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📖 व्रत-कथा

👑 गणगौर (गौरी तृतीया) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

एक बार शिव-पार्वती (ईसर-गौर) नारद के साथ पृथ्वी पर विचरण करते एक गाँव पहुँचे — चैत्र शुक्ल तृतीया थी। गाँव की उच्च-कुल की स्त्रियाँ छप्पन भोग बनाने में लगी थीं, इसलिए देर से आईं; निर्धन स्त्रियाँ जो कुछ था — दूब, जल, हल्दी — लेकर पहले पहुँचीं और श्रद्धा से पूजा की। पार्वती ने प्रसन्न होकर अपना सुहाग-रस उन पर छिड़क दिया — उन्हें अखंड सौभाग्य मिला।

बाद में सजी-धजी स्त्रियाँ छप्पन भोग लेकर आईं; शिव ने पूछा — «सुहाग-रस तो बँट गया, इन्हें क्या दोगी?» पार्वती ने अपनी उँगली चीरकर रक्त छिड़का — «इसमें मेरा अंश है, जितनी बूँदें जिस पर पड़ीं, उतना सुहाग।» फिर पार्वती ने नदी-तट पर रेत का शिवलिंग बनाकर पूजा की — शिव प्रकट हुए और वर दिया कि इस दिन गौरी-पूजा करने वाली स्त्री को अखंड सौभाग्य मिलेगा। लौटकर शिव ने पार्वती से पूछा «देर क्यों?» — पार्वती ने कहा «भाई-भाभी से मिलकर आई» — इसी से गणगौर में मायके-ससुराल का भाव।

लोक-कथा (राजस्थान) — गौरी को ईसर के साथ ससुराल (कैलाश) जाना है; 16 दिन मायके (धरती) में रहकर तृतीया को विदा होती हैं — इसलिए विदाई में स्त्रियाँ रोती-गाती हैं जैसे बेटी की विदाई; और यही कारण कि गणगौर का प्रसाद पति नहीं खाता — वह गौरी के मायके का है।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

गौरी (पार्वती) ने इसी तृतीया को शिव को पति-रूप में पाया — इसलिए गणगौर सुहाग व मनचाहे वर का व्रत; मान्यता है कि गणगौर को पति के सामने नहीं पूजा जाता और इस दिन गौरी को चढ़ा प्रसाद पति नहीं खाते (लोक-रीत)।

नई विवाहिता का पहला गणगौर मायके में — 16 दिन का व्रत, सोलह श्रृंगार, मेहंदी; कन्याएँ ईसर-गौर के जोड़े को घर-घर घुमाती हैं (गीत — «गोर-गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती»), घुड़ले (छिद्रों वाला मिट्टी का घड़ा, भीतर दीप) के साथ शाम को।

व्रत 16-18 दिन का — होली के दूसरे दिन से चैत्र शुक्ल तृतीया तक; सप्तमी-अष्टमी को «शीतला-सप्तमी/बसौड़ा» व घुड़ला-उत्सव (जोधपुर), तृतीया को विदाई — बड़ी गणगौर (जयपुर-उदयपुर की शाही सवारी)।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 गणगौर (गौरी तृतीया) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गणगौर {Y} में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की चैत्र शुक्ल तृतीया (बड़ी गणगौर/विदाई-दिन) है — पंचांग-गणना से; 16 दिन का व्रत होली के अगले दिन से शुरू होता है (इस साल होली की तिथि होली-पन्ने पर)।

गणगौर का व्रत कितने दिन का है?

पूरा व्रत होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से चैत्र शुक्ल तृतीया तक 16-18 दिन; न रख सकें तो अंतिम तीन दिन (प्रतिपदा-द्वितीया-तृतीया) या सिर्फ़ तृतीया — दोनों मान्य।

कौन रखे — कुँवारी या विवाहित?

दोनों — कन्याएँ मनचाहे वर के लिए (विवाह तक हर साल), विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु-सौभाग्य के लिए; नई बहू का पहला गणगौर मायके में विशेष, 16 दिन।

ईसर-गौर क्या हैं और होली की राख से क्यों?

ईसर = ईश्वर (शिव), गौर = गौरी (पार्वती); होलिका दहन की राख से उनके छोटे पिंड बनाकर व्रत आरंभ होता है — बुराई की राख से सृजन का प्रतीक; बाद में लकड़ी/मिट्टी की मूर्तियाँ सजाई जाती हैं।

घुड़ला क्या है?

छिद्रों वाला मिट्टी का घड़ा जिसके भीतर दीप रखकर कन्याएँ सिर पर लेकर शाम को घर-घर घूमती हैं (चैत्र कृष्ण अष्टमी से तृतीया तक, विशेषकर जोधपुर) — घी-गुड़ माँगती हैं; घुड़ला ख़ान की लोक-कथा से जुड़ा।

गणगौर का प्रसाद पति क्यों नहीं खाते?

लोक-मान्यता — गणगौर गौरी का «मायका» है, विदाई बेटी की-सी; पति (ससुराल-पक्ष) को गौरी का प्रसाद न देना और पति के सामने पूजा न करना उसी भाव का हिस्सा है। कई आधुनिक घर इसे नहीं मानते — अपनी रीत।

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