📖 व्रत-कथा

🐘 संकष्टी चतुर्थी (और विनायक चतुर्थी) व्रत कथा

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

कथा

गणेश-चंद्र कलंक: गणेश की रूप-रचना (लंबोदर, गज-मुख) पर चंद्रमा हँसा; गणेश ने शाप दिया — «जो तुझे देखेगा, कलंक पाएगा»; देवताओं की प्रार्थना पर शाप घटा — केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) का चंद्र-दर्शन कलंक देगा, और कृष्ण चतुर्थी (संकष्टी) को जो चंद्र-दर्शन कर गणेश को पूजेगा, उसके संकट कटेंगे। इसीलिए संकष्टी पर चाँद देखकर व्रत खुलता है, विनायक चतुर्थी पर चाँद नहीं देखते।

अंगारक-कथा: भारद्वाज ऋषि व पृथ्वी के पुत्र अंगारक (मंगल) ने गणेश की कठोर तपस्या की; माघ कृष्ण चतुर्थी, मंगलवार को गणेश प्रकट हुए — «वर माँगो»; अंगारक ने माँगा «मेरा नाम आपके साथ जुड़े और जो मंगलवार की संकष्टी करे उसे वर्ष-भर की संकष्टी का फल मिले» — तभी से अंगारकी संकष्टी; मंगल ग्रह-मंडल में स्थान पाया, मंगल-दोष की शांति गणेश से।

कृष्ण-स्यमंतक (विनायक चतुर्थी): कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चाँद देख लिया; स्यमंतक-मणि चोरी का झूठा कलंक लगा; नारद ने बताया यह चतुर्थी-चंद्र-दर्शन का फल; कृष्ण ने गणेश-व्रत किया, मणि मिली, कलंक मिटा — इसलिए विनायक चतुर्थी को चाँद न देखें; देख लें तो स्यमंतक-कथा का पाठ/श्रवण उपाय। हर माह की संकष्टी की अपनी कथा (गणेश-पुराण) — व्रत-दिन पढ़ें।

कथा का महत्व — यह व्रत क्यों

गणेश-पुराण/नारद-पुराण: कृष्ण चतुर्थी को गणेश-व्रत व चंद्र-अर्घ्य से संकट-नाश, ऋण-मुक्ति, विघ्न-निवारण, संतान-सुख; चंद्रमा को गणेश ने कलंक का शाप देकर संकष्टी पर उसी को अर्घ्य का विधान दिया — चंद्र-दर्शन के बिना संकष्टी पूरी नहीं (विनायक चतुर्थी पर उल्टा — चंद्र-दर्शन वर्जित)।

अंगारकी संकष्टी: मंगल (अंगारक) ने गणेश की तपस्या कर वरदान पाया कि मंगलवार की संकष्टी उनके नाम से हो और उसका फल वर्ष-भर की संकष्टियों के बराबर — इसलिए महाराष्ट्र-कर्नाटक में अंगारकी पर मंदिरों में लाखों (सिद्धिविनायक, अष्टविनायक, दगडूशेठ)। संकष्टी की तिथि चंद्रोदय-व्यापिनी — जिस दिन चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो; विनायक की मध्याह्न-व्यापिनी।

12 संकष्टी के नाम (अमांत माह से): चैत्र-विकट, वैशाख-एकदंत, ज्येष्ठ-कृष्णपिंगल, आषाढ़-गजानन, श्रावण-हेरम्ब (बहुला), भाद्रपद-विघ्नराज, आश्विन-वक्रतुंड, कार्तिक-गणाधिप, मार्गशीर्ष-आखुरथ, पौष-लंबोदर (= सकट चौथ), माघ-द्विजप्रिय, फाल्गुन-भालचंद्र; अधिक मास में विभुवन संकष्टी।

कथा सुनने का नियम

  • कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
  • व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
  • कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।

📿 संकष्टी चतुर्थी (और विनायक चतुर्थी) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगली संकष्टी चतुर्थी कब है और चाँद कब निकलेगा? {Y}

ऊपर अगली संकष्टी की तिथि, चंद्रोदय-समय (दिल्ली) व आने वाली 12 तिथियाँ नाम-सहित (अंगारकी हो तो लिखा है) दी हैं; कृष्ण चतुर्थी का चाँद रात 8:30-10 बजे के बीच; अपने शहर में ±10-20 मिनट — पंचांग से मिला लें।

संकष्टी और विनायक चतुर्थी में अंतर?

संकष्टी = कृष्ण पक्ष चतुर्थी (पूर्णिमा के बाद) — व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय, चाँद को अर्घ्य देकर पारण, संकट-निवारण; विनायक = शुक्ल पक्ष चतुर्थी (अमावस्या के बाद) — दोपहर में पूजा, चाँद न देखें (कलंक-कथा); भाद्रपद की विनायक ही गणेश चतुर्थी, माघ की संकष्टी ही सकट चौथ; ऊपर सूची में दोनों।

अंगारकी संकष्टी क्या है, इतनी बड़ी क्यों?

मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी — अंगारक (मंगल) की तपस्या से गणेश का वर कि मंगलवार की संकष्टी का फल वर्ष-भर की संकष्टियों के बराबर; साल में 1-3 बार; महाराष्ट्र में लाखों उपवास व मंदिर-कतार; मंगल-दोष वालों के लिए विशेष; ऊपर सूची में «(अंगारकी)» लिखा मिलेगा।

बादल हों, चाँद न दिखे तो?

चंद्रोदय-समय (ऊपर) के बाद चाँद की दिशा (पूर्व) में अर्घ्य दें या थाली में दर्पण/जल में प्रतिबिंब मानकर — पारण मान्य; व्रत पूरा; रात बहुत देर न करें; चंद्रोदय बहुत देर (10 बजे बाद) हो तो रोगी-गर्भवती पहले फलाहार लें।

संकष्टी किस कामना से और कितनी बार?

संकट-निवारण, ऋण-रोग-मुक्ति, संतान-सुख, विघ्न-हरण, कार्य-सिद्धि; माताएँ बच्चों के लिए; संकल्प 12 (एक वर्ष) या 21 संकष्टी का, फिर उद्यापन (गणेश-हवन, 21 दूर्वा, ब्राह्मण-भोजन); बीच में छूटे तो अगली अंगारकी से फिर।

गणेश को दूर्वा और मोदक ही क्यों?

अनलासुर-कथा — अग्नि-दैत्य को निगलकर गणेश के पेट में जलन हुई, ऋषियों ने 21 दूर्वा खिलाकर शांत की — तभी से दूर्वा प्रिय (3 या 5 पत्ती की, 21 जुड़ी); मोदक (मोद = आनंद) पार्वती ने बनाया, गणेश का प्रिय — 21 मोदक; लाल फूल-सिंदूर गणेश के रजोगुण-तेज के प्रतीक; तुलसी गणेश को वर्जित (शाप-कथा)।

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