☀️ मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) पूजा-विधि — कैसे करें (चरण-दर-चरण)
संक्रांति की विधि सरल है — पुण्यकाल में स्नान, सूर्य-अर्घ्य, दान और मास-विशेष पूजा। घर पर ऐसे करें:
मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) कैसे करें — पूजा के चरण
- प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें — संभव हो तो तीर्थ/नदी-स्नान, वरना जल में गंगाजल व तिल डालकर घर पर ही।
- ताँबे के लोटे में जल, रोली, अक्षत व लाल फूल डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य दें — «ॐ सूर्याय नमः» या आदित्य-हृदय का पाठ।
- संक्रांति के पुण्यकाल में दान करें — तिल, गुड़, अन्न (चावल-दाल), वस्त्र, घी या दक्षिणा; दान अपने हाथ से, श्रद्धा से।
- पितरों का स्मरण/तर्पण करने की परम्परा भी है — विशेषकर कर्क व मकर संक्रांति (अयन-बदल) पर।
- मास-विशेष पूजा जोड़ें — कन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा-पूजा (औज़ार/मशीन की पूजा), तुला पर तुला-स्नान, धनु से धनुर्मास के नियम (नीचे «घर की रीत» देखें)।
- दिन भर सात्त्विक रहें; संक्रांति व्रत रखने वाले एक समय फलाहार/भोजन करते हैं — कठोर निर्जल व्रत की परम्परा नहीं है।
पूजा-सामग्री की सूची (checklist)
संक्रांति मुख्यतः स्नान-दान का पर्व है — सामग्री दान-केंद्रित है:
- अर्घ्य हेतु ताँबे का लोटा, रोली, अक्षत, लाल फूल
- तिल (काले/सफ़ेद), गुड़ — संक्रांति-दान की मुख्य वस्तुएँ
- अन्न-दान: चावल, दाल (खिचड़ी-सामग्री), आटा
- ऋतु-अनुसार वस्त्र/कंबल (शीत-मास की संक्रांतियों पर विशेष)
- घी, दीपक, दक्षिणा; विश्वकर्मा-पूजा (कन्या) हेतु औज़ारों के लिए फूल-माला व धूप
तिल-गुड़, खिचड़ी व मौसमी अन्न — संक्रांति की थाली
नियम — क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- स्नान-दान पुण्यकाल में करें — संक्रांति-क्षण के आगे-पीछे का समय सर्वोत्तम (पन्ने के ऊपर समय देखें)।
- सूर्य-अर्घ्य उगते सूर्य को ही दें; आँखें सीधे सूर्य पर न गड़ाएँ।
- दान में तिल अवश्य रखें — संक्रांति-दान की प्रधान वस्तु।
- कन्या संक्रांति पर औज़ार/वाहन की सफ़ाई-पूजा करें (जिनकी परम्परा में विश्वकर्मा-पूजा है)।
- धनु संक्रांति के बाद बड़े मांगलिक कार्य मुहूर्त देखकर ही रखें (खरमास-नियम)।
❌ क्या न करें
- संक्रांति के दिन दान माँगे जाने पर ख़ाली हाथ न लौटाएँ — यथाशक्ति ही सही।
- पुण्यकाल में कलह, असत्य व तामसिक भोजन से बचें।
- अर्घ्य का जल किसी के पैरों में न जाए — साफ़ स्थान/तुलसी-क्यारी में दें।
- खरमास (धनु-मास) में विवाह/गृह-प्रवेश जैसे कार्य बिना विशेष मुहूर्त-विचार न रखें।
व्रत-कथा
सूर्य के मकर-प्रवेश पर उत्तरायण और कर्क-प्रवेश पर दक्षिणायन आरंभ होता है — देव-दिन और देव-रात्रि की पौराणिक कल्पना इसी से जुड़ी है; भीष्म ने बाण-शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी।… पूरी कथा पढ़ें →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इस महीने की संक्रांति कब है? {Y}
ऊपर तिथि-card में अगली संक्रांति की ठीक तारीख़ व दिन दिया है — यह सूर्य के राशि-प्रवेश की खगोलीय गणना (Swiss Ephemeris) से निकलती है।
संक्रांति का पुण्यकाल क्या होता है?
सूर्य के राशि-प्रवेश क्षण के आस-पास का समय — परम्परा में प्रायः प्रवेश से 16 घटी (लगभग 6.5 घंटे) आगे-पीछे; इसी में स्नान-दान का फल सबसे अधिक कहा गया है।
क्या हर संक्रांति पर व्रत रखना ज़रूरी है?
नहीं — संक्रांति मुख्यतः स्नान-दान का दिन है, कठोर व्रत की अनिवार्यता नहीं। जो रखते हैं वे एक समय सात्त्विक भोजन/फलाहार करते हैं।
मकर और मेष संक्रांति भी यहीं देखें?
उनके अपने विस्तृत पन्ने हैं — मकर संक्रांति (खिचड़ी/पोंगल/लोहड़ी) और मेष संक्रांति (बैसाखी/विशु/बिहू) — नीचे «यह भी पढ़ें» में link हैं।
कन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा-पूजा कैसे करें?
औज़ार, मशीन, वाहन, computer आदि साफ़ करके फूल-माला, रोली-अक्षत, धूप-दीप से पूजें; उस दिन उनसे भारी काम न लें; मिठाई बाँटें — यही सरल घरेलू/दुकान-विधि है।
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