्मण/ग़रीब को भोजन कराकर

नियम — क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • उदया-तिथि (ऊपर सूची) पर व्रत; पारण द्वादशी में हरि-वासर टालकर — पंचांग से सटीक समय
  • विष्णु-पूजा में तुलसी-दल अनिवार्य (दशमी को तोड़ा); पीले वस्त्र-फूल
  • चावल-अनाज त्याग, फलाहार सात्विक; दिन में न सोएँ, नाम-जप/पाठ
  • दान — अन्न-जल-वस्त्र; ब्राह्मण/ग़रीब को द्वादशी को भोजन
  • गर्भवती/रोगी/बुज़ुर्ग फलाहार-दूध; स्वास्थ्य पहले

❌ क्या न करें

  • चावल व चावल से बनी चीज़ें, गेहूँ-दाल-बैंगन-मसूर-प्याज़-लहसुन, बासी/बाहर का भोजन
  • एकादशी को तुलसी तोड़ना, बाल-नाख़ून, तेल-मालिश (कुछ रीत), दिन में सोना
  • पारण त्रयोदशी तक खींचना, हरि-वासर में पारण, या द्वादशी में पारण छोड़ देना
  • झूठ, निंदा, क्रोध, कलह, तामसिक मनोरंजन — व्रत का सार संयम है
  • जबरन निर्जला — कमज़ोरी/चक्कर में जल-फल लें; बच्चों पर व्रत नहीं

व्रत-कथा

एकादशी-देवी की उत्पत्ति (उत्पन्ना एकादशी — मार्गशीर्ष कृष्ण): मुर नामक दैत्य ने देवताओं को हराकर स्वर्ग जीत लिया; विष्णु ने उससे युद्ध कर थककर बद्रिकाश्रम की गुफ़ा में योग-निद्रा ली; मुर ने सोए विष्णु पर वार करना चाहा तो… पूरी कथा पढ़ें →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगली एकादशी कब है? {Y} की एकादशी-तिथियाँ?

ऊपर हीरो में अगली एकादशी की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) और नीचे आने वाली 12 एकादशियाँ नाम-सहित दी हैं — स्मार्त (गृहस्थ) उदया-तिथि नियम से; अपने शहर व वैष्णव-संप्रदाय के अनुसार कभी एक दिन का अंतर हो सकता है — पंचांग/मंदिर से मिला लें।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में अंतर क्या है?

जब एकादशी दशमी-विद्धा हो (सूर्योदय से ठीक पहले दशमी का अंश) या दो सूर्योदय छुए, वैष्णव (इस्कॉन, श्रीवैष्णव, माध्व) अगला दिन (शुद्ध एकादशी) व्रत रखते हैं, स्मार्त-गृहस्थ पहला दिन; पंचांग में दोनों लिखी होती हैं; अपने संप्रदाय की मानें — ऊपर की सूची स्मार्त है।

पारण का सही समय?

द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीतने पर, और द्वादशी समाप्त होने से पहले — प्रायः सुबह 6:30-9 के बीच; द्वादशी दोपहर से पहले ख़त्म हो तो सूर्योदय के तुरंत बाद; ऊपर तिथि-खिड़की से द्वादशी-समाप्ति देखें, पंचांग पर सटीक पारण-समय।

क्या स्त्रियाँ हर एकादशी रख सकती हैं? मासिक-धर्म में?

हाँ — बहुत-सी स्त्रियाँ दोनों एकादशी रखती हैं; मासिक-धर्म में पूजा-स्पर्श नहीं पर फलाहार-नियम रखा जा सकता है (परंपरा-भेद); गर्भावस्था-स्तनपान में फलाहार-दूध-फल; निर्जला केवल स्वस्थ व्यक्ति के लिए; व्रत का सार संयम व स्मरण है, कष्ट नहीं।

24 एकादशियों के नाम?

चैत्र: पापमोचनी (कृ), कामदा (शु); वैशाख: वरूथिनी, मोहिनी; ज्येष्ठ: अपरा, निर्जला; आषाढ़: योगिनी, देवशयनी; श्रावण: कामिका, पुत्रदा; भाद्रपद: अजा, परिवर्तिनी; आश्विन: इंदिरा, पापांकुशा; कार्तिक: रमा, देवउठनी; मार्गशीर्ष: उत्पन्ना, मोक्षदा; पौष: सफला, पुत्रदा; माघ: षट्तिला, जया; फाल्गुन: विजया, आमलकी; अधिक मास: परमा (कृ), पद्मिनी (शु) — पूर्णिमांत माह-गणना (अमांत गणना में हर कृष्ण-पक्ष की एकादशी पिछले माह में गिनी जाती है); ऊपर सूची में हर तिथि का नाम है।

एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते?

पद्म-पुराण में एकादशी को अन्न (चावल) में पाप-वास; लोक-कथा में महर्षि मेधा का अंश/मुर दैत्य का वास चावल में; आयुर्वेद में पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार से पाचन-विश्राम व चंद्र-प्रभाव में संयम; द्वादशी को चावल से पारण शुभ — इसलिए वर्जन एक दिन का ही।

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