🌅 चैती छठ (चैत्र शुक्ल षष्ठी — सूर्य षष्ठी) 2027
चैत्र नवरात्रि के छठे दिन — साल की पहली छठ; नहाय-खाय, खरना, संध्या-अर्घ्य, उषा-अर्घ्य — कार्तिक छठ की ही विधि, गर्मी की शुरुआत में; बिहार-झारखंड-पूर्वांचल-नेपाल की व्रती माताएँ; ऊपर चारों दिन व सूर्यास्त-सूर्योदय।
- नहाय-खाय (चतुर्थी) — शनिवार, 10 अप्रैल 2027
- खरना (पंचमी) — रात गुड़-खीर, फिर 36 घंटे निर्जला — रविवार, 11 अप्रैल 2027
- संध्या अर्घ्य (षष्ठी) — मुख्य दिन — सोमवार, 12 अप्रैल 2027
- उषा अर्घ्य (सप्तमी) — पारण — मंगलवार, 13 अप्रैल 2027
चैती छठ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को होती है — चैत्र नवरात्रि के छठे दिन, राम नवमी से तीन दिन पहले (मार्च-अप्रैल)। यह साल की पहली छठ है (दूसरी कार्तिक शुक्ल षष्ठी की प्रसिद्ध छठ, दीवाली के छह दिन बाद); विधि बिलकुल वही — चार दिन: नहाय-खाय (चतुर्थी), खरना (पंचमी — शाम गुड़-खीर के बाद 36 घंटे निर्जला), संध्या-अर्घ्य (षष्ठी — डूबते सूर्य को), उषा-अर्घ्य (सप्तमी — उगते सूर्य को, पारण)। कार्तिक की छठ से कम भीड़ पर उतनी ही कठोर — और गर्मी की शुरुआत में निर्जला कठिन।
छठी मैया (षष्ठी देवी — सूर्य की बहन/ब्रह्मा की मानस-पुत्री, संतान-रक्षिका) व सूर्य-देव का यह व्रत माताएँ संतान की दीर्घायु-स्वास्थ्य और मन्नत-पूर्ति के लिए रखती हैं; ठेकुआ-कसार, गन्ना, नारियल, डाभ-नींबू, बाँस के सूप-दउरा, घाट पर कमर-भर पानी में अर्घ्य। चैती छठ मुख्यतः बिहार-झारखंड-पूर्वी उप्र व नेपाल-तराई में; जिनकी मन्नत चैत्र में पूरी हुई या जो दोनों छठ रखते हैं। ऊपर इस साल के चारों दिन की तिथियाँ व सूर्योदय-सूर्यास्त (दिल्ली — अपने शहर का समय पंचांग से); नीचे विधि, सामग्री, कथा, प्रसाद व रीत — संक्षेप में, पूरा विस्तार कार्तिक-छठ पन्ने पर।
महत्व — यह व्रत क्यों
सूर्य-षष्ठी: सूर्य (आरोग्य-तेज-आयु के देव) व षष्ठी देवी (कात्यायनी/छठी मैया — नवजात की छठी की देवी) की एक साथ उपासना — इसीलिए संतान-हेतु; ऋग्वैदिक सूर्य-उपासना का लोक-रूप, बिना पंडित-मूर्ति — प्रकृति (जल-सूर्य-अन्न-गन्ना) की पूजा; चैत्र में शुक्ल षष्ठी = स्कंद-षष्ठी (कार्तिकेय — दक्षिण में) व यमुना-छठ (मथुरा-वृंदावन में यमुना-जयंती) भी इसी तिथि।
कथाएँ: राजा प्रियव्रत-मालिनी के मृत पुत्र को षष्ठी देवी ने जिलाया; द्रौपदी ने पांडवों का राज्य लौटाने को छठ किया (धौम्य ऋषि की सलाह); कर्ण (सूर्य-पुत्र) रोज़ कमर-भर जल में सूर्य-अर्घ्य देता; सीता ने मुंगेर में छठ किया (राम-वनवास के बाद) — यही बिहार की छठ-परंपरा का आधार; चैती छठ रामनवमी-पूर्व — राम-जन्म की तैयारी में सूर्यवंश के सूर्य की पूजा (लोक-भाव)।
कठोरता: खरना की रात से उषा-अर्घ्य तक ~36 घंटे निर्जला; शुद्धता — नया चूल्हा (मिट्टी), आम की लकड़ी, बिना प्याज़-लहसुन, पीतल-मिट्टी के बर्तन, व्रती ज़मीन पर सोतीं; व्रत टूटे नहीं इसलिए पहले परिवार-सहमति; सूर्यास्त-सूर्योदय (ऊपर) पर ही अर्घ्य।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह चैती छठ के चार दिनों की घरेलू विधि है — कार्तिक-छठ जैसी ही; गर्मी में जल-सावधानी के साथ।
- नहाय-खाय (चतुर्थी): व्रती सुबह नदी/तालाब/घर पर स्नान, घर-रसोई की शुद्धि, नया मिट्टी का चूल्हा या शुद्ध चूल्हा; एक समय सात्विक भोजन — अरवा चावल, चने की दाल, कद्दू (लौकी) की सब्ज़ी सेंधा नमक-घी में (प्याज़-लहसुन नहीं); परिवार भी वही; व्रती ज़मीन पर सोएँ।
- खरना/लोहंडा (पंचमी): दिन-भर निर्जला व्रत; शाम सूर्यास्त के बाद (ऊपर समय) मिट्टी के चूल्हे-आम की लकड़ी पर गुड़-चावल-दूध की रसियाव-खीर व रोटी (घी-चुपड़ी) — पहले छठी मैया-सूर्य को भोग (केले के पत्ते पर), फिर व्रती एकांत-शांति में प्रसाद ग्रहण (शोर न हो — व्रती को आवाज़ सुनने पर वहीं रोक देने की रीत), फिर परिवार-पड़ोस को; इसके बाद 36 घंटे निर्जला।
- षष्ठी — दिन: प्रसाद-निर्माण — ठेकुआ (गेहूँ-आटा-गुड़/चीनी-घी, साँचे से, आम की लकड़ी पर), कसार (चावल-आटा-गुड़ के लड्डू), चावल के लड्डू; सूप-दउरा (बाँस की टोकरी) सजाना — गन्ना (5/7, पत्ते-सहित), नारियल (जटा-सहित), डाभ (हरा नारियल), नींबू (बड़ा — डाभ-नींबू), केला (घौद), सेब-संतरा-अमरूद-शरीफ़ा, सिंघाड़ा, हल्दी-अदरक के पौधे, मूली, सुथनी, गन्ने-केले-नींबू के साथ, दीप, पान-सुपारी, कुमकुम-सिंदूर, अरवा चावल, धूप; नए पीले-लाल वस्त्र।
- संध्या-अर्घ्य (षष्ठी — सूर्यास्त, ऊपर समय): परिवार सूप-दउरा सिर पर लेकर गीत गाते घाट (नदी/तालाब/घर का कृत्रिम कुंड) पर; व्रती कमर-भर जल में पश्चिम मुख; डूबते सूर्य को दूध-जल से अर्घ्य (सूप हाथ में लेकर, परिवार के लोग बारी-बारी), «ॐ घृणि सूर्याय नमः»/छठ-गीत («केलवा के पात पर…», «काँच ही बाँस के बहँगिया»); दीप जलाकर घाट पर रात; व्रती निर्जला, कुछ रात-भर घाट पर (कोसी-भराई — मन्नत वालों की: मिट्टी के हाथी-कलश-12/24 दीप गन्ने के मंडप में)।
- उषा-अर्घ्य (सप्तमी — सूर्योदय, ऊपर समय): भोर में फिर घाट, पूर्व मुख, उगते सूर्य को अर्घ्य; प्रसाद बाँटना (ठेकुआ-फल — माँगने वाला कोई भी, «छठ का प्रसाद» माँगना शुभ); घर लौटकर छठी मैया की पूजा, व्रती का पारण — अदरक-गुड़-जल/ठेकुआ से, फिर भोजन (सादा — कद्दू-भात या खीर); परिवार को प्रसाद, पड़ोस-गाँव।
- गर्मी-सावधानी: चैत्र में तापमान 35°+ — 36 घंटे निर्जला में चक्कर/लू का ख़तरा — व्रती छाया में रहें, अत्यंत कमज़ोरी पर जल (देवी क्षमा करती हैं — प्राण पहले); घाट पर पानी की गहराई-फिसलन देखें; बुज़ुर्ग व्रती परिवार साथ।
- मन्नत: संतान/रोग-मुक्ति/विवाह की मन्नत पूरी होने पर चैती या कार्तिक छठ; कोसी-भराई (गन्ने का मंडप, मिट्टी का हाथी, 12/24 दीप — संध्या-अर्घ्य के बाद घर व उषा-अर्घ्य पर घाट); दंडवत-यात्रा (घर से घाट तक लेटकर — मन्नत-रीत, स्वास्थ्य देखकर)।
- घर पर घाट: नदी न हो तो आँगन/छत पर कृत्रिम कुंड (प्लास्टिक-टब/गड्ढा), पश्चिम-पूर्व खुला हो; सूर्य दिखे — बादल में समय पर अर्घ्य; प्रवासी परिवार (दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरु) — छठ-घाट/यमुना/समुद्र-तट/सोसाइटी-कुंड।
पूजा-सामग्री की सूची
सूप-दउरा, गन्ना, ठेकुआ-कसार, डाभ-नींबू, मिट्टी का चूल्हा — चैती छठ की सूची (कार्तिक जैसी)।
- बाँस का सूप (2-4), दउरा/डलिया (टोकरी), मिट्टी का चूल्हा, आम की लकड़ी, पीतल/मिट्टी के बर्तन, केले के पत्ते
- गन्ना (5-7 पत्ते-सहित), नारियल (जटा), डाभ (हरा नारियल), बड़ा नींबू (डाभ-नींबू), केला (घौद), सेब-संतरा-अमरूद-शरीफ़ा-अनानास, सिंघाड़ा, मूली, सुथनी, हल्दी-अदरक (पौधे-सहित), शकरकंद, पान-सुपारी
- ठेकुआ: गेहूँ का आटा, गुड़/चीनी, घी, सौंफ, नारियल, साँचा; कसार/लड्डू: चावल का आटा, गुड़; खरना: अरवा चावल, गुड़, दूध, गेहूँ-आटा (रोटी), घी
- नहाय-खाय: अरवा चावल, चने की दाल, कद्दू/लौकी, सेंधा नमक, घी
- पूजा: सिंदूर (लंबा — नाक तक, व्रती), कुमकुम, हल्दी, अरवा चावल, धूप-दीप (मिट्टी के दिये, घी/सरसों), कपूर, अगरबत्ती, चंदन, फूल (गेंदा-कमल), मौली, पीला-लाल नया वस्त्र (साड़ी/धोती)
- अर्घ्य: पीतल/तांबे का लोटा (दूध-जल), सूप में प्रसाद-फल-दीप; कोसी (मन्नत): मिट्टी का हाथी, कलश, 12/24 दिये, गन्ने का मंडप
- छठ-गीत/कथा; गर्मी: छाता-छाया, ORS (पारण के बाद), पानी परिवार के लिए
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राजा प्रियव्रत व रानी मालिनी निःसंतान थे; कश्यप ऋषि के यज्ञ से पुत्र हुआ पर मृत जन्मा; राजा शोक में प्राण देने चले, तब आकाश से देवी षष्ठी प्रकट हुईं — «मैं ब्रह्मा की मानस-पुत्री षष्ठी, संतान की रक्षिका; जो मेरी पूजा करेगा उसे संतान-सुख» — देवी ने बालक को जिलाया; राजा ने चैत्र/कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठ-व्रत आरंभ किया — छठी मैया की पूजा का मूल।
द्रौपदी व सीता: वनवास में द्रौपदी ने धौम्य ऋषि के कहने पर सूर्य-षष्ठी व्रत किया — पांडवों का राज्य लौटा; लंका-विजय के बाद राम-सीता ने मुंगेर (बिहार) में गंगा-तट पर कार्तिक छठ किया — सीता-चरण-चिह्न वहाँ आज भी; कर्ण (सूर्य-पुत्र) रोज़ जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता — बिहार की छठ इन्हीं की स्मृति; चैती छठ वही व्रत चैत्र में — राम-नवमी से पहले सूर्यवंशी राम के कुल-देव सूर्य की पूजा (लोक-भाव)।
कोसी-भराई: एक निःसंतान स्त्री ने मन्नत मानी कि पुत्र होने पर छठी मैया को गन्ने के मंडप में मिट्टी के हाथी पर दीप चढ़ाऊँगी — पुत्र हुआ, उसने 24 दीप जलाए — तभी से मन्नत पूरी होने पर «कोसी भरना» (घर में संध्या-अर्घ्य के बाद, घाट पर उषा-अर्घ्य पर); जिनकी मन्नत चैत्र में पूरी हुई वे चैती छठ पर कोसी भरते हैं।
ठेकुआ, कसार, रसियाव-खीर, कद्दू-भात, फल-गन्ना — छठ का प्रसाद
छठ का प्रसाद पूरी शुद्धता से — मिट्टी के चूल्हे/आम की लकड़ी पर, पीतल-मिट्टी के बर्तन, स्नान-शुद्ध वस्त्र में; नहाय-खाय कद्दू-भात, खरना गुड़-खीर-रोटी, अर्घ्य में ठेकुआ-कसार-फल-गन्ना; गर्मी में फल (तरबूज़-खरबूज़ा-अनानास-गन्ना) ज़्यादा; पारण अदरक-गुड़ से।
- नहाय-खाय: अरवा चावल का भात, चने की दाल, कद्दू (सीताफल)/लौकी की सब्ज़ी सेंधा नमक-घी, आम-टिकोरा (चैत्र)
- खरना: रसियाव (गुड़-चावल-दूध की खीर — मिट्टी के चूल्हे पर), घी-रोटी, केला; व्रती एकांत में, फिर सबको
- ठेकुआ (खजूरिया): गेहूँ-आटा + गुड़ का पानी/चीनी + घी + सौंफ-नारियल — साँचे में दबाकर घी में तला; कसार: चावल-आटा + गुड़ के लड्डू; चावल के लड्डू
- सूप के फल: केला, सेब, संतरा, अमरूद, शरीफ़ा, अनानास, तरबूज़-खरबूज़ा (चैत्र), नारियल, डाभ, डाभ-नींबू, गन्ना, सिंघाड़ा, मूली, सुथनी, शकरकंद, अदरक-हल्दी
- पारण (उषा-अर्घ्य के बाद): अदरक-गुड़-जल, ठेकुआ, फल; फिर कद्दू-भात/खीर — सादा; गर्मी में नींबू-पानी-ORS
- नेपाल-तराई: वही ठेकुआ-भुसवा (चावल-गुड़), सेल-रोटी (कुछ घर); झारखंड: ठेकुआ-कसार, अरसा
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
पटना के घाट, मुंगेर की सीता-चरण, देव का सूर्य-मंदिर, जनकपुर की छठ, दिल्ली की यमुना — चैत्र में छोटी पर वही श्रद्धा।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- चारों दिन क्रम से — नहाय-खाय, खरना (शाम खीर के बाद निर्जला), संध्या-अर्घ्य (सूर्यास्त — ऊपर समय), उषा-अर्घ्य (सूर्योदय)
- प्रसाद मिट्टी-चूल्हे/आम-लकड़ी पर, पीतल-मिट्टी के बर्तन, शुद्ध वस्त्र; प्याज़-लहसुन घर में नहीं
- गर्मी में व्रती छाया-विश्राम, कमज़ोरी पर जल (प्राण पहले); घाट पर सुरक्षा-गहराई
- प्रसाद सबको — माँगने वाले को ठेकुआ; घाट स्वच्छ रखें, कचरा नहीं
- मन्नत पूरी हो तो कोसी-भराई; पहली बार रखने वाली को अनुभवी व्रती का साथ
❌ क्या न करें
- अर्घ्य सूर्यास्त/सूर्योदय के समय से हटकर; बादल में समय पर ही दिशा में अर्घ्य
- खरना के बाद जल-अन्न (कठोर), पर लू-चक्कर-गर्भावस्था में व्रत तोड़ना पाप नहीं — देवी माँ हैं
- प्रसाद/सूप को जूठे हाथ, चमड़े की चीज़ (बेल्ट-पर्स) घाट पर, प्लास्टिक-थर्मोकोल, नदी में तेल-प्लास्टिक
- घाट पर शोर-नशा-पटाखे; व्रती को खरना-प्रसाद के समय आवाज़ देना
- बिना तैयारी 36 घंटे निर्जला — हृदय-रोगी-मधुमेही डॉक्टर से पूछें; कार्तिक की तरह ही कठोर
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चैती छठ 2027 में कब है — चारों दिन?
ऊपर इस साल के चारों दिन हैं — नहाय-खाय (चैत्र शुक्ल चतुर्थी), खरना (पंचमी), संध्या-अर्घ्य (षष्ठी — मुख्य), उषा-अर्घ्य (सप्तमी); चैत्र नवरात्रि के चौथे-सातवें दिन, राम नवमी से पहले; सूर्यास्त-सूर्योदय दिल्ली के — अपने शहर का पंचांग देखें।
चैती छठ और कार्तिक छठ में अंतर?
विधि-प्रसाद-कठोरता एक — दोनों शुक्ल षष्ठी की सूर्य-छठी मैया पूजा, चार दिन; कार्तिक की (दीवाली के 6 दिन बाद, अक्टूबर-नवंबर) मुख्य व विशाल (बिहार-झारखंड में छुट्टी, लाखों घाट पर), चैती (मार्च-अप्रैल) साल की पहली — मन्नत वाले/दोनों रखने वाले; चैत्र में गर्मी — निर्जला अधिक कठिन।
क्या पहली बार चैती छठ से शुरू कर सकते हैं?
हाँ — किसी भी छठ से आरंभ हो सकता है (प्रायः मन्नत पूरी होने या घर की परंपरा से); एक बार शुरू करने पर हर साल (कम-से-कम कार्तिक) रखने की रीत, बीच में न छोड़ें — न रख सकें तो परिवार की कोई और व्रती या ब्राह्मण/पड़ोसी से करवाना; पहली बार अनुभवी व्रती की सहायता लें।
गर्मी में 36 घंटे निर्जला कैसे?
खरना की खीर पेट-भर, रात आराम; अर्घ्य-दिन छाया-हवादार जगह, बात कम, घाट पर पानी में खड़े रहना ठंडक देता है; चक्कर-उल्टी-बेहोशी के लक्षण पर तुरंत जल-ORS — व्रत खंडित नहीं माना जाता (आपद्-धर्म); गर्भवती/हृदय-रोगी/मधुमेही न रखें — परिवार की दूसरी स्त्री रखे; उषा-अर्घ्य के बाद पारण धीरे (अदरक-गुड़-जल पहले)।
छठी मैया कौन हैं?
षष्ठी देवी — ब्रह्मा की मानस-पुत्री, सूर्य की बहन (लोक), नवजात की छठी की देवी (जन्म के छठे दिन पूजा) — संतान-रक्षिका; कात्यायनी (नवरात्रि की छठी देवी) से भी जोड़ते हैं; कोई मूर्ति नहीं — सूर्य-जल-अन्न में पूजा; दक्षिण में स्कंद-माता/षष्ठी, बंगाल में «षष्ठी ठाकुरन»।
नदी न हो तो घर पर छठ कैसे?
छत/आँगन में कृत्रिम कुंड (टब/गड्ढा जिसमें कमर या घुटने-भर पानी), पूर्व-पश्चिम खुला; सूप-दउरा वहीं, सूर्यास्त-सूर्योदय पर अर्घ्य; सोसाइटी-कुंड/छठ-समिति के घाट पर भी; भाव व समय मुख्य — स्थान गौण।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण बिहार-झारखंड-पूर्वांचल-नेपाल की पारंपरिक छठ-रीत पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व घाट की रीत सर्वोपरि है। चैत्र की गर्मी में निर्जला स्वास्थ्य देखकर — गर्भवती, हृदय-रोगी, मधुमेही न रखें; सूर्यास्त-सूर्योदय अपने शहर के पंचांग से।
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