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🪔 व्रत-त्योहार

🍚 पोंगल (थाई पोंगल) 2027

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

तमिल नववर्ष-फ़सल का चार-दिवसीय पर्व — भोगी (पुराना जलाना), थाई पोंगल (सूर्य को नए चावल-गुड़-दूध का उफनता पोंगल — «पोंगलो पोंगल!»), मट्टु पोंगल (गाय-बैल), काणुम पोंगल (मिलन); मकर संक्रांति का दक्षिणी रूप — कोलम, गन्ना, हल्दी की गाँठ; चारों दिन ऊपर।

पोंगल (थाई पोंगल) 2027 की तिथि
गुरुवार, 14 जनवरी 2027
🌅 सूर्योदय7:15 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त12:06 PM – 12:54 PM
🌇 सूर्यास्त5:45 PM
🕉 ब्रह्म मुहूर्त05:39 AM – 06:27 AM
⛔ राहुकाल (टालें)01:48 PM – 03:07 PM
  • भोगी पोंगल — पुरानी वस्तुओं की होली, घर की सफ़ाई — बुधवार, 13 जनवरी 2027
  • थाई पोंगल (सूर्य पोंगल) — मुख्य दिन — गुरुवार, 14 जनवरी 2027
  • मट्टु पोंगल — गाय-बैल की पूजा — शुक्रवार, 15 जनवरी 2027
  • काणुम पोंगल — मिलन-भ्रमण, भाई की मंगल-कामना — शनिवार, 16 जनवरी 2027
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

**पोंगल** तमिलनाडु (व श्रीलंका, पुदुच्चेरी, तमिल-प्रवासी) का सबसे बड़ा पर्व है — तमिल सौर-माह **थाई** का पहला दिन, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं (मकर संक्रांति/उत्तरायण)। नई फ़सल के चावल, गन्ने, हल्दी और गाय के दूध से सूर्य-देव को धन्यवाद: नए मिट्टी के बर्तन में दूध उफनाया जाता है («पोंगल» = उफनना), उसमें नया चावल-गुड़ पकाकर सूर्य को अर्पित — «पोंगलो पोंगल!» का जयघोष। यह चार दिन का पर्व है: **भोगी** (पुरानी वस्तुओं की होली, घर की सफ़ाई), **थाई पोंगल** (मुख्य — सूर्य-पूजा), **मट्टु पोंगल** (गाय-बैल की पूजा, जल्लीकट्टु) और **काणुम पोंगल** (परिवार-मिलन, भाई की मंगल-कामना)।

उत्तर की मकर संक्रांति, पंजाब की लोहड़ी, असम का माघ बिहू, कर्नाटक-आंध्र की संक्रांति — सब उसी सूर्य-संक्रमण के रूप हैं; पोंगल घर की स्त्रियों का पर्व है — भोर का कोलम (रंगोली), नए बर्तन, हल्दी की ताज़ी गाँठ बर्तन पर, गन्ना, पोंगल-पकवान। ऊपर चारों दिन की तिथियाँ (सौर — हर वर्ष 14/15 जनवरी के आसपास); नीचे विधि, सामग्री, कथा, पकवान, इलाक़ों की रीत व सवाल।

महत्व — यह व्रत क्यों

सूर्य-कृतज्ञता व उत्तरायण: थाई माह का आरंभ = सूर्य का मकर-प्रवेश, उत्तरायण (देवताओं का दिन) — «थाई पिरंदाल वळि पिरक्कुम» (थाई आते ही रास्ता खुलता है): विवाह-नए काम की शुभ ऋतु; धान की कटाई पूरी — किसान-परिवार सूर्य, वर्षा, भूमि व पशु को धन्यवाद देते हैं; यही मकर संक्रांति का सार।

चार दिन: भोगी — इंद्र (भोगी = इंद्र, वर्षा-देव) का दिन, पुरानी-टूटी वस्तुएँ भोर में जलाकर नई शुरुआत, घर की सफ़ाई-लिपाई; थाई पोंगल — सूर्य को उफनता पोंगल; मट्टु पोंगल — गाय-बैल (कृषि-सहायक) को स्नान-सींग-रंग-माला, जल्लीकट्टु/मंजु-विरट्टु; काणुम पोंगल — «काणुम» = देखना: रिश्तेदारों से मिलना, बहनें भाइयों की मंगल-कामना (कणु पिड़ि), नदी-किनारे भोजन।

स्त्रियों का पर्व: भोर का कोलम (चावल-आटे की रंगोली — चींटी-पक्षियों को भोजन भी), नए मिट्टी के बर्तन पर हल्दी-अदरक की ताज़ी गाँठ बाँधना, गन्ना, पोंगल पकाना — घर की देवी-रूप स्त्री द्वारा; काणुम पोंगल की «कणु पिड़ि» में बहनें बचे पोंगल-रंगीन चावल पक्षियों को रखकर भाई की दीर्घायु माँगती हैं।

उफनना = समृद्धि: दूध का उत्तर दिशा में उफनना शुभ (उत्तरायण) — घर में धन-धान्य-सुख के उफनने का प्रतीक; परिवार साथ मिलकर «पोंगलो पोंगल!» पुकारता है; तिरुवल्लुवर-दिवस (थाई 2) व काणुम भी इसी उत्सव में।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

पोंगल के चार दिनों की घरेलू विधि — भोगी (सफ़ाई-होली), थाई पोंगल (भोर में कोलम, सूर्योदय के बाद पोंगल पकाना — ऊपर सूर्योदय/अभिजित), मट्टु पोंगल (गाय-बैल), काणुम (मिलन)।

  1. भोगी (पहला दिन): भोर में घर की पुरानी-टूटी वस्तुएँ (चटाई-कपड़े-झाड़ू — प्लास्टिक/टायर नहीं) आँगन में अलाव में जलाना (नए की शुरुआत — «भोगी मंडलु»), ढोल-गीत; घर की सफ़ाई-लिपाई-सफ़ेदी, नए वस्त्र-बर्तन ख़रीदना, आम-पत्तों का तोरण; आंध्र-तेलंगाना में बच्चों पर «भोगी पळ्ळु» (बेर-फूल-सिक्के) की वर्षा; इंद्र-पूजा (कुछ घर)।
  2. थाई पोंगल — भोर: सूर्योदय से पहले स्नान, नए वस्त्र; द्वार-आँगन धोकर बड़ा **कोलम** (चावल-आटे/रंग की रंगोली — सूर्य-गन्ना-कलश की आकृतियाँ), बीच में गोबर के गोले पर पीले कद्दू (परंगिक्काय) का फूल; आँगन/छत पर खुले में (सूर्य के सामने) चूल्हा — ईंटों का।
  3. पोंगल-बर्तन: नया मिट्टी (या पीतल) का बर्तन — उस पर हल्दी-चंदन-कुंकुम की तीन धारियाँ, गले पर ताज़ी हल्दी-अदरक की गाँठ (पत्तों सहित) व आम-पत्ते बाँधना; बर्तन के पास गन्ने की जोड़ी, केले का पत्ता, नारियल, केला, सूर्य-देव का चित्र (या सूर्य की ओर मुख)।
  4. पोंगल पकाना (सूर्योदय के बाद, अभिजित तक — ऊपर समय): बर्तन में दूध-जल उबालें — जैसे ही दूध **उफने** (शुभ: उत्तर/पूर्व दिशा में), पूरा परिवार «पोंगलो पोंगल!» पुकारे, शंख/ढोल; तब नया चावल (धान की पहली फ़सल), मूँग-दाल, गुड़, घी, काजू-किशमिश, इलायची डालकर सक्करै (मीठा) पोंगल; साथ वेण (नमकीन — काली मिर्च-जीरा-अदरक) पोंगल।
  5. सूर्य-पूजा: केले के पत्ते पर पोंगल, गन्ना, केला, नारियल, हल्दी-गाँठ रखकर सूर्य को अर्पण — «सूर्याय नमः», आदित्य-हृदय/सूर्य-मंत्र, कपूर-आरती; सूर्य को अर्घ्य; पोंगल को पहले सूर्य, फिर घर के देवता, गाय, कौवे (कणु), फिर परिवार — केले के पत्ते पर भोजन।
  6. मट्टु पोंगल (तीसरा दिन): गाय-बैल को स्नान, सींगों पर रंग-पीतल के खोल, माला-घंटी, माथे पर कुंकुम-हल्दी, गले में फूल; उन्हें पोंगल-गुड़-गन्ना-केला खिलाना, आरती; गोशाला-पूजा; गाँवों में जल्लीकट्टु (बैल-दौड़) व मंजु-विरट्टु; घर में पालतू पशु-पक्षियों को भोजन।
  7. काणुम पोंगल (चौथा दिन): परिवार-रिश्तेदार मिलना, नदी/समुद्र-तट पर पिकनिक; **कणु पिड़ि** — घर की स्त्रियाँ/बहनें भोर में आँगन में हल्दी-पत्ते पर बचा पोंगल, रंगीन चावल (हल्दी-कुंकुम), गन्ना, केला रखकर कौवों को अर्पित करती हैं और भाइयों की दीर्घायु-समृद्धि माँगती हैं (भाई बहन को उपहार); बड़ों का आशीर्वाद, नए कपड़े।
  8. समापन: गन्ना चूसना-बाँटना, कोलम अगले दिन तक; पोंगल-बर्तन साल-भर पूजा में; बचे चावल पक्षियों को; उत्तरायण से नए काम-विवाह के मुहूर्त देखना।

पूजा-सामग्री की सूची

नया मिट्टी का बर्तन, हल्दी-अदरक की ताज़ी गाँठ, नया चावल-गुड़, गन्ना, कोलम — पोंगल की सूची (चारों दिन)।

  • पोंगल-बर्तन: नया मिट्टी का बर्तन (पोंगल पानै) या पीतल का, चूल्हे की ईंटें/स्टोव (खुले में), लकड़ी/उपले; हल्दी-चंदन-कुंकुम (बर्तन पर धारियाँ)
  • ताज़ी हल्दी की गाँठ (पत्तों सहित) व अदरक की गाँठ — बर्तन के गले पर बाँधने को, आम-पत्ते, कच्चा सूत; गन्ने की जोड़ी, केले के पत्ते, नारियल, केला
  • पोंगल-सामग्री: नया चावल (धान की नई फ़सल — पोंगल-अरिसी), मूँग-दाल, गुड़ (पोंगल-वेल्लम), गाय का दूध, घी, काजू-किशमिश, इलायची, कपूर (खाद्य — कुछ घर); वेण-पोंगल हेतु काली मिर्च-जीरा-अदरक-करी-पत्ता
  • कोलम: चावल का आटा/सफ़ेद रंग, रंगीन पाउडर, गोबर का गोला व पीले कद्दू का फूल (केंद्र), गेंदा-फूल; द्वार-तोरण (आम-पत्ते)
  • सूर्य-पूजा: सूर्य-चित्र/मुख पूर्व, अर्घ्य-लोटा, कुंकुम-हल्दी-चंदन, फूल, धूप, कपूर, आरती-थाली, घंटी, शंख; आदित्य-हृदय पुस्तिका
  • मट्टु पोंगल: गाय-बैल के लिए रंग (सींग), पीतल के सींग-खोल, माला, घंटी, फूल, पोंगल-गुड़-गन्ना-केला, कुंकुम-हल्दी; गोशाला-दान
  • काणुम/कणु पिड़ि: हल्दी-पत्ते, रंगीन चावल (हल्दी-कुंकुम), बचा पोंगल, गन्ना, केला — कौवों को; भाई-बहन के उपहार; नए वस्त्र
  • पकवान: सक्करै पोंगल, वेण पोंगल, वड़ई, पायसम, अवियल/सांबर, मुरुक्कु, अप्पम; गन्ना, केला, तिल-गुड़ (एळ्ळु-वेल्लम)

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व्रत-कथा

पोंगल की कथा (शिव-नंदी व बसव): शिव ने नंदी को पृथ्वी पर भेजा — «मनुष्यों से कहो: महीने में एक बार भोजन करें, रोज़ तेल-स्नान करें»; नंदी ने उलटा कह दिया — «रोज़ भोजन करें, महीने में एक बार स्नान»। शिव क्रुद्ध हुए — «अब इतना अन्न उगाने में मनुष्यों की सहायता तुम्हीं करो» — नंदी बैल-रूप में धरती पर खेत जोतने लगे; उसी की कृतज्ञता में मट्टु पोंगल पर गाय-बैल की पूजा और थाई पोंगल पर नई फ़सल का पर्व।

गोवर्धन-इंद्र (भोगी): भोगी इंद्र का दिन — कृष्ण ने गोवर्धन-पूजा से इंद्र का गर्व तोड़ा और वर्षा-देव को यह सिखाया कि कृतज्ञता खेती करने वालों की ओर हो; इसलिए भोगी पर इंद्र-पूजा के साथ पुरानी वस्तुओं की होली — अहंकार व पुराने का त्याग, नई फ़सल का स्वागत।

काणुम व कणु पिड़ि: लोक-मान्यता — कौवे पूर्वजों/यमदूतों के प्रतीक; बहनें रंगीन चावल कौवों को देकर भाइयों की रक्षा माँगती हैं («काक्कै-वाड़ै» — कौआ जहाँ खाए, भाई वहाँ सुखी); एक कथा में एक बहन की श्रद्धा से कौवे ने उसके भाई को संकट से बचाया — तभी से कणु पिड़ि।

सक्करै पोंगल, वेण पोंगल, वड़ई-पायसम, गन्ना-तिल-गुड़; केले के पत्ते पर सूर्य-भोग

पोंगल का भोग = पोंगल ही — नए चावल-मूँग-गुड़-घी का उफनता मीठा (सक्करै) पोंगल सूर्य को, साथ वेण (नमकीन) पोंगल, वड़ई, पायसम, गन्ना, केला, नारियल; केले के पत्ते पर पूरा परिवार भोजन; मट्टु पोंगल पर गाय-बैल को पोंगल-गुड़-गन्ना; काणुम पर कौवों को रंगीन चावल।

  • सक्करै पोंगल: नया चावल + मूँग-दाल (भूनी) दूध-जल में, गुड़-घी-काजू-किशमिश-इलायची — बर्तन में उफनाकर; सूर्य का मुख्य भोग
  • वेण पोंगल: चावल-मूँग-घी-काली मिर्च-जीरा-अदरक-काजू-करी-पत्ता — नमकीन; साथ सांबर-गोत्सु (बैंगन/इमली)
  • थाली (केले का पत्ता): पोंगल दोनों, मेदु-वड़ई, पायसम (सेवई/मूँग), अवियल, सांबर-रसम, अप्पलम, केला, गन्ना, तिल-गुड़ (एळ्ळु-वेल्लम — संक्रांति), पानगम (गुड़-पानी)
  • भोगी: पुराने की होली के बाद दाल-चावल/पोंगल, बच्चों पर भोगी-पळ्ळु (बेर); मट्टु पोंगल: गाय-बैल को पोंगल-गुड़-गन्ना-केला; काणुम: पिकनिक-भोजन (कूट्टु-वड़ई-दही-चावल), कौवों को रंगीन चावल
  • वर्जित: पोंगल-दिन माँस (बहुत-से घर — पर काणुम पर मांसाहार कुछ समुदायों में), पोंगल पकाने में जल्दबाज़ी (उफनना देखना ज़रूरी), बर्तन पर हल्दी-गाँठ भूलना

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

तमिलनाडु का पोंगल, आंध्र-तेलंगाना की संक्रांति (भोगी-पंडुगा), कर्नाटक की एळ्ळु-बेल्ला, केरल का मकरविलक्कु, उत्तर की खिचड़ी-तिल — एक सूर्य, अनेक रीत।

तमिलनाडु (पोंगल): भोगी-थाई-मट्टु-काणुम चार दिन; भोर का कोलम, आँगन में खुले चूल्हे पर मिट्टी के बर्तन में उफनता पोंगल, «पोंगलो पोंगल!»; बर्तन पर हल्दी-अदरक की गाँठ, गन्ना-जोड़ी; मदुरै-अलंगानल्लूर का जल्लीकट्टु; काणुम पर कणु पिड़ि व मरीना-बीच; थाई 2 को तिरुवल्लुवर-दिवस; तमिल-प्रवासी (श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर) वही रीत।
आंध्र प्रदेश-तेलंगाना (संक्रांति/पेद्दा पंडुगा): भोगी (भोगी-मंटलु अलाव, बच्चों पर भोगी-पळ्ळु — बेर-फूल-सिक्के), संक्रांति (पूर्वजों को तर्पण, गंगीरेद्दु — सजे बैल के साथ हरिदास-गायक, अरिसेलु-चक्कीलालु पकवान, मुग्गु-रंगोली में गोबर के गोब्बेम्मा), कनुमा (पशु-पूजा, मुर्ग़ा-लड़ाई की लोक-रीत — अब प्रतिबंधित), मुक्कनुमा; बहू पहली संक्रांति मायके में।
कर्नाटक (संक्रांति — एळ्ळु-बेल्ला): «एळ्ळु बीरोदु» — तिल-गुड़-मूँगफली-सूखा नारियल-भुने चने का मिश्रण घर-घर बाँटना («एळ्ळु-बेल्ला तिंदु ओळ्ळे मातु आडि» — तिल-गुड़ खाओ, मीठा बोलो), गन्ना, सक्करै अच्चु (चीनी की आकृतियाँ); किसान गाय-बैल को सजाकर आग पर कुदाना (किच्चु हायिसुवुदु); सुहागिनों का हल्दी-कुंकुम।
केरल (मकरविलक्कु): मकर संक्रांति की शाम सबरीमला में मकरविलक्कु/मकर-ज्योति (अय्यप्पा-भक्तों की यात्रा का समापन), मकर-संक्रमम पूजा; घरों में पायसम, तिल; पोंगल-सी उफनाने की रीत तमिल-सीमांत में; ओणम केरल का मुख्य फ़सल-पर्व (अलग पन्ना)।
उत्तर भारत (मकर संक्रांति): खिचड़ी (UP-बिहार), तिल-गुड़-लड्डू, गंगा-स्नान (प्रयाग-गंगासागर), पतंग (गुजरात-राजस्थान उत्तरायण), लोहड़ी (पंजाब — एक दिन पहले), माघ बिहू (असम — भेला-घर, पीठा); दान-पुण्य; मकर-संक्रांति का अलग पन्ना।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • भोगी पर सफ़ाई व पुराने (प्राकृतिक) का अलाव; थाई पोंगल पर भोर का कोलम, नया बर्तन, हल्दी-अदरक की गाँठ, सूर्योदय के बाद खुले में पोंगल — उफनते ही «पोंगलो पोंगल!»
  • पहला पोंगल सूर्य को (केले के पत्ते पर, गन्ना-केला-नारियल के साथ), फिर देवता-गाय-कौवे-परिवार; आदित्य-हृदय/सूर्य-मंत्र
  • मट्टु पोंगल पर गाय-बैल/पालतू पशुओं का स्नान-श्रृंगार-भोजन, गोशाला-दान; काणुम पर बहनें कणु पिड़ि, परिवार-मिलन, बड़ों का आशीर्वाद
  • नई फ़सल के चावल-गुड़-गन्ने से ही पोंगल (हो सके तो); तिल-गुड़ बाँटना, मीठा बोलना; उत्तरायण से नए काम-विवाह के मुहूर्त
  • उत्तर-भारतीय घर तमिलनाडु में/तमिल परिवार उत्तर में — दोनों रीतें (खिचड़ी + पोंगल) साथ; बच्चों को पर्व का अर्थ बताना (सूर्य-किसान-पशु का धन्यवाद)

❌ क्या न करें

  • भोगी-अलाव में प्लास्टिक-टायर-रबर जलाना (प्रदूषण — केवल लकड़ी-चटाई-कपड़ा-गोबर); धुएँ से बच्चे-बुज़ुर्ग दूर
  • पोंगल-दूध का उफनना बिना देखे पकाना/पकाते समय झगड़ा-अशुभ वचन; बर्तन पर हल्दी-गाँठ व कोलम भूलना
  • जल्लीकट्टु/पशु-खेल में पशु-क्रूरता, मट्टु पोंगल पर पशुओं को रंग-केमिकल से नुक़सान (प्राकृतिक रंग)
  • मुख्य दिन (थाई पोंगल) माँस-मद्य (परंपरा); पोंगल-प्रसाद फेंकना — पक्षियों/गाय को
  • थाई पोंगल को केवल 14 जनवरी मानना — सौर-संक्रमण से तिथि 14/15 (कभी 13/16) बदलती है; ऊपर की तिथि देखें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पोंगल 2027 में कब है — चारों दिन?

ऊपर चारों दिन: भोगी (थाई पोंगल से एक दिन पहले), थाई पोंगल (मकर संक्रांति — सूर्य का मकर-प्रवेश, 14/15 जनवरी के आसपास), मट्टु पोंगल (अगला दिन), काणुम पोंगल (उसके अगले दिन); तिथि सौर-गणना से हर वर्ष बदलती है।

पोंगल पकाने का समय व दिशा?

सूर्योदय के बाद, दोपहर (अभिजित) से पहले — ऊपर समय; खुले में सूर्य के सामने पूर्व-मुख; दूध उत्तर/पूर्व दिशा में उफने तो शुभ (उत्तरायण); राहुकाल में न पकाएँ (ऊपर)।

सक्करै पोंगल कैसे बनाएँ?

नया चावल 1 कप + भुनी मूँग-दाल ¼ कप, दूध-जल में गलने तक; गुड़ ¾-1 कप पिघलाकर छानकर डालें, घी 3-4 चम्मच, काजू-किशमिश घी में भूनकर, इलायची; बर्तन में दूध पहले उफनने दें (शगुन), फिर चावल डालें।

हल्दी-अदरक की गाँठ बर्तन पर क्यों?

ताज़ी हल्दी (मंजल) शुभता-शुद्धि व फ़सल का प्रतीक — पत्तों सहित गाँठ बर्तन के गले पर बाँधी जाती है (अदरक-गाँठ साथ), आम-पत्ते; यह बर्तन को «कलश» का रूप देती है; गन्ना समृद्धि, केला शुभ।

काणुम पोंगल की कणु पिड़ि क्या है?

चौथे दिन भोर में स्त्रियाँ/बहनें हल्दी-पत्ते पर बचा पोंगल, रंगीन (हल्दी-कुंकुम) चावल, गन्ना-केला रखकर कौवों को अर्पित करती हैं — भाइयों की दीर्घायु-समृद्धि की प्रार्थना; भाई बहनों को उपहार; परिवार-भ्रमण का दिन।

पोंगल और मकर संक्रांति में अंतर?

एक ही सौर-संक्रमण (सूर्य का मकर-प्रवेश) — तमिलनाडु में थाई पोंगल (चार दिन, उफनता पोंगल), उत्तर में मकर संक्रांति (खिचड़ी-तिल-स्नान-पतंग), पंजाब में लोहड़ी (एक दिन पहले), असम में माघ बिहू; मकर संक्रांति का अलग पन्ना — रीतें वहाँ।

उत्तर-भारतीय घर में पोंगल कैसे मनाएँ?

उसी दिन (मकर संक्रांति) सुबह कोलम/रंगोली, नए बर्तन में दूध उफनाकर चावल-मूँग-गुड़ का पोंगल सूर्य को अर्पित (केले के पत्ते पर गन्ना-केला), «पोंगलो पोंगल!»; साथ खिचड़ी-तिल-गुड़ की अपनी रीत; अगले दिन गाय-सेवा, फिर परिवार-मिलन — भाव वही: सूर्य-किसान-पशु को धन्यवाद।

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⚠️ यह विवरण तमिल-दक्षिण भारतीय पारंपरिक रीत व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। तिथियाँ सौर-संक्रमण (दिल्ली IST) से — तमिल पंचांगम में संक्रमण-समय के अनुसार थाई-प्रथम दिन कभी एक दिन आगे-पीछे हो सकता है; अलाव/पशु-खेल में सुरक्षा व क़ानून का पालन करें।

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