👑 गणगौर (गौरी तृतीया) पूजा-विधि — कैसे करें (चरण-दर-चरण)
यह राजस्थानी घरेलू विधि है — होली की राख से आरंभ, रोज़ की छोटी पूजा, अंतिम तीन दिन बड़ी पूजा और विदाई।
गणगौर (गौरी तृतीया) कैसे करें — पूजा के चरण
- आरंभ (होली के अगले दिन, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा): होलिका दहन की राख से (या मिट्टी से) ईसर-गौर के छोटे पिंड बनाकर पूजा-स्थान पर एक पटरे/परात में स्थापित करें; साथ में जौ-गेहूँ के जवारे; रोज़ सुबह स्नान कर दूब की सींकों से जल छिड़कना (झूला), हल्दी-मेहंदी-काजल का टीका, फूल-पत्ती, गीत — 16 दिन।
- रोज़ का नियम: सूर्योदय के बाद बिना खाए पूजा; गौरी को 16 चीज़ें (16 दूब, 16 बिंदी, 16 चूड़ी…) — «सोलह» का अंक सुहाग का; कन्याएँ मोहल्ले की सहेलियों के साथ; गीतों में ईसर-गौर की हँसी-ठिठोली।
- आठवें दिन (चैत्र कृष्ण अष्टमी — शीतला अष्टमी): घुड़ला — कन्याएँ छिद्रों वाले मिट्टी के घड़े में दीप रखकर सिर पर, शाम को घर-घर घूमती हैं, घी-गुड़-अनाज माँगती हैं (जोधपुर का घुड़ला-मेला)।
- अंतिम तीन दिन (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा-द्वितीया-तृतीया): बड़ी गणगौर — लकड़ी/मिट्टी की ईसर-गौर की मूर्तियाँ (या कागज़-चित्र), गौरी को लहँगा-चुनरी-गहने, ईसर को साफ़ा; सोलह श्रृंगार, मेहंदी; द्वितीया की रात «घुड़ला/रात-जागरण» और गौरी को «पिठौर» (आटे का लेप); तृतीया को सुबह अंतिम पूजा — कुंकुम-मेहंदी-काजल, 16 गूने (गौरी-भोग), जल का लोटा, दूब।
- तृतीया की पूजा में: कन्याएँ/सुहागिनें सिर पर कलश, गणगौर को गोद में; कथा (नीचे); पति के लिए दीर्घायु और कुँवारी के लिए वर का संकल्प; सास/बड़ी को «बाया» (गूने, मेहंदी, चूड़ी, मिठाई) और पैर छूना।
- विदाई (तृतीया की शाम): गीत गाते हुए गणगौर को सिर पर लेकर तालाब/बावड़ी/नदी; वहाँ अंतिम जल-अर्पण, गौरी को ससुराल (कैलाश) विदा — मूर्ति जल में विसर्जित या (लकड़ी की) घर लौटाकर अगले साल के लिए; जयपुर में त्रिपोलिया गेट से शाही सवारी, उदयपुर में गणगौर-घाट पर नौका-विदाई।
- व्रत खोलना: विदाई के बाद; 16 दिन का व्रत रखने वाली नई बहू को मायके से «गणगौर का बाया» — घेवर-फीणी, कपड़े; ससुराल में सुहागिनें उपहार।
- जो 16 दिन न रख सकें — अंतिम 3 दिन (या सिर्फ़ तृतीया) का व्रत भी मान्य; कन्याओं का व्रत विवाह तक हर वर्ष।
पूजा-सामग्री की सूची (checklist)
गणगौर की मूर्ति (या राख-मिट्टी के पिंड), गौरी का श्रृंगार, दूब और 16 का सामान — मुख्य।
- होली की राख/मिट्टी (ईसर-गौर के पिंड) या लकड़ी-मिट्टी की गणगौर-मूर्ति, ईसर की मूर्ति; परात/पटरा
- दूब की सींकें (झूला/जल छिड़कने को), कलश, जल का लोटा
- गौरी का श्रृंगार: लहँगा-चुनरी/साड़ी, चूड़ी (16), बिंदी (16), सिंदूर, काजल, मेहंदी, गहने; ईसर का साफ़ा-धोती
- हल्दी, कुमकुम, रोली, अक्षत, फूल-पत्ती, आटे का पिठौर
- जौ-गेहूँ के जवारे, गेहूँ के दाने (कथा में हाथ में)
- घुड़ला: छिद्र वाला मिट्टी का घड़ा, दीपक
- भोग: 16 गूने (आटे-गुड़ के), घेवर-फीणी, चूरमा-लड्डू, मेहंदी की मिठाई, खीर-पूड़ी, फल
- बाया: घेवर, मेहंदी, चूड़ी, कपड़ा, दक्षिणा (सास/मायके-ससुराल)
- गणगौर की कथा-पुस्तक/गीत
गूने, घेवर, चूरमा — गणगौर की मारवाड़ी रसोई
गणगौर के भोग में 16 गूने (आटे की मीठी टिकियाँ/कचौरी जैसी), घेवर, फीणी, चूरमा — मायके से बाया में यही आते हैं; तृतीया को खीर-पूड़ी; 16 दिन व्रत में एक समय बिना नमक (कुछ घर) या फलाहार।
- गूने (16): आटे में घी-गुड़/शक्कर-सौंफ का मोयन, छोटी मोटी टिकियाँ घी में तली — गौरी को 16 चढ़ाकर बाँटें
- घेवर, फीणी (सर्दी-गर्मी की संधि की मिठाई), मालपुआ, चूरमा-लड्डू, मोहनथाल
- तृतीया: खीर, पूड़ी, दाल-बाटी-चूरमा (राजस्थान), मालवा में आम-पना, दही-बड़े
- 16 दिन: एक समय भोजन — बिना नमक (मीठा) कई घरों में; या फलाहार-दूध; कन्याएँ सुबह पूजा के बाद ही खाती हैं
- प्रसाद: घर की स्त्रियाँ-कन्याएँ-पड़ोसिनें; पति/पुरुष को गौरी का प्रसाद नहीं (लोक-रीत)
नियम — क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- आरंभ होली की राख से, रोज़ दूब-जल की पूजा — बीच में न छोड़ें
- गौरी को 16-16 चीज़ें, सोलह श्रृंगार, मेहंदी — सुहाग का अंक
- तृतीया की विदाई गीतों के साथ तालाब/नदी पर; मूर्ति सम्मान से विसर्जित/सँभालें
- बाया सास/बड़ी को; नई बहू का पहला गणगौर मायके में
- कन्याएँ विवाह तक हर साल — व्रत की परंपरा जारी
❌ क्या न करें
- गणगौर की पूजा पति के सामने नहीं; गौरी का प्रसाद पति/पुरुष को नहीं (लोक-रीत)
- 16 दिन में झूठ, कलह, काले वस्त्र, दिन में सोना — वर्जित
- विसर्जन में प्लास्टिक-रंग वाली मूर्ति जल में नहीं — मिट्टी की, या लकड़ी की घर लौटाएँ
- घुड़ले की आग/दीप से बच्चियों को सावधान
- मायके न जा सकें तो व्रत छोड़ें नहीं — ससुराल में भी मान्य
व्रत-कथा
एक बार शिव-पार्वती (ईसर-गौर) नारद के साथ पृथ्वी पर विचरण करते एक गाँव पहुँचे — चैत्र शुक्ल तृतीया थी। गाँव की उच्च-कुल की स्त्रियाँ छप्पन भोग बनाने में लगी थीं, इसलिए देर से आईं; निर्धन स्त्रियाँ जो कुछ था — दूब, जल, हल्… पूरी कथा पढ़ें →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गणगौर {Y} में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की चैत्र शुक्ल तृतीया (बड़ी गणगौर/विदाई-दिन) है — पंचांग-गणना से; 16 दिन का व्रत होली के अगले दिन से शुरू होता है (इस साल होली की तिथि होली-पन्ने पर)।
गणगौर का व्रत कितने दिन का है?
पूरा व्रत होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से चैत्र शुक्ल तृतीया तक 16-18 दिन; न रख सकें तो अंतिम तीन दिन (प्रतिपदा-द्वितीया-तृतीया) या सिर्फ़ तृतीया — दोनों मान्य।
कौन रखे — कुँवारी या विवाहित?
दोनों — कन्याएँ मनचाहे वर के लिए (विवाह तक हर साल), विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु-सौभाग्य के लिए; नई बहू का पहला गणगौर मायके में विशेष, 16 दिन।
ईसर-गौर क्या हैं और होली की राख से क्यों?
ईसर = ईश्वर (शिव), गौर = गौरी (पार्वती); होलिका दहन की राख से उनके छोटे पिंड बनाकर व्रत आरंभ होता है — बुराई की राख से सृजन का प्रतीक; बाद में लकड़ी/मिट्टी की मूर्तियाँ सजाई जाती हैं।
घुड़ला क्या है?
छिद्रों वाला मिट्टी का घड़ा जिसके भीतर दीप रखकर कन्याएँ सिर पर लेकर शाम को घर-घर घूमती हैं (चैत्र कृष्ण अष्टमी से तृतीया तक, विशेषकर जोधपुर) — घी-गुड़ माँगती हैं; घुड़ला ख़ान की लोक-कथा से जुड़ा।
गणगौर का प्रसाद पति क्यों नहीं खाते?
लोक-मान्यता — गणगौर गौरी का «मायका» है, विदाई बेटी की-सी; पति (ससुराल-पक्ष) को गौरी का प्रसाद न देना और पति के सामने पूजा न करना उसी भाव का हिस्सा है। कई आधुनिक घर इसे नहीं मानते — अपनी रीत।
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