☀️ मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) 2026
अगली संक्रांति कब है — हर मास सूर्य के नए राशि में प्रवेश का दिन: स्नान-दान का पुण्यकाल, सूर्य-अर्घ्य व मास-विशेष परम्पराएँ (कन्या पर विश्वकर्मा-पूजा, तुला पर तुला-स्नान, धनु से धनुर्मास)।
- संक्रांति — सोमवार, 16 नवंबर 2026
- संक्रांति — बुधवार, 16 दिसंबर 2026
- संक्रांति — गुरुवार, 14 जनवरी 2027
- संक्रांति — शनिवार, 13 फ़रवरी 2027
- संक्रांति — सोमवार, 15 मार्च 2027
- संक्रांति — बुधवार, 14 अप्रैल 2027
- संक्रांति — शनिवार, 15 मई 2027
- संक्रांति — मंगलवार, 15 जून 2027
- संक्रांति — शनिवार, 17 जुलाई 2027
- संक्रांति — मंगलवार, 17 अगस्त 2027
- संक्रांति — शुक्रवार, 17 सितंबर 2027
- संक्रांति — रविवार, 17 अक्टूबर 2027
संक्रांति वह दिन है जब सूर्य एक राशि छोड़कर अगली राशि में प्रवेश करता है — वर्ष में ऐसे 12 दिन आते हैं, हर सौर-मास का पहला दिन। शास्त्र इन्हें स्नान-दान का «पुण्यकाल» कहते हैं: इस दिन किया गया स्नान, जप, दान और पितृ-तर्पण कई गुना फल देता है।
मकर संक्रांति (जनवरी) और मेष संक्रांति (बैसाखी) सबसे प्रसिद्ध हैं — उनके अपने विस्तृत पन्ने अलग हैं। यह पन्ना बाक़ी मासिक संक्रांतियों (वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, कुंभ, मीन) की साझा विधि व मास-विशेष परम्पराएँ बताता है।
महत्व — यह व्रत क्यों
सूर्य आत्मा, आरोग्य, पिता-पक्ष और राज-कृपा का कारक है — उसके राशि-प्रवेश का दिन सौर-पंचांग की सबसे ठोस इकाई है; दक्षिण भारत व बंगाल-असम-केरल के सौर कैलेंडर मास इसी दिन से गिनते हैं।
पुराण-परम्परा में संक्रांति के दिन का दान (तिल, अन्न, वस्त्र, गुड़, घी) «अक्षय» कहा गया है — विशेषकर संक्रांति के आगे-पीछे के 16 घटी के पुण्यकाल में।
ज्योतिष-दृष्टि से सूर्य का राशि-बदल गोचर का बड़ा पड़ाव है — कुंडली में सूर्य जिस भाव में प्रवेश करता है, महीने-भर उसी क्षेत्र के फल सक्रिय रहते हैं (विस्तृत फल गोचर-पन्ने पर)।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
संक्रांति की विधि सरल है — पुण्यकाल में स्नान, सूर्य-अर्घ्य, दान और मास-विशेष पूजा। घर पर ऐसे करें:
- प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें — संभव हो तो तीर्थ/नदी-स्नान, वरना जल में गंगाजल व तिल डालकर घर पर ही।
- ताँबे के लोटे में जल, रोली, अक्षत व लाल फूल डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य दें — «ॐ सूर्याय नमः» या आदित्य-हृदय का पाठ।
- संक्रांति के पुण्यकाल में दान करें — तिल, गुड़, अन्न (चावल-दाल), वस्त्र, घी या दक्षिणा; दान अपने हाथ से, श्रद्धा से।
- पितरों का स्मरण/तर्पण करने की परम्परा भी है — विशेषकर कर्क व मकर संक्रांति (अयन-बदल) पर।
- मास-विशेष पूजा जोड़ें — कन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा-पूजा (औज़ार/मशीन की पूजा), तुला पर तुला-स्नान, धनु से धनुर्मास के नियम (नीचे «घर की रीत» देखें)।
- दिन भर सात्त्विक रहें; संक्रांति व्रत रखने वाले एक समय फलाहार/भोजन करते हैं — कठोर निर्जल व्रत की परम्परा नहीं है।
📿 मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) कैसे करें — विस्तृत विधि, सामग्री checklist व नियम →
पूजा-सामग्री की सूची
संक्रांति मुख्यतः स्नान-दान का पर्व है — सामग्री दान-केंद्रित है:
- अर्घ्य हेतु ताँबे का लोटा, रोली, अक्षत, लाल फूल
- तिल (काले/सफ़ेद), गुड़ — संक्रांति-दान की मुख्य वस्तुएँ
- अन्न-दान: चावल, दाल (खिचड़ी-सामग्री), आटा
- ऋतु-अनुसार वस्त्र/कंबल (शीत-मास की संक्रांतियों पर विशेष)
- घी, दीपक, दक्षिणा; विश्वकर्मा-पूजा (कन्या) हेतु औज़ारों के लिए फूल-माला व धूप
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सूर्य के मकर-प्रवेश पर उत्तरायण और कर्क-प्रवेश पर दक्षिणायन आरंभ होता है — देव-दिन और देव-रात्रि की पौराणिक कल्पना इसी से जुड़ी है; भीष्म ने बाण-शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी।
📖 मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) की पूरी व्रत-कथा पढ़ें →
तिल-गुड़, खिचड़ी व मौसमी अन्न — संक्रांति की थाली
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
हर मास की संक्रांति का अपना रंग है — मुख्य मास-परम्पराएँ:
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- स्नान-दान पुण्यकाल में करें — संक्रांति-क्षण के आगे-पीछे का समय सर्वोत्तम (पन्ने के ऊपर समय देखें)।
- सूर्य-अर्घ्य उगते सूर्य को ही दें; आँखें सीधे सूर्य पर न गड़ाएँ।
- दान में तिल अवश्य रखें — संक्रांति-दान की प्रधान वस्तु।
- कन्या संक्रांति पर औज़ार/वाहन की सफ़ाई-पूजा करें (जिनकी परम्परा में विश्वकर्मा-पूजा है)।
- धनु संक्रांति के बाद बड़े मांगलिक कार्य मुहूर्त देखकर ही रखें (खरमास-नियम)।
❌ क्या न करें
- संक्रांति के दिन दान माँगे जाने पर ख़ाली हाथ न लौटाएँ — यथाशक्ति ही सही।
- पुण्यकाल में कलह, असत्य व तामसिक भोजन से बचें।
- अर्घ्य का जल किसी के पैरों में न जाए — साफ़ स्थान/तुलसी-क्यारी में दें।
- खरमास (धनु-मास) में विवाह/गृह-प्रवेश जैसे कार्य बिना विशेष मुहूर्त-विचार न रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इस महीने की संक्रांति कब है? 2026
ऊपर तिथि-card में अगली संक्रांति की ठीक तारीख़ व दिन दिया है — यह सूर्य के राशि-प्रवेश की खगोलीय गणना (Swiss Ephemeris) से निकलती है।
संक्रांति का पुण्यकाल क्या होता है?
सूर्य के राशि-प्रवेश क्षण के आस-पास का समय — परम्परा में प्रायः प्रवेश से 16 घटी (लगभग 6.5 घंटे) आगे-पीछे; इसी में स्नान-दान का फल सबसे अधिक कहा गया है।
क्या हर संक्रांति पर व्रत रखना ज़रूरी है?
नहीं — संक्रांति मुख्यतः स्नान-दान का दिन है, कठोर व्रत की अनिवार्यता नहीं। जो रखते हैं वे एक समय सात्त्विक भोजन/फलाहार करते हैं।
मकर और मेष संक्रांति भी यहीं देखें?
उनके अपने विस्तृत पन्ने हैं — मकर संक्रांति (खिचड़ी/पोंगल/लोहड़ी) और मेष संक्रांति (बैसाखी/विशु/बिहू) — नीचे «यह भी पढ़ें» में link हैं।
कन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा-पूजा कैसे करें?
औज़ार, मशीन, वाहन, computer आदि साफ़ करके फूल-माला, रोली-अक्षत, धूप-दीप से पूजें; उस दिन उनसे भारी काम न लें; मिठाई बाँटें — यही सरल घरेलू/दुकान-विधि है।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
यह भी पढ़ें: मकर संक्रांति (खिचड़ी) · मेष संक्रांति — बैसाखी/विशु/बिहू · सूर्य का गोचर-फल · अमावस्या (स्नान-दान)
⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; मास-परम्पराएँ क्षेत्र-अनुसार घटती-बढ़ती हैं। अपने कुल-परिवार व इष्ट की रीत सर्वोपरि मानें।
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