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🪔 व्रत-त्योहार

☀️ मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) 2026

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

अगली संक्रांति कब है — हर मास सूर्य के नए राशि में प्रवेश का दिन: स्नान-दान का पुण्यकाल, सूर्य-अर्घ्य व मास-विशेष परम्पराएँ (कन्या पर विश्वकर्मा-पूजा, तुला पर तुला-स्नान, धनु से धनुर्मास)।

अगली मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश)
सोमवार, 16 नवंबर 2026
संक्रांति
कार्तिक · शुक्ल पक्ष · सप्तमी (विक्रम संवत 2083)
⭐ अभिजित मुहूर्त11:41 AM – 12:29 PM
⛔ राहुकाल (टालें)08:04 AM – 09:24 AM
आने वाली तिथियाँ
  • संक्रांति — सोमवार, 16 नवंबर 2026
  • संक्रांति — बुधवार, 16 दिसंबर 2026
  • संक्रांति — गुरुवार, 14 जनवरी 2027
  • संक्रांति — शनिवार, 13 फ़रवरी 2027
  • संक्रांति — सोमवार, 15 मार्च 2027
  • संक्रांति — बुधवार, 14 अप्रैल 2027
  • संक्रांति — शनिवार, 15 मई 2027
  • संक्रांति — मंगलवार, 15 जून 2027
  • संक्रांति — शनिवार, 17 जुलाई 2027
  • संक्रांति — मंगलवार, 17 अगस्त 2027
  • संक्रांति — शुक्रवार, 17 सितंबर 2027
  • संक्रांति — रविवार, 17 अक्टूबर 2027
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

संक्रांति वह दिन है जब सूर्य एक राशि छोड़कर अगली राशि में प्रवेश करता है — वर्ष में ऐसे 12 दिन आते हैं, हर सौर-मास का पहला दिन। शास्त्र इन्हें स्नान-दान का «पुण्यकाल» कहते हैं: इस दिन किया गया स्नान, जप, दान और पितृ-तर्पण कई गुना फल देता है।

मकर संक्रांति (जनवरी) और मेष संक्रांति (बैसाखी) सबसे प्रसिद्ध हैं — उनके अपने विस्तृत पन्ने अलग हैं। यह पन्ना बाक़ी मासिक संक्रांतियों (वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, कुंभ, मीन) की साझा विधि व मास-विशेष परम्पराएँ बताता है।

महत्व — यह व्रत क्यों

सूर्य आत्मा, आरोग्य, पिता-पक्ष और राज-कृपा का कारक है — उसके राशि-प्रवेश का दिन सौर-पंचांग की सबसे ठोस इकाई है; दक्षिण भारत व बंगाल-असम-केरल के सौर कैलेंडर मास इसी दिन से गिनते हैं।

पुराण-परम्परा में संक्रांति के दिन का दान (तिल, अन्न, वस्त्र, गुड़, घी) «अक्षय» कहा गया है — विशेषकर संक्रांति के आगे-पीछे के 16 घटी के पुण्यकाल में।

ज्योतिष-दृष्टि से सूर्य का राशि-बदल गोचर का बड़ा पड़ाव है — कुंडली में सूर्य जिस भाव में प्रवेश करता है, महीने-भर उसी क्षेत्र के फल सक्रिय रहते हैं (विस्तृत फल गोचर-पन्ने पर)।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

संक्रांति की विधि सरल है — पुण्यकाल में स्नान, सूर्य-अर्घ्य, दान और मास-विशेष पूजा। घर पर ऐसे करें:

  1. प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें — संभव हो तो तीर्थ/नदी-स्नान, वरना जल में गंगाजल व तिल डालकर घर पर ही।
  2. ताँबे के लोटे में जल, रोली, अक्षत व लाल फूल डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य दें — «ॐ सूर्याय नमः» या आदित्य-हृदय का पाठ।
  3. संक्रांति के पुण्यकाल में दान करें — तिल, गुड़, अन्न (चावल-दाल), वस्त्र, घी या दक्षिणा; दान अपने हाथ से, श्रद्धा से।
  4. पितरों का स्मरण/तर्पण करने की परम्परा भी है — विशेषकर कर्क व मकर संक्रांति (अयन-बदल) पर।
  5. मास-विशेष पूजा जोड़ें — कन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा-पूजा (औज़ार/मशीन की पूजा), तुला पर तुला-स्नान, धनु से धनुर्मास के नियम (नीचे «घर की रीत» देखें)।
  6. दिन भर सात्त्विक रहें; संक्रांति व्रत रखने वाले एक समय फलाहार/भोजन करते हैं — कठोर निर्जल व्रत की परम्परा नहीं है।

📿 मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) कैसे करें — विस्तृत विधि, सामग्री checklist व नियम →

पूजा-सामग्री की सूची

संक्रांति मुख्यतः स्नान-दान का पर्व है — सामग्री दान-केंद्रित है:

  • अर्घ्य हेतु ताँबे का लोटा, रोली, अक्षत, लाल फूल
  • तिल (काले/सफ़ेद), गुड़ — संक्रांति-दान की मुख्य वस्तुएँ
  • अन्न-दान: चावल, दाल (खिचड़ी-सामग्री), आटा
  • ऋतु-अनुसार वस्त्र/कंबल (शीत-मास की संक्रांतियों पर विशेष)
  • घी, दीपक, दक्षिणा; विश्वकर्मा-पूजा (कन्या) हेतु औज़ारों के लिए फूल-माला व धूप

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व्रत-कथा

सूर्य के मकर-प्रवेश पर उत्तरायण और कर्क-प्रवेश पर दक्षिणायन आरंभ होता है — देव-दिन और देव-रात्रि की पौराणिक कल्पना इसी से जुड़ी है; भीष्म ने बाण-शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी।

📖 मासिक संक्रांति (सूर्य का राशि-प्रवेश) की पूरी व्रत-कथा पढ़ें →

तिल-गुड़, खिचड़ी व मौसमी अन्न — संक्रांति की थाली

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

हर मास की संक्रांति का अपना रंग है — मुख्य मास-परम्पराएँ:

कन्या संक्रांति (सितंबर): विश्वकर्मा-पूजा — बंगाल/ओडिशा/असम/झारखंड में कारख़ानों, वाहनों व औज़ारों की पूजा; कारीगर वर्ग का मुख्य पर्व।
तुला संक्रांति (अक्टूबर): दक्षिण में कावेरी तुला-स्नान; ओडिशा में गर्भण संक्रांति — धान के खेतों में लक्ष्मी-पूजा।
वृश्चिक संक्रांति (नवंबर): केरल में मंडलम्-काल (शबरीमला व्रत) का आरंभ — 41 दिन का अयप्पा-व्रत यहीं से।
धनु संक्रांति (दिसंबर): धनुर्मास/खरमास आरंभ — विवाह आदि बड़े मांगलिक कार्य मकर संक्रांति तक स्थगित; प्रातः विष्णु-पूजा व बाल-भोग की विशेष परम्परा।
कर्क संक्रांति (जुलाई): दक्षिणायन आरंभ — चातुर्मास की पृष्ठभूमि; स्नान-दान व पितृ-तर्पण का विशेष दिन।
सिंह/मिथुन आदि शेष: स्नान-दान का सामान्य पुण्यकाल; ओडिशा में मिथुन संक्रांति «रज पर्व» — भूमि-माता के विश्राम का लोक-उत्सव।
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दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • स्नान-दान पुण्यकाल में करें — संक्रांति-क्षण के आगे-पीछे का समय सर्वोत्तम (पन्ने के ऊपर समय देखें)।
  • सूर्य-अर्घ्य उगते सूर्य को ही दें; आँखें सीधे सूर्य पर न गड़ाएँ।
  • दान में तिल अवश्य रखें — संक्रांति-दान की प्रधान वस्तु।
  • कन्या संक्रांति पर औज़ार/वाहन की सफ़ाई-पूजा करें (जिनकी परम्परा में विश्वकर्मा-पूजा है)।
  • धनु संक्रांति के बाद बड़े मांगलिक कार्य मुहूर्त देखकर ही रखें (खरमास-नियम)।

❌ क्या न करें

  • संक्रांति के दिन दान माँगे जाने पर ख़ाली हाथ न लौटाएँ — यथाशक्ति ही सही।
  • पुण्यकाल में कलह, असत्य व तामसिक भोजन से बचें।
  • अर्घ्य का जल किसी के पैरों में न जाए — साफ़ स्थान/तुलसी-क्यारी में दें।
  • खरमास (धनु-मास) में विवाह/गृह-प्रवेश जैसे कार्य बिना विशेष मुहूर्त-विचार न रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

इस महीने की संक्रांति कब है? 2026

ऊपर तिथि-card में अगली संक्रांति की ठीक तारीख़ व दिन दिया है — यह सूर्य के राशि-प्रवेश की खगोलीय गणना (Swiss Ephemeris) से निकलती है।

संक्रांति का पुण्यकाल क्या होता है?

सूर्य के राशि-प्रवेश क्षण के आस-पास का समय — परम्परा में प्रायः प्रवेश से 16 घटी (लगभग 6.5 घंटे) आगे-पीछे; इसी में स्नान-दान का फल सबसे अधिक कहा गया है।

क्या हर संक्रांति पर व्रत रखना ज़रूरी है?

नहीं — संक्रांति मुख्यतः स्नान-दान का दिन है, कठोर व्रत की अनिवार्यता नहीं। जो रखते हैं वे एक समय सात्त्विक भोजन/फलाहार करते हैं।

मकर और मेष संक्रांति भी यहीं देखें?

उनके अपने विस्तृत पन्ने हैं — मकर संक्रांति (खिचड़ी/पोंगल/लोहड़ी) और मेष संक्रांति (बैसाखी/विशु/बिहू) — नीचे «यह भी पढ़ें» में link हैं।

कन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा-पूजा कैसे करें?

औज़ार, मशीन, वाहन, computer आदि साफ़ करके फूल-माला, रोली-अक्षत, धूप-दीप से पूजें; उस दिन उनसे भारी काम न लें; मिठाई बाँटें — यही सरल घरेलू/दुकान-विधि है।

🔔 याद दिलाएँ — हर व्रत से एक दिन पहले

अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।

संदेश Nakshtra Tak की ओर से आएगा; नंबर किसी और को नहीं दिया जाता।

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यह भी पढ़ें: मकर संक्रांति (खिचड़ी) · मेष संक्रांति — बैसाखी/विशु/बिहू · सूर्य का गोचर-फल · अमावस्या (स्नान-दान)

⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; मास-परम्पराएँ क्षेत्र-अनुसार घटती-बढ़ती हैं। अपने कुल-परिवार व इष्ट की रीत सर्वोपरि मानें।

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