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📖 व्रत-कथा

💚 हरियाली तीज (श्रावणी / छोटी तीज) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

पार्वती हिमालय की पुत्री थीं; बचपन से शिव को पति मानतीं। पिता हिमवान ने नारद के कहने पर विष्णु से विवाह तय किया; पार्वती ने सखी की सहायता से वन (हरित) में जाकर गुफा में रेत का शिवलिंग बनाया और घोर तप किया — इसी सखी-हरण से बाद की तीज «हरतालिका» कहलाई; पर श्रावण शुक्ल तृतीया को शिव ने प्रकट होकर पार्वती को पत्नी-रूप में स्वीकार किया — हरियाली में मिलन, इसलिए «हरियाली तीज»।

शिव ने पार्वती को उनके 107 पूर्व-जन्मों की तपस्या याद दिलाई — 108वें जन्म में वर मिला; इसलिए इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करने वाली स्त्री को अखंड सौभाग्य और कन्या को मनचाहा वर — शिव का वर। कथा के अंत में तीज माता (पार्वती) की जय।

लोक-कथा (राजस्थान-हरियाणा) — एक साहूकार की बेटी ने तीज का व्रत श्रद्धा से रखा, पर उसकी सास ने बिना श्रृंगार-झूले के रखने को कहा; तीज माता ने स्वप्न में कहा — «तीज पर श्रृंगार, हरी चूड़ी, झूला और गीत भी व्रत का अंग हैं — उत्सव में ही मेरा वास है»; तभी से हरियाली तीज व्रत के साथ उत्सव है, तप नहीं।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

तीज = तृतीया — गौरी की तिथि; हरियाली तीज पार्वती (तीज माता) की पूजा का दिन है: शिव-पार्वती के मिलन का पर्व, इसलिए नई विवाहिता का पहला सावन मायके में और तीज पर ससुराल से «सिंधारा/सिंजारा» (वस्त्र-मिठाई-श्रृंगार) आना — मायके-ससुराल का प्रेम-सूत्र।

हरा रंग सावन-समृद्धि-सुहाग का — हरी चूड़ियाँ इस दिन बदली जाती हैं, मेहंदी जितनी गहरी उतना पति का प्रेम (लोक-विश्वास); झूला — कृष्ण-राधा/शिव-पार्वती का झूला, नीम-आम पर रस्सी-पटरे का झूला; सावन के गीत — कजरी, झूला, «झूला पड़ गयो अम्बुआ की डार»।

व्रत निर्जला/फलाहार (कई घर सिर्फ़ पूजा-उत्सव); जयपुर की तीज-सवारी (तीज माता की शाही सवारी), बनारस-मिर्ज़ापुर की कजरी, हरियाणा-पंजाब की «तीयाँ» (झूले-गिद्दा) — पूरा सावन इसी के इर्द-गिर्द।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 हरियाली तीज (श्रावणी / छोटी तीज) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हरियाली तीज {Y} में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की श्रावण शुक्ल तृतीया है — पंचांग-गणना से; पूजा का अभिजित/प्रदोष-समय (दिल्ली) भी वहीं। तृतीया किसी सूर्योदय को न छुए (तिथि-क्षय) तो जिस दिन तृतीया रहे, वही दिन।

हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज में क्या अंतर?

तीनों गौरी-तृतीया व्रत — हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया (सावन, झूले-मेहंदी, उत्सव-प्रधान); कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया (15 दिन बाद — नीम-पूजा, चंद्र-अर्घ्य, बुंदेलखंड-राजस्थान); हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया (एक महीने बाद — निर्जला, सबसे कठोर, यूपी-बिहार-महाराष्ट्र)।

सिंजारा/सिंधारा क्या है?

तीज से एक दिन पहले (या तीज पर) मायके से बेटी/बहू को भेजा जाने वाला उपहार — मेहंदी, हरी चूड़ी, लहरिया, घेवर-फीणी, श्रृंगार; ससुराल से नई बहू को «सिंधारा» — दोनों ओर से प्रेम का सूत्र।

क्या तीज पर चाँद को अर्घ्य देते हैं?

हरियाली तीज पर नहीं — यह चौथ नहीं है; प्रदोष-पूजा के बाद व्रत खुलता है। कजरी तीज पर चंद्र-अर्घ्य की रीत है (कृष्ण तृतीया — चाँद देर से)।

हरी चूड़ी ही क्यों?

हरा सावन-हरियाली, समृद्धि और सुहाग का रंग — इस दिन पुरानी चूड़ियाँ उतारकर नई हरी पहनना पार्वती का श्रृंगार दोहराना है; मेहंदी जितनी रचे, उतना प्रेम — लोक-विश्वास।

मंगलागौर और हरियाली तीज एक ही?

भाव एक — नई विवाहिता का सावन-व्रत; महाराष्ट्र में श्रावण के हर मंगलवार मंगलागौर (गौरी-पूजा, रात-भर फुगड़ी-झिम्मा), उत्तर में तृतीया की तीज; मराठी घर तीज की जगह मंगलागौर मानते हैं।

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