🍚 पोंगल (थाई पोंगल) 2027
तमिल नववर्ष-फ़सल का चार-दिवसीय पर्व — भोगी (पुराना जलाना), थाई पोंगल (सूर्य को नए चावल-गुड़-दूध का उफनता पोंगल — «पोंगलो पोंगल!»), मट्टु पोंगल (गाय-बैल), काणुम पोंगल (मिलन); मकर संक्रांति का दक्षिणी रूप — कोलम, गन्ना, हल्दी की गाँठ; चारों दिन ऊपर।
- भोगी पोंगल — पुरानी वस्तुओं की होली, घर की सफ़ाई — बुधवार, 13 जनवरी 2027
- थाई पोंगल (सूर्य पोंगल) — मुख्य दिन — गुरुवार, 14 जनवरी 2027
- मट्टु पोंगल — गाय-बैल की पूजा — शुक्रवार, 15 जनवरी 2027
- काणुम पोंगल — मिलन-भ्रमण, भाई की मंगल-कामना — शनिवार, 16 जनवरी 2027
**पोंगल** तमिलनाडु (व श्रीलंका, पुदुच्चेरी, तमिल-प्रवासी) का सबसे बड़ा पर्व है — तमिल सौर-माह **थाई** का पहला दिन, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं (मकर संक्रांति/उत्तरायण)। नई फ़सल के चावल, गन्ने, हल्दी और गाय के दूध से सूर्य-देव को धन्यवाद: नए मिट्टी के बर्तन में दूध उफनाया जाता है («पोंगल» = उफनना), उसमें नया चावल-गुड़ पकाकर सूर्य को अर्पित — «पोंगलो पोंगल!» का जयघोष। यह चार दिन का पर्व है: **भोगी** (पुरानी वस्तुओं की होली, घर की सफ़ाई), **थाई पोंगल** (मुख्य — सूर्य-पूजा), **मट्टु पोंगल** (गाय-बैल की पूजा, जल्लीकट्टु) और **काणुम पोंगल** (परिवार-मिलन, भाई की मंगल-कामना)।
उत्तर की मकर संक्रांति, पंजाब की लोहड़ी, असम का माघ बिहू, कर्नाटक-आंध्र की संक्रांति — सब उसी सूर्य-संक्रमण के रूप हैं; पोंगल घर की स्त्रियों का पर्व है — भोर का कोलम (रंगोली), नए बर्तन, हल्दी की ताज़ी गाँठ बर्तन पर, गन्ना, पोंगल-पकवान। ऊपर चारों दिन की तिथियाँ (सौर — हर वर्ष 14/15 जनवरी के आसपास); नीचे विधि, सामग्री, कथा, पकवान, इलाक़ों की रीत व सवाल।
महत्व — यह व्रत क्यों
सूर्य-कृतज्ञता व उत्तरायण: थाई माह का आरंभ = सूर्य का मकर-प्रवेश, उत्तरायण (देवताओं का दिन) — «थाई पिरंदाल वळि पिरक्कुम» (थाई आते ही रास्ता खुलता है): विवाह-नए काम की शुभ ऋतु; धान की कटाई पूरी — किसान-परिवार सूर्य, वर्षा, भूमि व पशु को धन्यवाद देते हैं; यही मकर संक्रांति का सार।
चार दिन: भोगी — इंद्र (भोगी = इंद्र, वर्षा-देव) का दिन, पुरानी-टूटी वस्तुएँ भोर में जलाकर नई शुरुआत, घर की सफ़ाई-लिपाई; थाई पोंगल — सूर्य को उफनता पोंगल; मट्टु पोंगल — गाय-बैल (कृषि-सहायक) को स्नान-सींग-रंग-माला, जल्लीकट्टु/मंजु-विरट्टु; काणुम पोंगल — «काणुम» = देखना: रिश्तेदारों से मिलना, बहनें भाइयों की मंगल-कामना (कणु पिड़ि), नदी-किनारे भोजन।
स्त्रियों का पर्व: भोर का कोलम (चावल-आटे की रंगोली — चींटी-पक्षियों को भोजन भी), नए मिट्टी के बर्तन पर हल्दी-अदरक की ताज़ी गाँठ बाँधना, गन्ना, पोंगल पकाना — घर की देवी-रूप स्त्री द्वारा; काणुम पोंगल की «कणु पिड़ि» में बहनें बचे पोंगल-रंगीन चावल पक्षियों को रखकर भाई की दीर्घायु माँगती हैं।
उफनना = समृद्धि: दूध का उत्तर दिशा में उफनना शुभ (उत्तरायण) — घर में धन-धान्य-सुख के उफनने का प्रतीक; परिवार साथ मिलकर «पोंगलो पोंगल!» पुकारता है; तिरुवल्लुवर-दिवस (थाई 2) व काणुम भी इसी उत्सव में।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
पोंगल के चार दिनों की घरेलू विधि — भोगी (सफ़ाई-होली), थाई पोंगल (भोर में कोलम, सूर्योदय के बाद पोंगल पकाना — ऊपर सूर्योदय/अभिजित), मट्टु पोंगल (गाय-बैल), काणुम (मिलन)।
- भोगी (पहला दिन): भोर में घर की पुरानी-टूटी वस्तुएँ (चटाई-कपड़े-झाड़ू — प्लास्टिक/टायर नहीं) आँगन में अलाव में जलाना (नए की शुरुआत — «भोगी मंडलु»), ढोल-गीत; घर की सफ़ाई-लिपाई-सफ़ेदी, नए वस्त्र-बर्तन ख़रीदना, आम-पत्तों का तोरण; आंध्र-तेलंगाना में बच्चों पर «भोगी पळ्ळु» (बेर-फूल-सिक्के) की वर्षा; इंद्र-पूजा (कुछ घर)।
- थाई पोंगल — भोर: सूर्योदय से पहले स्नान, नए वस्त्र; द्वार-आँगन धोकर बड़ा **कोलम** (चावल-आटे/रंग की रंगोली — सूर्य-गन्ना-कलश की आकृतियाँ), बीच में गोबर के गोले पर पीले कद्दू (परंगिक्काय) का फूल; आँगन/छत पर खुले में (सूर्य के सामने) चूल्हा — ईंटों का।
- पोंगल-बर्तन: नया मिट्टी (या पीतल) का बर्तन — उस पर हल्दी-चंदन-कुंकुम की तीन धारियाँ, गले पर ताज़ी हल्दी-अदरक की गाँठ (पत्तों सहित) व आम-पत्ते बाँधना; बर्तन के पास गन्ने की जोड़ी, केले का पत्ता, नारियल, केला, सूर्य-देव का चित्र (या सूर्य की ओर मुख)।
- पोंगल पकाना (सूर्योदय के बाद, अभिजित तक — ऊपर समय): बर्तन में दूध-जल उबालें — जैसे ही दूध **उफने** (शुभ: उत्तर/पूर्व दिशा में), पूरा परिवार «पोंगलो पोंगल!» पुकारे, शंख/ढोल; तब नया चावल (धान की पहली फ़सल), मूँग-दाल, गुड़, घी, काजू-किशमिश, इलायची डालकर सक्करै (मीठा) पोंगल; साथ वेण (नमकीन — काली मिर्च-जीरा-अदरक) पोंगल।
- सूर्य-पूजा: केले के पत्ते पर पोंगल, गन्ना, केला, नारियल, हल्दी-गाँठ रखकर सूर्य को अर्पण — «सूर्याय नमः», आदित्य-हृदय/सूर्य-मंत्र, कपूर-आरती; सूर्य को अर्घ्य; पोंगल को पहले सूर्य, फिर घर के देवता, गाय, कौवे (कणु), फिर परिवार — केले के पत्ते पर भोजन।
- मट्टु पोंगल (तीसरा दिन): गाय-बैल को स्नान, सींगों पर रंग-पीतल के खोल, माला-घंटी, माथे पर कुंकुम-हल्दी, गले में फूल; उन्हें पोंगल-गुड़-गन्ना-केला खिलाना, आरती; गोशाला-पूजा; गाँवों में जल्लीकट्टु (बैल-दौड़) व मंजु-विरट्टु; घर में पालतू पशु-पक्षियों को भोजन।
- काणुम पोंगल (चौथा दिन): परिवार-रिश्तेदार मिलना, नदी/समुद्र-तट पर पिकनिक; **कणु पिड़ि** — घर की स्त्रियाँ/बहनें भोर में आँगन में हल्दी-पत्ते पर बचा पोंगल, रंगीन चावल (हल्दी-कुंकुम), गन्ना, केला रखकर कौवों को अर्पित करती हैं और भाइयों की दीर्घायु-समृद्धि माँगती हैं (भाई बहन को उपहार); बड़ों का आशीर्वाद, नए कपड़े।
- समापन: गन्ना चूसना-बाँटना, कोलम अगले दिन तक; पोंगल-बर्तन साल-भर पूजा में; बचे चावल पक्षियों को; उत्तरायण से नए काम-विवाह के मुहूर्त देखना।
पूजा-सामग्री की सूची
नया मिट्टी का बर्तन, हल्दी-अदरक की ताज़ी गाँठ, नया चावल-गुड़, गन्ना, कोलम — पोंगल की सूची (चारों दिन)।
- पोंगल-बर्तन: नया मिट्टी का बर्तन (पोंगल पानै) या पीतल का, चूल्हे की ईंटें/स्टोव (खुले में), लकड़ी/उपले; हल्दी-चंदन-कुंकुम (बर्तन पर धारियाँ)
- ताज़ी हल्दी की गाँठ (पत्तों सहित) व अदरक की गाँठ — बर्तन के गले पर बाँधने को, आम-पत्ते, कच्चा सूत; गन्ने की जोड़ी, केले के पत्ते, नारियल, केला
- पोंगल-सामग्री: नया चावल (धान की नई फ़सल — पोंगल-अरिसी), मूँग-दाल, गुड़ (पोंगल-वेल्लम), गाय का दूध, घी, काजू-किशमिश, इलायची, कपूर (खाद्य — कुछ घर); वेण-पोंगल हेतु काली मिर्च-जीरा-अदरक-करी-पत्ता
- कोलम: चावल का आटा/सफ़ेद रंग, रंगीन पाउडर, गोबर का गोला व पीले कद्दू का फूल (केंद्र), गेंदा-फूल; द्वार-तोरण (आम-पत्ते)
- सूर्य-पूजा: सूर्य-चित्र/मुख पूर्व, अर्घ्य-लोटा, कुंकुम-हल्दी-चंदन, फूल, धूप, कपूर, आरती-थाली, घंटी, शंख; आदित्य-हृदय पुस्तिका
- मट्टु पोंगल: गाय-बैल के लिए रंग (सींग), पीतल के सींग-खोल, माला, घंटी, फूल, पोंगल-गुड़-गन्ना-केला, कुंकुम-हल्दी; गोशाला-दान
- काणुम/कणु पिड़ि: हल्दी-पत्ते, रंगीन चावल (हल्दी-कुंकुम), बचा पोंगल, गन्ना, केला — कौवों को; भाई-बहन के उपहार; नए वस्त्र
- पकवान: सक्करै पोंगल, वेण पोंगल, वड़ई, पायसम, अवियल/सांबर, मुरुक्कु, अप्पम; गन्ना, केला, तिल-गुड़ (एळ्ळु-वेल्लम)
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पोंगल की कथा (शिव-नंदी व बसव): शिव ने नंदी को पृथ्वी पर भेजा — «मनुष्यों से कहो: महीने में एक बार भोजन करें, रोज़ तेल-स्नान करें»; नंदी ने उलटा कह दिया — «रोज़ भोजन करें, महीने में एक बार स्नान»। शिव क्रुद्ध हुए — «अब इतना अन्न उगाने में मनुष्यों की सहायता तुम्हीं करो» — नंदी बैल-रूप में धरती पर खेत जोतने लगे; उसी की कृतज्ञता में मट्टु पोंगल पर गाय-बैल की पूजा और थाई पोंगल पर नई फ़सल का पर्व।
गोवर्धन-इंद्र (भोगी): भोगी इंद्र का दिन — कृष्ण ने गोवर्धन-पूजा से इंद्र का गर्व तोड़ा और वर्षा-देव को यह सिखाया कि कृतज्ञता खेती करने वालों की ओर हो; इसलिए भोगी पर इंद्र-पूजा के साथ पुरानी वस्तुओं की होली — अहंकार व पुराने का त्याग, नई फ़सल का स्वागत।
काणुम व कणु पिड़ि: लोक-मान्यता — कौवे पूर्वजों/यमदूतों के प्रतीक; बहनें रंगीन चावल कौवों को देकर भाइयों की रक्षा माँगती हैं («काक्कै-वाड़ै» — कौआ जहाँ खाए, भाई वहाँ सुखी); एक कथा में एक बहन की श्रद्धा से कौवे ने उसके भाई को संकट से बचाया — तभी से कणु पिड़ि।
सक्करै पोंगल, वेण पोंगल, वड़ई-पायसम, गन्ना-तिल-गुड़; केले के पत्ते पर सूर्य-भोग
पोंगल का भोग = पोंगल ही — नए चावल-मूँग-गुड़-घी का उफनता मीठा (सक्करै) पोंगल सूर्य को, साथ वेण (नमकीन) पोंगल, वड़ई, पायसम, गन्ना, केला, नारियल; केले के पत्ते पर पूरा परिवार भोजन; मट्टु पोंगल पर गाय-बैल को पोंगल-गुड़-गन्ना; काणुम पर कौवों को रंगीन चावल।
- सक्करै पोंगल: नया चावल + मूँग-दाल (भूनी) दूध-जल में, गुड़-घी-काजू-किशमिश-इलायची — बर्तन में उफनाकर; सूर्य का मुख्य भोग
- वेण पोंगल: चावल-मूँग-घी-काली मिर्च-जीरा-अदरक-काजू-करी-पत्ता — नमकीन; साथ सांबर-गोत्सु (बैंगन/इमली)
- थाली (केले का पत्ता): पोंगल दोनों, मेदु-वड़ई, पायसम (सेवई/मूँग), अवियल, सांबर-रसम, अप्पलम, केला, गन्ना, तिल-गुड़ (एळ्ळु-वेल्लम — संक्रांति), पानगम (गुड़-पानी)
- भोगी: पुराने की होली के बाद दाल-चावल/पोंगल, बच्चों पर भोगी-पळ्ळु (बेर); मट्टु पोंगल: गाय-बैल को पोंगल-गुड़-गन्ना-केला; काणुम: पिकनिक-भोजन (कूट्टु-वड़ई-दही-चावल), कौवों को रंगीन चावल
- वर्जित: पोंगल-दिन माँस (बहुत-से घर — पर काणुम पर मांसाहार कुछ समुदायों में), पोंगल पकाने में जल्दबाज़ी (उफनना देखना ज़रूरी), बर्तन पर हल्दी-गाँठ भूलना
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
तमिलनाडु का पोंगल, आंध्र-तेलंगाना की संक्रांति (भोगी-पंडुगा), कर्नाटक की एळ्ळु-बेल्ला, केरल का मकरविलक्कु, उत्तर की खिचड़ी-तिल — एक सूर्य, अनेक रीत।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- भोगी पर सफ़ाई व पुराने (प्राकृतिक) का अलाव; थाई पोंगल पर भोर का कोलम, नया बर्तन, हल्दी-अदरक की गाँठ, सूर्योदय के बाद खुले में पोंगल — उफनते ही «पोंगलो पोंगल!»
- पहला पोंगल सूर्य को (केले के पत्ते पर, गन्ना-केला-नारियल के साथ), फिर देवता-गाय-कौवे-परिवार; आदित्य-हृदय/सूर्य-मंत्र
- मट्टु पोंगल पर गाय-बैल/पालतू पशुओं का स्नान-श्रृंगार-भोजन, गोशाला-दान; काणुम पर बहनें कणु पिड़ि, परिवार-मिलन, बड़ों का आशीर्वाद
- नई फ़सल के चावल-गुड़-गन्ने से ही पोंगल (हो सके तो); तिल-गुड़ बाँटना, मीठा बोलना; उत्तरायण से नए काम-विवाह के मुहूर्त
- उत्तर-भारतीय घर तमिलनाडु में/तमिल परिवार उत्तर में — दोनों रीतें (खिचड़ी + पोंगल) साथ; बच्चों को पर्व का अर्थ बताना (सूर्य-किसान-पशु का धन्यवाद)
❌ क्या न करें
- भोगी-अलाव में प्लास्टिक-टायर-रबर जलाना (प्रदूषण — केवल लकड़ी-चटाई-कपड़ा-गोबर); धुएँ से बच्चे-बुज़ुर्ग दूर
- पोंगल-दूध का उफनना बिना देखे पकाना/पकाते समय झगड़ा-अशुभ वचन; बर्तन पर हल्दी-गाँठ व कोलम भूलना
- जल्लीकट्टु/पशु-खेल में पशु-क्रूरता, मट्टु पोंगल पर पशुओं को रंग-केमिकल से नुक़सान (प्राकृतिक रंग)
- मुख्य दिन (थाई पोंगल) माँस-मद्य (परंपरा); पोंगल-प्रसाद फेंकना — पक्षियों/गाय को
- थाई पोंगल को केवल 14 जनवरी मानना — सौर-संक्रमण से तिथि 14/15 (कभी 13/16) बदलती है; ऊपर की तिथि देखें
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पोंगल 2027 में कब है — चारों दिन?
ऊपर चारों दिन: भोगी (थाई पोंगल से एक दिन पहले), थाई पोंगल (मकर संक्रांति — सूर्य का मकर-प्रवेश, 14/15 जनवरी के आसपास), मट्टु पोंगल (अगला दिन), काणुम पोंगल (उसके अगले दिन); तिथि सौर-गणना से हर वर्ष बदलती है।
पोंगल पकाने का समय व दिशा?
सूर्योदय के बाद, दोपहर (अभिजित) से पहले — ऊपर समय; खुले में सूर्य के सामने पूर्व-मुख; दूध उत्तर/पूर्व दिशा में उफने तो शुभ (उत्तरायण); राहुकाल में न पकाएँ (ऊपर)।
सक्करै पोंगल कैसे बनाएँ?
नया चावल 1 कप + भुनी मूँग-दाल ¼ कप, दूध-जल में गलने तक; गुड़ ¾-1 कप पिघलाकर छानकर डालें, घी 3-4 चम्मच, काजू-किशमिश घी में भूनकर, इलायची; बर्तन में दूध पहले उफनने दें (शगुन), फिर चावल डालें।
हल्दी-अदरक की गाँठ बर्तन पर क्यों?
ताज़ी हल्दी (मंजल) शुभता-शुद्धि व फ़सल का प्रतीक — पत्तों सहित गाँठ बर्तन के गले पर बाँधी जाती है (अदरक-गाँठ साथ), आम-पत्ते; यह बर्तन को «कलश» का रूप देती है; गन्ना समृद्धि, केला शुभ।
काणुम पोंगल की कणु पिड़ि क्या है?
चौथे दिन भोर में स्त्रियाँ/बहनें हल्दी-पत्ते पर बचा पोंगल, रंगीन (हल्दी-कुंकुम) चावल, गन्ना-केला रखकर कौवों को अर्पित करती हैं — भाइयों की दीर्घायु-समृद्धि की प्रार्थना; भाई बहनों को उपहार; परिवार-भ्रमण का दिन।
पोंगल और मकर संक्रांति में अंतर?
एक ही सौर-संक्रमण (सूर्य का मकर-प्रवेश) — तमिलनाडु में थाई पोंगल (चार दिन, उफनता पोंगल), उत्तर में मकर संक्रांति (खिचड़ी-तिल-स्नान-पतंग), पंजाब में लोहड़ी (एक दिन पहले), असम में माघ बिहू; मकर संक्रांति का अलग पन्ना — रीतें वहाँ।
उत्तर-भारतीय घर में पोंगल कैसे मनाएँ?
उसी दिन (मकर संक्रांति) सुबह कोलम/रंगोली, नए बर्तन में दूध उफनाकर चावल-मूँग-गुड़ का पोंगल सूर्य को अर्पित (केले के पत्ते पर गन्ना-केला), «पोंगलो पोंगल!»; साथ खिचड़ी-तिल-गुड़ की अपनी रीत; अगले दिन गाय-सेवा, फिर परिवार-मिलन — भाव वही: सूर्य-किसान-पशु को धन्यवाद।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण तमिल-दक्षिण भारतीय पारंपरिक रीत व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। तिथियाँ सौर-संक्रमण (दिल्ली IST) से — तमिल पंचांगम में संक्रमण-समय के अनुसार थाई-प्रथम दिन कभी एक दिन आगे-पीछे हो सकता है; अलाव/पशु-खेल में सुरक्षा व क़ानून का पालन करें।
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