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🪔 व्रत-त्योहार

💰 अक्षय तृतीया (आखा तीज) 2027

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

वैशाख शुक्ल तृतीया — अबूझ मुहूर्त: सोना-ख़रीद, विवाह, गृह-प्रवेश; परशुराम जयंती, त्रेता-युग का आरंभ, गंगा-अवतरण; जल-सत्तू-पंखा का दान — जो दिया वह अक्षय।

अक्षय तृतीया (आखा तीज) 2027 की तिथि
रविवार, 9 मई 2027
वैशाख · शुक्ल पक्ष · तृतीया (विक्रम संवत 2084)
🌅 सूर्योदय5:35 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:54 AM – 12:42 PM
📿 तिथि-कालतृतीया 8 मई, 11:43 AM → 9 मई, 9:03 AM
🕉 ब्रह्म मुहूर्त03:59 AM – 04:47 AM
🐄 गोधूलि बेला6:34 PM – 7:27 PM
⛔ राहुकाल (टालें)05:20 PM – 07:01 PM
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

अक्षय तृतीया वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है — हनुमान जयंती के लगभग 18 दिन बाद, मई की गर्मी में। «अक्षय» = जिसका क्षय न हो — मान्यता है कि इस दिन किया दान, जप, ख़रीद और शुभ कार्य कभी घटता नहीं; यह साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों में है, इसलिए बिना पंचांग देखे विवाह-गृह-प्रवेश-नया काम; और सोना-चाँदी ख़रीदने का सबसे बड़ा दिन।

स्त्रियों के लिए यह दान और ठंडक का पर्व है — गर्मी में जल-भरे घड़े, पंखा, सत्तू, खरबूज़ा, छाता का दान; राजस्थान-मालवा में «आखा तीज» — कन्याओं के व्रत व सामूहिक विवाह; बंगाल-ओडिशा में नए साल के बही-खाते और रथ-निर्माण का आरंभ। नीचे इस साल की तिथि, ख़रीद-दान का पुण्यकाल, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।

महत्व — यह व्रत क्यों

पुराणों में इस दिन की घटनाएँ: त्रेता-युग का आरंभ, विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म (परशुराम जयंती — प्रदोष में), गंगा का धरती पर अवतरण (गंगा-सप्तमी से जुड़ा), महाभारत-लेखन का आरंभ (व्यास-गणेश), द्रौपदी को अक्षय-पात्र, सुदामा का कृष्ण से मिलना, कुबेर को धन-अधिकार — इसलिए धन-दान-अन्न सब अक्षय।

अबूझ मुहूर्त — विवाह, सगाई, गृह-प्रवेश, भूमि-वाहन-सोना ख़रीद, व्यापार-आरंभ बिना मुहूर्त-विचार शुभ; पर रोहिणी नक्षत्र व बुध/शुक्रवार पड़े तो और भी। पूरा दिन शुभ, अभिजित श्रेष्ठ; ख़रीद दिन में, विवाह लग्न से।

बद्रीनाथ धाम के कपाट इसी के आस-पास खुलते हैं और वृंदावन में बाँके-बिहारी के चरण-दर्शन साल में सिर्फ़ इसी दिन; जगन्नाथ-रथयात्रा के रथों का निर्माण पुरी में इसी दिन शुरू; बंगाल में «हालखाता»।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

यह घरेलू विधि है — सुबह स्नान-दान, विष्णु-लक्ष्मी पूजा, दिन में ख़रीद/नया कार्य, शाम को परशुराम-स्मरण।

  1. ब्रह्म-मुहूर्त/सूर्योदय (ऊपर समय) में स्नान (नदी/गंगाजल), पीले वस्त्र; संकल्प — «मैं अक्षय तृतीया का व्रत-दान परिवार की अक्षय समृद्धि हेतु करती हूँ।» व्रत — फलाहार/एक समय (कई घर सिर्फ़ पूजा-दान)।
  2. विष्णु-लक्ष्मी पूजा: पीला कपड़ा, लक्ष्मी-नारायण का चित्र, कलश; पंचामृत, तुलसी, पीले फूल, चंदन; जौ/गेहूँ के सत्तू, खीरा, चने की दाल, मिश्री का भोग; «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» / विष्णु-सहस्रनाम; लक्ष्मी-मंत्र «ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः»; कुबेर-स्मरण।
  3. दान (सूर्योदय से दोपहर, अभिजित तक श्रेष्ठ): जल-भरा मिट्टी का घड़ा (सुराही), पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, खरबूज़ा-ककड़ी, चावल-दाल-गुड़, गौ-दान/गाय को चारा — गर्मी में ठंडक की चीज़ें; ब्राह्मण/ज़रूरतमंद/प्याऊ; जितना संभव, «अक्षय» भाव से।
  4. ख़रीद (दिन में, अभिजित उत्तम): सोना-चाँदी (सिक्का/गहना — लक्ष्मी का प्रतीक; एक ग्राम भी), नया बर्तन, भूमि-वाहन का सौदा, बही-खाता; ख़रीदी वस्तु पहले पूजा-स्थान पर रखकर रोली-अक्षत।
  5. स्त्रियाँ (राजस्थान-मालवा «आखा तीज»): कन्याएँ गौरी-व्रत, आटे के लड्डू-सत्तू, घड़ा-पूजा, मिट्टी की चिड़िया-चुग्गा; सुहागिनें सत्तू-घड़े का बाया।
  6. शाम (प्रदोष): परशुराम जयंती — विष्णु-अवतार परशुराम का स्मरण, दीप; तुलसी-चौरे पर दीप; अगले दिन गंगा-सप्तमी/वैशाख-स्नान जारी।
  7. नया कार्य: विवाह/सगाई/गृह-प्रवेश/दुकान — पूरे दिन; पितरों को तर्पण-जल (वैशाख में पितृ-तृप्ति) — इस दिन पितरों के नाम का दान अक्षय।
  8. व्रत खोलना: पूजा-दान के बाद; रात में लक्ष्मी-भजन।

पूजा-सामग्री की सूची

दान की ठंडी चीज़ें और सोने का छोटा टुकड़ा — इस दिन की पहचान; पूजा सादी।

  • लक्ष्मी-नारायण/विष्णु का चित्र, पीला कपड़ा, चौकी, कलश-नारियल
  • पंचामृत, तुलसी, पीले फूल (गेंदा-चंपा), चंदन, रोली, अक्षत, मौली
  • भोग: सत्तू (जौ/चना), खीरा-ककड़ी, खरबूज़ा, चने की दाल, मिश्री, आम, खीर
  • दान: मिट्टी का घड़ा/सुराही (जल-भरा), पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, फल, अन्न-गुड़, वस्त्र, दक्षिणा
  • ख़रीद: सोना/चाँदी (सिक्का/गहना), नया बर्तन/बही-खाता
  • आखा तीज (राजस्थान): आटे के लड्डू, सत्तू, मिट्टी की चिड़िया, घड़ा; कन्याओं का गौरी-व्रत
  • दीपक, धूप, कपूर, आरती-थाली; परशुराम-चित्र (हो तो)
  • विष्णु-सहस्रनाम/लक्ष्मी-स्तोत्र पुस्तक

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व्रत-कथा

पांडवों के वनवास में द्रौपदी को सूर्य से मिला अक्षय-पात्र — जब तक द्रौपदी न खा ले, अन्न समाप्त न हो; दुर्वासा ऋषि शिष्यों सहित भोजन माँगने आए जब पात्र ख़ाली था; कृष्ण ने पात्र में चिपके एक चावल-दाने से पूरे ब्रह्मांड को तृप्त कर दिया — यह अक्षय तृतीया थी। कथा का सार: श्रद्धा से दिया एक कण भी अक्षय।

सुदामा की कथा — निर्धन मित्र सुदामा मुट्ठी-भर चावल लेकर द्वारका पहुँचे; कृष्ण ने उन्हें प्रेम से खाकर सुदामा को अक्षय समृद्धि दी — इसी तृतीया को; इसलिए इस दिन थोड़ा भी दान (सत्तू-चावल) बड़ा फल। और एक — धर्मदास वैश्य की कथा (भविष्य-पुराण): निर्धन धर्मदास ने वैशाख शुक्ल तृतीया को जल-अन्न-पंखे का दान किया, अगले जन्म में कुशावती का राजा हुआ और अक्षय धन पाया।

इसी दिन जमदग्नि-रेणुका के पुत्र परशुराम (विष्णु के छठे अवतार) का जन्म — इसलिए परशुराम जयंती; भगीरथ की तपस्या से गंगा का पृथ्वी-अवतरण; व्यास ने गणेश से महाभारत लिखवाना आरंभ किया; त्रेता-युग का प्रारंभ — «युगादि तिथि»।

सत्तू, खीरा, खरबूज़ा — गर्मी की अक्षय रसोई

वैशाख की तपती गर्मी — इसलिए इस दिन का भोग व दान ठंडा: सत्तू (जौ-चने का, नमकीन या गुड़ का शरबत), खीरा-ककड़ी, खरबूज़ा, आम-पना, चने की दाल-मिश्री; बिहार-पूर्वांचल में «सत्तुआन» (सत्तू खाने का पर्व) इसी के आस-पास।

  • सत्तू: जौ/चने के सत्तू में गुड़-पानी का शरबत, या नमक-नींबू-पुदीना का ठंडा घोल; सत्तू-लड्डू (सत्तू-गुड़-घी)
  • खीरा-ककड़ी, खरबूज़ा, तरबूज़, आम-पना, बेल-शरबत — दान व भोग दोनों
  • चने की दाल-मिश्री (विष्णु-भोग), खीर, आम-रस-पूड़ी (महाराष्ट्र-गुजरात), केसर-भात
  • राजस्थान (आखा तीज): खीर-पूड़ी, आटे के लड्डू, सत्तू, गुलगुले; बंगाल: हालखाता की मिठाई-शरबत
  • व्रत-भोजन: फल-दूध, सत्तू; व्रत न रखें तो सात्विक भोजन, पहले दान

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

उत्तर में सोना-दान, राजस्थान में आखा तीज-विवाह, बंगाल में हालखाता, ओडिशा में रथ-निर्माण, दक्षिण में मंदिर-सोना।

उत्तर प्रदेश-बिहार-दिल्ली-पंजाब: सोना-चाँदी-बर्तन की ख़रीद, गंगा-स्नान, प्याऊ लगाना, घड़ा-पंखा-सत्तू का दान; बिहार में «सत्तुआन» (मेष संक्रांति — पास की तिथि) पर सत्तू-आम-गुड़; वृंदावन में बाँके-बिहारी चरण-दर्शन व चंदन-श्रृंगार; बद्रीनाथ कपाट-उद्घाटन के आस-पास।
राजस्थान-मालवा-गुजरात (आखा तीज): सामूहिक विवाह का सबसे बड़ा दिन (अबूझ मुहूर्त — हज़ारों शादियाँ; बाल-विवाह की कुरीति पर सतर्कता); कन्याओं का गौरी-व्रत, मिट्टी की चिड़िया-चुग्गा, घड़ा-सत्तू; जैन-समाज में वर्षीतप का पारण (इक्षु-रस/गन्ने का रस — हस्तिनापुर-पालिताना); गुजरात में «अखात्रीज» — नए बही-खाते, सोना।
महाराष्ट्र-गोवा: «अक्षय्य तृतीया» — साढ़े तीन मुहूर्तों में; सोना-ख़रीद, आम-रस-पूड़ी, पितरों को «तिल-तर्पण/पितृ-पूजा» (वैशाख में), नई फ़सल के आम; खानदेश में आखाजी — विवाहित बेटियों का मायके आना, झूले।
बंगाल-ओडिशा-असम: बंगाल में «हालखाता» — व्यापारी नए बही-खाते, लक्ष्मी-गणेश पूजा, ग्राहकों को मिठाई; ओडिशा में «अक्षय तृतीया» को पुरी में जगन्नाथ-रथों का निर्माण-आरंभ, चंदन-यात्रा (21 दिन) की शुरुआत, किसानों का «अखि मुठि अनुकुल» (पहली बुवाई); असम में बोहाग बिहू के बाद।
दक्षिण भारत: तमिलनाडु-कर्नाटक-आंध्र में सोना-ख़रीद का बड़ा दिन (शहरों में), लक्ष्मी-कुबेर पूजा, मंदिरों में «अक्षय तृतीया» विशेष अभिषेक; केरल में विष्णु-मंदिरों में दर्शन; सिंहाचलम (आंध्र) के नृसिंह का चंदन-यात्रा «निज-रूप दर्शन» इसी दिन।
जैन परंपरा: आदिनाथ (ऋषभदेव) ने एक वर्ष के उपवास के बाद इसी दिन राजा श्रेयांस से इक्षु-रस (गन्ने का रस) लेकर पारण किया — इसलिए जैन «वर्षीतप» का पारण अक्षय तृतीया को गन्ने के रस से; हस्तिनापुर-पालिताना में उत्सव।
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दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • दान सूर्योदय से दोपहर तक — जल-घड़ा, पंखा, सत्तू, फल: गर्मी की ज़रूरत की चीज़ें
  • ख़रीद सामर्थ्य भर — एक ग्राम सोना/चाँदी का सिक्का/नया बर्तन भी पर्याप्त; पहले पूजा में रखें
  • विवाह-गृह-प्रवेश-नया काम — अबूझ मुहूर्त, अभिजित में और उत्तम
  • पितरों के नाम का दान और तर्पण — अक्षय फल
  • परशुराम जयंती — शाम को स्मरण-दीप

❌ क्या न करें

  • क़र्ज़ लेकर सोना — अक्षय तृतीया श्रद्धा का दिन है, दिखावे का नहीं; विज्ञापन-दबाव में नहीं
  • बाल-विवाह (आखा तीज के नाम पर) — क़ानूनन अपराध और अधर्म
  • इस दिन क्रोध, झूठ, उधार माँगना, तामसिक भोजन — दिन का फल अक्षय है, बुरा भी
  • दान की चीज़ ख़राब/टूटी नहीं — जो स्वयं लें वही दें
  • गर्मी में दोपहर की धूप में बुज़ुर्गों-बच्चों को घाट-बाज़ार नहीं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अक्षय तृतीया 2027 में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की वैशाख शुक्ल तृतीया है — पंचांग-गणना से; ख़रीद-दान का अभिजित-मुहूर्त व तृतीया की अवधि भी वहीं। तृतीया दो दिन पूर्वाह्न को छुए तो पहला दिन।

सोना कब ख़रीदें — कोई ख़ास समय?

पूरा दिन शुभ है (अबूझ); तृतीया तिथि के भीतर, अभिजित मुहूर्त (दोपहर ~12) श्रेष्ठ, राहुकाल टालें — ऊपर समय। तिथि सुबह से शुरू हो तो सूर्योदय से, देर से शुरू हो तो तिथि लगने के बाद।

क्या इस दिन बिना मुहूर्त शादी कर सकते हैं?

हाँ — साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों में एक; फिर भी वैवाहिक लग्न शुभ-समय में रखें; बाल-विवाह नहीं (क़ानूनन दंडनीय)। मुहूर्त-पन्ने पर देखें।

अक्षय तृतीया पर क्या दान करें?

गर्मी की चीज़ें — जल-भरा घड़ा/सुराही, पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, खरबूज़ा-ककड़ी, अन्न-गुड़, वस्त्र; प्याऊ लगाना; गौ-दान/गौशाला; पितरों के नाम से — जो दिया वह अक्षय।

परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया एक ही दिन?

हाँ — परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया के प्रदोष में; इसलिए जयंती उसी दिन (तृतीया प्रदोष में जिस दिन हो — कभी अगला दिन); शाम को स्मरण।

आखा तीज क्या है?

राजस्थान-मालवा में अक्षय तृतीया का लोक-नाम — सामूहिक विवाह, कन्याओं का गौरी-व्रत, सत्तू-घड़ा, मिट्टी की चिड़िया; «आखा» = अक्षय।

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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। सोना-ख़रीद सामर्थ्य से; बाल-विवाह अवैध है।

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