💰 अक्षय तृतीया (आखा तीज) 2027
वैशाख शुक्ल तृतीया — अबूझ मुहूर्त: सोना-ख़रीद, विवाह, गृह-प्रवेश; परशुराम जयंती, त्रेता-युग का आरंभ, गंगा-अवतरण; जल-सत्तू-पंखा का दान — जो दिया वह अक्षय।
अक्षय तृतीया वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है — हनुमान जयंती के लगभग 18 दिन बाद, मई की गर्मी में। «अक्षय» = जिसका क्षय न हो — मान्यता है कि इस दिन किया दान, जप, ख़रीद और शुभ कार्य कभी घटता नहीं; यह साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों में है, इसलिए बिना पंचांग देखे विवाह-गृह-प्रवेश-नया काम; और सोना-चाँदी ख़रीदने का सबसे बड़ा दिन।
स्त्रियों के लिए यह दान और ठंडक का पर्व है — गर्मी में जल-भरे घड़े, पंखा, सत्तू, खरबूज़ा, छाता का दान; राजस्थान-मालवा में «आखा तीज» — कन्याओं के व्रत व सामूहिक विवाह; बंगाल-ओडिशा में नए साल के बही-खाते और रथ-निर्माण का आरंभ। नीचे इस साल की तिथि, ख़रीद-दान का पुण्यकाल, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
पुराणों में इस दिन की घटनाएँ: त्रेता-युग का आरंभ, विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म (परशुराम जयंती — प्रदोष में), गंगा का धरती पर अवतरण (गंगा-सप्तमी से जुड़ा), महाभारत-लेखन का आरंभ (व्यास-गणेश), द्रौपदी को अक्षय-पात्र, सुदामा का कृष्ण से मिलना, कुबेर को धन-अधिकार — इसलिए धन-दान-अन्न सब अक्षय।
अबूझ मुहूर्त — विवाह, सगाई, गृह-प्रवेश, भूमि-वाहन-सोना ख़रीद, व्यापार-आरंभ बिना मुहूर्त-विचार शुभ; पर रोहिणी नक्षत्र व बुध/शुक्रवार पड़े तो और भी। पूरा दिन शुभ, अभिजित श्रेष्ठ; ख़रीद दिन में, विवाह लग्न से।
बद्रीनाथ धाम के कपाट इसी के आस-पास खुलते हैं और वृंदावन में बाँके-बिहारी के चरण-दर्शन साल में सिर्फ़ इसी दिन; जगन्नाथ-रथयात्रा के रथों का निर्माण पुरी में इसी दिन शुरू; बंगाल में «हालखाता»।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — सुबह स्नान-दान, विष्णु-लक्ष्मी पूजा, दिन में ख़रीद/नया कार्य, शाम को परशुराम-स्मरण।
- ब्रह्म-मुहूर्त/सूर्योदय (ऊपर समय) में स्नान (नदी/गंगाजल), पीले वस्त्र; संकल्प — «मैं अक्षय तृतीया का व्रत-दान परिवार की अक्षय समृद्धि हेतु करती हूँ।» व्रत — फलाहार/एक समय (कई घर सिर्फ़ पूजा-दान)।
- विष्णु-लक्ष्मी पूजा: पीला कपड़ा, लक्ष्मी-नारायण का चित्र, कलश; पंचामृत, तुलसी, पीले फूल, चंदन; जौ/गेहूँ के सत्तू, खीरा, चने की दाल, मिश्री का भोग; «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» / विष्णु-सहस्रनाम; लक्ष्मी-मंत्र «ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः»; कुबेर-स्मरण।
- दान (सूर्योदय से दोपहर, अभिजित तक श्रेष्ठ): जल-भरा मिट्टी का घड़ा (सुराही), पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, खरबूज़ा-ककड़ी, चावल-दाल-गुड़, गौ-दान/गाय को चारा — गर्मी में ठंडक की चीज़ें; ब्राह्मण/ज़रूरतमंद/प्याऊ; जितना संभव, «अक्षय» भाव से।
- ख़रीद (दिन में, अभिजित उत्तम): सोना-चाँदी (सिक्का/गहना — लक्ष्मी का प्रतीक; एक ग्राम भी), नया बर्तन, भूमि-वाहन का सौदा, बही-खाता; ख़रीदी वस्तु पहले पूजा-स्थान पर रखकर रोली-अक्षत।
- स्त्रियाँ (राजस्थान-मालवा «आखा तीज»): कन्याएँ गौरी-व्रत, आटे के लड्डू-सत्तू, घड़ा-पूजा, मिट्टी की चिड़िया-चुग्गा; सुहागिनें सत्तू-घड़े का बाया।
- शाम (प्रदोष): परशुराम जयंती — विष्णु-अवतार परशुराम का स्मरण, दीप; तुलसी-चौरे पर दीप; अगले दिन गंगा-सप्तमी/वैशाख-स्नान जारी।
- नया कार्य: विवाह/सगाई/गृह-प्रवेश/दुकान — पूरे दिन; पितरों को तर्पण-जल (वैशाख में पितृ-तृप्ति) — इस दिन पितरों के नाम का दान अक्षय।
- व्रत खोलना: पूजा-दान के बाद; रात में लक्ष्मी-भजन।
पूजा-सामग्री की सूची
दान की ठंडी चीज़ें और सोने का छोटा टुकड़ा — इस दिन की पहचान; पूजा सादी।
- लक्ष्मी-नारायण/विष्णु का चित्र, पीला कपड़ा, चौकी, कलश-नारियल
- पंचामृत, तुलसी, पीले फूल (गेंदा-चंपा), चंदन, रोली, अक्षत, मौली
- भोग: सत्तू (जौ/चना), खीरा-ककड़ी, खरबूज़ा, चने की दाल, मिश्री, आम, खीर
- दान: मिट्टी का घड़ा/सुराही (जल-भरा), पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, फल, अन्न-गुड़, वस्त्र, दक्षिणा
- ख़रीद: सोना/चाँदी (सिक्का/गहना), नया बर्तन/बही-खाता
- आखा तीज (राजस्थान): आटे के लड्डू, सत्तू, मिट्टी की चिड़िया, घड़ा; कन्याओं का गौरी-व्रत
- दीपक, धूप, कपूर, आरती-थाली; परशुराम-चित्र (हो तो)
- विष्णु-सहस्रनाम/लक्ष्मी-स्तोत्र पुस्तक
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
पांडवों के वनवास में द्रौपदी को सूर्य से मिला अक्षय-पात्र — जब तक द्रौपदी न खा ले, अन्न समाप्त न हो; दुर्वासा ऋषि शिष्यों सहित भोजन माँगने आए जब पात्र ख़ाली था; कृष्ण ने पात्र में चिपके एक चावल-दाने से पूरे ब्रह्मांड को तृप्त कर दिया — यह अक्षय तृतीया थी। कथा का सार: श्रद्धा से दिया एक कण भी अक्षय।
सुदामा की कथा — निर्धन मित्र सुदामा मुट्ठी-भर चावल लेकर द्वारका पहुँचे; कृष्ण ने उन्हें प्रेम से खाकर सुदामा को अक्षय समृद्धि दी — इसी तृतीया को; इसलिए इस दिन थोड़ा भी दान (सत्तू-चावल) बड़ा फल। और एक — धर्मदास वैश्य की कथा (भविष्य-पुराण): निर्धन धर्मदास ने वैशाख शुक्ल तृतीया को जल-अन्न-पंखे का दान किया, अगले जन्म में कुशावती का राजा हुआ और अक्षय धन पाया।
इसी दिन जमदग्नि-रेणुका के पुत्र परशुराम (विष्णु के छठे अवतार) का जन्म — इसलिए परशुराम जयंती; भगीरथ की तपस्या से गंगा का पृथ्वी-अवतरण; व्यास ने गणेश से महाभारत लिखवाना आरंभ किया; त्रेता-युग का प्रारंभ — «युगादि तिथि»।
सत्तू, खीरा, खरबूज़ा — गर्मी की अक्षय रसोई
वैशाख की तपती गर्मी — इसलिए इस दिन का भोग व दान ठंडा: सत्तू (जौ-चने का, नमकीन या गुड़ का शरबत), खीरा-ककड़ी, खरबूज़ा, आम-पना, चने की दाल-मिश्री; बिहार-पूर्वांचल में «सत्तुआन» (सत्तू खाने का पर्व) इसी के आस-पास।
- सत्तू: जौ/चने के सत्तू में गुड़-पानी का शरबत, या नमक-नींबू-पुदीना का ठंडा घोल; सत्तू-लड्डू (सत्तू-गुड़-घी)
- खीरा-ककड़ी, खरबूज़ा, तरबूज़, आम-पना, बेल-शरबत — दान व भोग दोनों
- चने की दाल-मिश्री (विष्णु-भोग), खीर, आम-रस-पूड़ी (महाराष्ट्र-गुजरात), केसर-भात
- राजस्थान (आखा तीज): खीर-पूड़ी, आटे के लड्डू, सत्तू, गुलगुले; बंगाल: हालखाता की मिठाई-शरबत
- व्रत-भोजन: फल-दूध, सत्तू; व्रत न रखें तो सात्विक भोजन, पहले दान
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
उत्तर में सोना-दान, राजस्थान में आखा तीज-विवाह, बंगाल में हालखाता, ओडिशा में रथ-निर्माण, दक्षिण में मंदिर-सोना।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- दान सूर्योदय से दोपहर तक — जल-घड़ा, पंखा, सत्तू, फल: गर्मी की ज़रूरत की चीज़ें
- ख़रीद सामर्थ्य भर — एक ग्राम सोना/चाँदी का सिक्का/नया बर्तन भी पर्याप्त; पहले पूजा में रखें
- विवाह-गृह-प्रवेश-नया काम — अबूझ मुहूर्त, अभिजित में और उत्तम
- पितरों के नाम का दान और तर्पण — अक्षय फल
- परशुराम जयंती — शाम को स्मरण-दीप
❌ क्या न करें
- क़र्ज़ लेकर सोना — अक्षय तृतीया श्रद्धा का दिन है, दिखावे का नहीं; विज्ञापन-दबाव में नहीं
- बाल-विवाह (आखा तीज के नाम पर) — क़ानूनन अपराध और अधर्म
- इस दिन क्रोध, झूठ, उधार माँगना, तामसिक भोजन — दिन का फल अक्षय है, बुरा भी
- दान की चीज़ ख़राब/टूटी नहीं — जो स्वयं लें वही दें
- गर्मी में दोपहर की धूप में बुज़ुर्गों-बच्चों को घाट-बाज़ार नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अक्षय तृतीया 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की वैशाख शुक्ल तृतीया है — पंचांग-गणना से; ख़रीद-दान का अभिजित-मुहूर्त व तृतीया की अवधि भी वहीं। तृतीया दो दिन पूर्वाह्न को छुए तो पहला दिन।
सोना कब ख़रीदें — कोई ख़ास समय?
पूरा दिन शुभ है (अबूझ); तृतीया तिथि के भीतर, अभिजित मुहूर्त (दोपहर ~12) श्रेष्ठ, राहुकाल टालें — ऊपर समय। तिथि सुबह से शुरू हो तो सूर्योदय से, देर से शुरू हो तो तिथि लगने के बाद।
क्या इस दिन बिना मुहूर्त शादी कर सकते हैं?
हाँ — साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों में एक; फिर भी वैवाहिक लग्न शुभ-समय में रखें; बाल-विवाह नहीं (क़ानूनन दंडनीय)। मुहूर्त-पन्ने पर देखें।
अक्षय तृतीया पर क्या दान करें?
गर्मी की चीज़ें — जल-भरा घड़ा/सुराही, पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, खरबूज़ा-ककड़ी, अन्न-गुड़, वस्त्र; प्याऊ लगाना; गौ-दान/गौशाला; पितरों के नाम से — जो दिया वह अक्षय।
परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया एक ही दिन?
हाँ — परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया के प्रदोष में; इसलिए जयंती उसी दिन (तृतीया प्रदोष में जिस दिन हो — कभी अगला दिन); शाम को स्मरण।
आखा तीज क्या है?
राजस्थान-मालवा में अक्षय तृतीया का लोक-नाम — सामूहिक विवाह, कन्याओं का गौरी-व्रत, सत्तू-घड़ा, मिट्टी की चिड़िया; «आखा» = अक्षय।
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। सोना-ख़रीद सामर्थ्य से; बाल-विवाह अवैध है।
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